नई दुनिया और छजलानी परिवार से हमारे व्यावसायिक और पारिवारिक दोनों संबंध बहुत प्रगाढ़ रहे और यह संबंध 1959 से लेकर लगभग दो दशकों तक रहे. अब्बू जी [श्री अभय छजलानी जी] का स्नेहवत मार्गदर्शन भी तब तक मिलता रहा जब तक व्यावसायिक सम्बन्ध रहे. यहाँ तक कि उनहोंने अपने परम विश्वसनीय स्व. रामचंद्र नीमा को व्यवस्था सम्बन्धी मदद के लिए हमें दिया. सन 1974 में उज्जैन के एक अखबार द्वारा टेलीप्रिंटर सेवा ली थी, के उद्घाटन समारोह में मैंने उन्हें सुना भी था. तभी पता चला कि वे मात्र इंटर पास हैं लेकिन अखबार की क्या जरूरतें होती हैं और बेहतर अखबार कैसे निकाला जाता है, उन्हें भली भाँति पता है. स्व. प्रकाश चंद सेठी उस कार्यक्रम में उपस्थित थे.
अब्बू जी की खेलों के प्रति रुचि भी खूब थी और इंदौर का अभय प्रशाल उस रुचि का मूर्तरूपेण प्रमाण है जिसके निर्माण के लिए धन संग्रह करना कठिन था लेकिन लाटरी से लेकर अन्य उपायों से उन्होंने उसे पूरा किया. अभय जी ने नई दुनिया की प्रतिष्ठा को बढ़ाने के खूब प्रयास किये और वह आम जनता, बुद्धिजीवी, सत्ता, नेता, अफसर आदि का प्रिय अखबार इस नाते बन गया कि कोई भी सरकारी नीति या घोषणा सबसे पहले नईदुनिया में छपती, फिर कहीं प्रदेश के दूसरे समाचार पत्रों में. और, नई दुनिया में छपे का असर होता. लगभग 25 साल पहले अभय जी से फिर से व्यावसायिक तारों को जोड़ने के सिलसिले में नई दुनिया के इंदौर कार्यालय में एक बार और भेंट हुई.
यह देख कर अच्छा लगा कि इतने बड़े पेपर का मालिक और प्रधान संपादक सबके साथ खुले हाल में बैठता है. कुछ गोपनीय नहीं. बहरहाल, जिस मंतव्य से मिलने गए थे, वह पूरा नहीं हुआ क्योंकि वे किसी और अखबार को अपने से जोड़ने का विचार रखते थे. उसी भेंट में उनके पुत्र विनय छजलानी से भी परिचय हुआ. पता चला कि पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने १००% एक्सपोर्ट ओरिएन्टड यूनिट डाली है. उन दिनों ऐसी यूनिटों को काफी सरकारी सहायता और प्रश्रय मिला करता था. 12-15 साल पहले विनय जी के इंदौर रेस कोर्स रोड स्थित वेब दुनिया के कार्यालय को भी देखने का अवसर मुझे इंदौर प्रवास के दौरान मिला. कुल मिलाकर विनय जी विनम्रता की मूर्ति लगे और अभय जी से तो भय जैसे दूर ही रहता था.
आज जब नईदुनिया के रसातलगामी होते जाने की इन ख़बरों को पढ़ रहा हूँ तो मन बैचैन हो रहा है. मुंह का स्वाद खराब हो रहा है और सोच रहा हूँ कि भाग्य का खेल क्या ऐसा होता है कि जो विनय है वह दानव हो जाए और जो अभय है वह कोने में दुबक कर बैठने को विवश हो जाए. मैं अब्बू जी के सुदीर्घ स्वस्थ यश पूर्ण जीवन की वापिसी की कामना करता हूँ.
देवेन्द्र सुरजन
न्यूयार्क
अमेरिका





