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जेल को हकीकी सुधार घर बनाने की कोशिश में एक अफसर!

ये एक अदभुत अनुभव था। शायद ही ऐसा कहीं पहले हुआ हो। पहाड़ों की रानी शिमला से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हिमाचल की आदर्श जेल कण्डा के प्रांगण में कैदियों व देश के कई हिस्सों से पहुंचे पत्रकारों, गणमान्यों, बुद्धिजीवियों व हिमाचल की नामी हस्तियों की मौजूदगी में एक समाचारपत्र का लोकापर्ण था। हिमाचल प्रदेश में स्थानीय इलेक्ट्रानिक चैनल सिटी चैनल की 19वीं वर्षगांठ पर 27 जून को सिटी चैनल के युवा व उत्साही प्रबंध निदेशक मुकेश मलहोत्रा ने एक साप्ताहिक समाचारपत्र बाजार में उतारने के लिए शिमला के किसी सभागार को चुनने के स्थान पर जेल जैसी उपेक्षित मानी जाती संस्था के प्रांगण को चुन कर ऐसा उदाहरण पेश किया।

ये एक अदभुत अनुभव था। शायद ही ऐसा कहीं पहले हुआ हो। पहाड़ों की रानी शिमला से दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हिमाचल की आदर्श जेल कण्डा के प्रांगण में कैदियों व देश के कई हिस्सों से पहुंचे पत्रकारों, गणमान्यों, बुद्धिजीवियों व हिमाचल की नामी हस्तियों की मौजूदगी में एक समाचारपत्र का लोकापर्ण था। हिमाचल प्रदेश में स्थानीय इलेक्ट्रानिक चैनल सिटी चैनल की 19वीं वर्षगांठ पर 27 जून को सिटी चैनल के युवा व उत्साही प्रबंध निदेशक मुकेश मलहोत्रा ने एक साप्ताहिक समाचारपत्र बाजार में उतारने के लिए शिमला के किसी सभागार को चुनने के स्थान पर जेल जैसी उपेक्षित मानी जाती संस्था के प्रांगण को चुन कर ऐसा उदाहरण पेश किया।

मेरी अपनी गणना है कि जेल से समाज का हर व्यक्ति कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप से जुड़ा होता है। एक साधारण व्यक्ति के जेल जाने से उसका परिवार, भाई बंधु, ननिहाल, ससुराल, दादा पक्ष, समाज व मित्रों के दायरे को पक्ष के अलावा वो जिस कारोबार या नौकरी में हो उस दायरे के लोगों को मिला कर साधारण व्यक्ति के जेल जाने से करीब दो सौ लोग तो प्रभावित होते ही हैं। और यदि कण्डा जेल में बंद अमरेश राणा जैसा मशहूर सियासी कार्यकर्ता बंद हो तो समझो कि ऐसे व्यक्ति हजारों लोगों के दायरे में जीने वाले होते हैं। इस कार्यक्रम की सबसे अदभुत बात ये थी कि इसके मुख्य अतिथि देश के जाने माने सुधारवादी आई.पी.एस व हिमाचल जेल विभाग के महानिदेशक आई.डी.भंडारी थे।

कैदियों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए जिनमें हिमाचली गीत, सूफी संगीत के साथ साथ हिमाचल के लोकनृत्य नाटी की भी शानदार पेशकश थी। कैदियों के चेहरों पर एक आशा की किरण थी। उनकी शारीरिक भाषा व शब्द बता रहे थे कि हिमाचल की जेलों में हो रहे सुधार कार्यक्रम उनकी आशाओं पर पूरा उतरेंगे। पंजाब के जेल महानिदेशक शशिकांत द्वारा उठाए जा रहे सुधारवादी कदमों को जहां पंजाब सरकार का समर्थन मिलता नहीं दिख रहा वहीं हिमाचल में श्री भंडारी के प्रयासों को सरकार की तरफ से पूर्ण समर्थन मिलता दिख रहा है। उन्होंने निजी बातचीत के दौरान बेहद साफगोई से बताया कि जब वे पुलिस विभाग द्वारा सामान्य पुलिसिंग की जिम्मेवारियों पर तैनात थे तब उन्हें लगता था कि अपराधियों के साथ सख्ती की जाए पर जेल विभाग का चार्ज मिलने के उपरांत उन्होंने महसूस किया कि अपराध मिटाना है तो अपराधी को इस प्रकार का माहौल दिया जाए कि वो दोबारा अपराध करने की मानसिकता से बचे।

इसी के चलते उन्होंने कानून में मौजूद उन प्रावधानों को लागू किया जिसे लागू करने की उनसे पहले वालों ने पहलकदमी नहीं दिखाई। हिमाचल की जेलों में साफ सफाई बहुत है। जेलों में होने वाले श्रम को सहज बनाया गया है। योगा व आर्ट आफ लिविंग जैसी साधना करवाने के विशेष प्रावधान किए गए हैं। इस प्रक्रिया के चलते जेल में रहने के तनाव से कैदी पार पा लेता है। पेरोल व फरलो जैसे मौजूद प्रावधानों में बिना कारण के अडंगों व औपचारिकताओं को सरल किया गया है। कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के निशुल्क प्रावधान हैं। जेलों में नशा नहीं मिलता। जिस प्रकार पंजाब की जेलों में हर कानून सम्मत सुविधा बिकाऊ है वैसा हाल हिमाचल में नहीं है। इसका एक और कारण भी है कि हिमाचल में अपराध का ट्रेंड अलग प्रकार का है। वहां सत्तरह फीसदी अपराध नशीले पदार्थों की तस्करी का है जो हिमाचल से दूसरे प्रदेशों में की जाती है। बाकी का अपराध अचानक हुए हादसों जैसा है।

ऐसा नहीं कि सुधार की कोशिशें नहीं होतीं। मुझे याद है पंजाब में अमृतसर की गुमटाला जेल को कुंवर विजय प्रताप सिंह ने अपने कार्यकाल में पंजाब की सबसे अच्छी व आदर्श जेल बना दिया था जो सबसे अधिक बदनाम हुआ करती थी पंजाब में। किरण बेदी ने तिहाड़ जेल में सुधार की एक लहर चलाई थी। पर ऐसे सुधार सत्ता के चरित्र को ज्यादा पसंद नहीं आते। जबकि जेल के संदर्भ में यदि किसी प्रदेश में राहत व सुविधा जैसा आलम हो व कैदी को इन्सान समझने वाली परिस्थितियां हों तो जिन सरकारों के कार्यकाल में एसे सुधार हुए हों उन्हें इनका राजनीतिक फायदा भी मिल जाया करता है। हिमाचल में भी चुनाव सिर पर है व जेल संदर्भ में हुए सुधारों का सरकार को लाभ मिल सकता है।

लेखक अर्जुन शर्मा वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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