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जुलाई के पहले हफ्ते में यशवंत ने पत्रकारों के लिए जो लिखा था, वो अब सही साबित हो रहा

Shambhunath Shukla : जुलाई के पहले हफ्ते में Yashwant Singh ने यह पोस्ट डाली थी तब इसका सिरा या पूँछ किसी को समझ में नहीं आया था। लेकिन जिस तरह से चैनलों में छंटनी हुई और अचानक तमाम पत्रकार बाहर हो गए उससे लगा कि Yashwant ने सही लिखा था। ठीक उसी तरह एक बड़े कहे जाने वाले अखबार ने भी अब अपना दिल्ली संस्करण बंद करने का फैसला किया है। जाहिर है और तमाम पत्रकार बाहर हो जाएंगे। संकट अब और गहरा गया है। कब कौन सा मीडिया संस्थान छंटनी शुरू कर दे कुछ पता नहीं।
 
Shambhunath Shukla : जुलाई के पहले हफ्ते में Yashwant Singh ने यह पोस्ट डाली थी तब इसका सिरा या पूँछ किसी को समझ में नहीं आया था। लेकिन जिस तरह से चैनलों में छंटनी हुई और अचानक तमाम पत्रकार बाहर हो गए उससे लगा कि Yashwant ने सही लिखा था। ठीक उसी तरह एक बड़े कहे जाने वाले अखबार ने भी अब अपना दिल्ली संस्करण बंद करने का फैसला किया है। जाहिर है और तमाम पत्रकार बाहर हो जाएंगे। संकट अब और गहरा गया है। कब कौन सा मीडिया संस्थान छंटनी शुरू कर दे कुछ पता नहीं।
 
अभी एक मित्र ने सूचना दी है कि एक शिक्षण संस्थान के बहुसंस्करणी अखबार ने भी छंटनी की प्रक्रिया शुरू कर दी है। मेरी शुभकामना है कि वहां काम कर रहे पत्रकार अपनी नौकरी बचाए रख सकें। छंटनी होते ही गाज सबसे पहले पत्रकारों पर ही पड़ती है और उसकी वजह भी है क्योंकि अधिकांश हिंदी पत्रकार संपादक का लैपटॉप उठाकर अपनी नौकरी बचाते हैं और संपादक मालिक को अपनी बहबूदी के झूठे किस्से सुनाकर। पोल तो कभी न कभी खुलती ही है।
 
 
 
मंदी ने फिर भारत को अपने आगोश में ले लिया है. मीडिया वाले कतई मंदी के बाबत नहीं बताएंगे क्योंकि जाने-माने पत्रकार पी साईनाथ के शब्दों में- ''बाजार के उतार-चढ़ाव से टाइम्स आफ इंडिया समेत कई मीडिया कंपनियां जुड़ी हैं और इनका सैकड़ों लिस्टेड कंपनियों के शेयरों पर कब्जा है, अगर ये मंदी के बारे में ज्यादा बताएंगी तो निवेशक पैसे नहीं लगाएगा, या लगा हुआ पैसा निकाल लेगा, सो इन्हें घाटा झेलना पड़ेगा, इसलिए बाजारू मजबूरियों के कारण ये मीडिया कंपनियां भारत में आशावादी माहौल जबरन बनाए रखती हैं जबकि जमीन पर मंदी का बुरा असर चहुंओर दिखने लगा है''.
अभी अभी आजतक के पत्रकार Deepak Sharma ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा है कि किस तरह साल के अंत तक निजी सेक्टर में कार्यरत हर तीसरे व्यक्ति की नौकरी ये मंदी निगल जाएगी. रीयल इस्टेट समेत ढेर सारे उद्योग क्रैश कर रहे हैं. रीयल स्टेट कंपनी के एक न्यूज चैनल श्री न्यूज से दर्जनों लोग छंटनी के शिकार हुए हैं, पर मीडिया जगत में सन्नाटा है. मारुति ने दो सौ से ज्यादा अपने वर्करों को अचानक पैदल कर दिया, इस पर मीडिया में कोई हो-हल्ला नहीं हुआ. टाटा की कंपनी टीसीएस ने सैकड़ों कर्मियों को निकालने का फैसला लिया है. सुजलान एनर्जी ने एक हजार कर्मियों को बाहर करने का ऐलान किया है. नोएडा-गाजियाबाद से प्रकाशित डीएलए अखबार बंद हो चुका है और दर्जनों कर्मी सड़क पर आ चुके हैं. दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों-मीडिया हाउसों ने अपने यहां दर्जनों लोगों को किसी न किसी बहाने निकाल दिया है और कइयों को निकालने की तैयारी है.
 
