जेट एयरवेज़ की छंटनी आपको याद है…और किंगफिशर के कर्मचारी की आत्महत्या की कोशिश…सारे चैनल अचानक से जनवादी हो गए थे…सबकी ओबी तैनात हो गई थीं और छतरियां तन गई थीं…लेकिन अब अपने ही बीच का एक साथी ज़िंदगी और मौत के बीच है…वो भी इसलिए कि बेवक्त और बेवजह उसकी छंटनी की गई…तो देखिए सम्पादकों को सांप सूंघ गया है…हां, गुनहगार भी तो साथी ही है न…सीनियर साथी, जब जूनियर साथी की ज़िंदगी से खेलता है…तो फिर मामला बिरादरी का नहीं, पद और कद का होता है…सीनियर-सीनियर एक साथ हो जाते हैं…याद रखें शोषक सत्ता का चरित्र एक सा ही होता है.
टीवी पर महान जनवादी हो जाने वाले सम्पादकों का असली चेहरा ज़्यादातर ऐसा ही है…केवल एक सम्पादक ज़िम्मेदार नहीं है, याद रखिएगा बाकी सम्पादक और उनकी चुप्पी भी ज़िम्मेदार है…आप शायद समझ नहीं पाएंगे लेकिन आने वाले दिनों में ये सारे मामले आपकी चूलें हिला देंगे….बहुत हो गया सर…नौकरी से निकाल दीजिए लेकिन आप भी बचेंगे नहीं…नहीं बचेंगे…सब कुछ बच गया तो रातों की नींद नहीं बचेगी…डर लगेगा जब बच्चे स्कूल जाएंगे…जब रात को अकेले घर लौटना होगा…जब सपनों में चेहरे आएंगे…हाथ जोड़ते चेहरे…नौकरी बचाने की गुहार करते चेहरे…स्कूल चोड़ते बच्चों के चेहरे…फटी साड़ी पहने औरतों के चेहरे…और हां फिर खून से रंगे अपने चेहरे…न जाने कौन कौन से चेहरे.
युवा पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से साभार.






