दोस्तों दो खबरे हैं मगर उसकी कहानी एक ही है। कहानी यशवंत के जेल यात्रा की। अब जो होना था हो चुका। यशवंत जेल में हैं। बाहर भी आ जायेंगे। मगर यशवंत इतने परेशान नहीं होंगे जितने उन्हें जेल में भेजने वाले। यशवंत को जमानत मिलेगी। जी न्यूज़ में एक पाराशर साहब हैं उनकी कविता की चंद लाइने कुछ यूँ हैं- "है उस्तरे की धार पर लोकतंत्र की मूंछे, लेखनी की अब जमानत जब्त है"। तो जनाब लेखनी की जमानत बचाते बचाते यशवंत को खुद अब जमानत की जरुरत है। मगर सवाल इससे बड़ा है- जब यशवंत जेल से बाहर निकलेगा तो क्या होगा?
यशवंत एक शेरदिल इंसान है। और जब कोई शेर को घायल कर देता है तो वो और भी खूंखार हो जाता है। यशवंत रुपी शेर इस देश में लेखनी की जमानत जब्त कराने वालों का शिकार कर कर रहा था। मैं ये नहीं कहता कि यशवंत मुह में सोना डाले था यानि सौ फ़ीसदी हरिश्चंद्र है| मगर जितना भी है, जिनका शिकार कर रहा था उनसे तो अच्छा ही है। ये शतरंज की चाल जैसा है। कापड़ी और कापड़ी जैसों ने अपनी चाल चल दी अब यशवंत की बारी है। जब वो बाहर निकलेगा वो और उनके साथी (जो मानसिक और आर्थिक सहयोग करते हैं) और भी खूंखार हो चुके होंगे। जो कुछ बचा बचाया है उसे भी जनता को परोस देंगे। अब अगली चाल की बारी यशवंत की है।
यशवंत और उनके हमसफर कोर्ट नहीं जायेंगे, पुलिस में नहीं जायेंगे, प्रधानमंत्री के यहाँ शिकायत नहीं करेंगे। ये सभी लोग
मिलकर कलम चलाएंगे। गूगल के सर्च इंजन में ऐसे ही लोग छाने वाले हैं। कहाँ-कहाँ से डीलीट करोगे और कितना डीलीट करोगे। कभी देश की आजादी के लिए कलम हथियार बना था, अब मीडिया में सफाई के लिए कलम हथियार बनेगा। तो इन्तजार करो ज्वालामुखी के फटने का और लावा फैलने का। जैसे शिकार से पहले शेर शांत हो जाता है, तूफ़ान से पहले सन्नाटा छा जाता है, वैसे ही जेल में यशवंत शांत है। बस शांत है।
लेखक पंकज दीक्षित जोइंट न्यूज ऑफ इंडिया वेब पोर्टल के संपादक हैं.
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