जी हां, मैं जानता हूं स्वामी चिन्मयानंद को। उस शख्स को जो एक 'महान संत' ही नहीं, 'महान आत्मा' भी है। 'महान चरित्र', 'महान व्यक्तित्व', 'महान राजनीतिज्ञ' होने के साथ ही 'महान दानी' भी है। वगैरह-वगैरह। यह संत अपने लोगों पर 'अनुकम्पा' बरसाता है। उसके पास चेलों की कमी नहीं। धन तो उसके लिए कभी समस्या रहा ही नहीं। जेपी ग्रुप जैसे न जाने कितने ग्रुप उसके हाथों में ही नहीं, उसकी लंगोट में हैं। और अपनी लंगोट खोल कर वह क्या-क्या नहीं कर सकता है, इसका तो सवाल ही नहीं उठता। यकीन न हो तो उसके मुमुक्षु आश्रम वाले संजय से पूछ लीजिए, जो साध्वी के अनुसार उनके बिस्तर पर मौज करता था, दारू पीकर तेल लगाने वाली महिलाओं से पूछ लीजिए, जो इसमें अपना जीवन धन्य समझती थीं।
इतने पर भी विश्वास न हो तो साध्वी चिदर्पिता से पूछ लीजिए। कम से कम चिदर्पिता तो बता ही सकती हैं कि इस स्वामी नामक दुराचारी कामी-स्वामी की वास्तविकता क्या है, जो अपना नाम चिन्मय आनन्द बताता है। मेरे जैसे मर्दों के सामने आते ही लगातार पैसिव सोडोमी बनने के चलते अपनी पूंछ लगातार हिलाते रहने वाले इस रहस्यमयी शख्स के बारे में मैं भले ही कुछ ठोस न बता सकूं, लेकिन चिदर्पिता तो अब खुल कर बता भी रही हैं। बता क्या रही हैं, खुद का भोगा सच बयान कर रही हैं।
अब इस पर सवाल मत उठाइयेगा कि साध्वी अब तक साध्वी क्यों हैं। या यह सवाल कि उन्होंने वक्त रहते चिन्मयानन्द की काली करतूतों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया। यह भी कि जब संजय के साथ हो रहे बर्ताव को वे देख-महसूस कर रही थीं तो खुद आगे क्यों नहीं बढ़ीं इस पापी-नरपिशाच की करतूत खोलने। कैसे उन्होंने यह इतने लम्बे समय तक सहन कर लिया कि स्वामी महिलाओं से तब तेल लगवाता है जब दारू पी लेता है। यह भी कि दस साल तक उन्हें पता कैसे नहीं चला कि स्वामी दारू पीता है। तब, जबकि वह लगातार उनका यौन-शोषण ही नहीं, उनके कथनानुसार उनके साथ बलात्कार तक करता रहा। स्वामी क्या करता है, उसके लोग क्या करते हैं, जौनपुर का उनका राजनीतिक दल्ला और तथाकथित शिक्षाविद माना जाने वाला आदमी खुद को मुन्ना कैसे कहलाता घूमता है। उसने कैसे अपने उप-दल्ले पाल रखे हैं। यह दल्ले किस तरह और कैसी दल्लागिरी करते हैं, जौनपुर का जर्रा-जर्रा जानता है। अब इस कामी-स्वामी का असली धंधा क्या है इन लोगों का आपस में। यह सब तो आप खुद साध्वी चिदर्पिता से पूछ लीजिए।
लेकिन मैं जितना जानता हूं, आज वही बोलूंगा। लेकिन किश्तवार ही बोलूंगा। यानी जो मन में था, आज बोल दिया। जो बचा है, कल से बोलना शुरू करूंगा। हो सकता है कि कोई मेरी मुट्ठी गरम कर दे। कुछ न बोलने के लिए। मैं तो देख लूं कि आखिर मेरी मार्केट-
वैल्यू क्या है। तो, भैया। बाकी बातें कल।
लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. सौवीर से संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.