छोटी-मोटी कंपनियां और न्यूज चैनल रोजाना अपने यहां कम या ज्यादा संख्या में छंटनी कर रहे हैं. लेकिन देश का कारपोरेट मीडिया 'भारत निर्माण' का विज्ञापन पाकर चलाकर गदगद कृतज्ञ है और गैर-जरूरी मुद्दों पर बहसियाने-बतियाने में लगा है. लोकसभा चुनाव आते आते जमीन पर भारत निर्माण की जगह भारत विनाश के हालत दिखने लगेंगे, इसमें कोई दो-राय नहीं है.
 
मीडिया के साथियों से अपील है कि वे मंदी के हालात की सच्चाई अगर अपने चैनलों, अखबारों में बयान नहीं कर पा रहे हैं तो कृपया सोशल मीडिया और वेब-ब्लाग पर इस बारे में चर्चा करें, आकड़ें रखें और देश के सामने खड़े भीमकाय संकट से सबको अवगत कराएं, आगाह करें. खुद मीडिया के साथियों से कहना चाहूंगा कि मंदी छंटनी के दौर को देखते हुए वे मेहनत से कमाए अपने पैसे का निवेश कहीं ऐसी जगह न कर दें कि उन्हें बाद में जीवन निर्वाह के लिए मुसीबत का सामना करना पड़े. वे अपने पास जितना भी कैश है, उसे बचाकर सुरक्षित जगह रखें. साथ ही, नौकरी जाने की आशंका को देखते हुए अपने लिए वैकल्पिक उद्यम के बारे में देखें-सोचें-प्रयास करें. इस बारे में अगर कोई साथी किसी आर्थिक विशेषज्ञ से बातचीत कर कुछ टिप्स सामने रखे तो ज्यादा उपयोगी होगा.
 
मैं पिछले पांच वर्ष से भड़ास संचालित करते हुए देख रहा हूं कि जब जब छंटनी का दौर मीडिया में शुरू होता है, ढेर सारे मीडियाकर्मी साथी अचानक सड़क पर आ जाते हैं और उनके पास करने के लिए कुछ नहीं होता. बाद में उन्हें खाने, किराया देने, बच्चों की फीस देने तक के लाले पड़ जाते हैं. इसलिए सभी को अपनी ताकत क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करते हुए थोड़े थोड़े पैसे कमाने और जुटाने चाहिए, इसके लिए भले ही अनुवाद से लेकर आर्टकिल लिखने और कोई दुकान खोलने चलाने तक का काम करना पड़े, जरूर करना शुरू कर दें. खासकर उन क्षेत्रों की पहचान कर सक्रिय होना चाहिए जहां पर मंदी का असर न पड़ने वाला हो.
 
मैं मीडिया क्षेत्र से जुड़ा रहा हूं और इसी के पैसे से जीवन यापन करता आया हूं इसलिए मैं सबसे पहले मीडिया के साथियों को ही आगाह करना चाहूंगा कि वे पाई पाई बचाकर रखें, कोई नई चीज न खरीदें, मकान आदि खरीदने में पैसे निवेश न करें, गैर-जरूरी खर्चों को कम कर दें. मोबाइल के कम इस्तेमाल, वाहन के कम इस्तेमाल, चाय-पान-सिगरेट व नशे की अन्य चीजों के सेवन पर पाबंदी आदि से भी काफी पैसा बचाया जा सकता है. ऐसी ही छोटी छोटी बचत करके आप मुश्किल के दिनों को झेल पाने में सक्षम होंगे. साथ ही आप मीडिया के साथियों का दायित्व है कि देश को मुश्किल हालात की तरफ ले जाने वाले लुटेरे कारपोरेट, भ्रष्ट सरकारों, नपुंसक मीडिया, रीढ़विहीन नौकरशाही के गठजोड़ के बारे में ज्यादा से ज्यादा खुलासा करें ताकि हर कोई सावधान, सतर्क हो सके.
 

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.
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