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सुख-दुख...

ज्‍यादातर अखबारों में संघी मार्का संपादक बैठे हैं, मुझे तो छापने से रहे

Shambhunath Shukla : लिखना मेरा शगल है। मुझे न क्रिकेट पसंद है न हॉकी न फुटबाल न टीवी देखना न मरने जीने की खबरें पढऩा लेकिन बिना कुछ लिखे मैं रह नहीं सकता। अब चूंकि कलम हाथ में पकड़कर लिखने का जमाना तो गया इसलिए लिखने की स्पीड भी बढ़ी है और टीवी देख-देखकर प्रतिक्रिया जताने की इच्छा भी बलवती हो गई। अब ज्यादातर अखबारों में तो संघी मार्का संपादक बैठे हैं जो मुझे छापने से रहे। लेख भेजने के बाद जवाब देना भी ठीक नहीं समझते इसलिए उनको चाहे जितना फोन करिए वे फोन ही नहीं उठाएंगे। शुक्र है फेसबुक का कि जो चाहो वह छाप तो सकते हो। और प्रतिक्रियाएं भी फौरन लीजिए। इसलिए मुझे लेखन का यह मंच सबसे अच्छा नजर आता है। मैं फिर अपना एक अनुभव शेयर कर रहा हूं।

Shambhunath Shukla : लिखना मेरा शगल है। मुझे न क्रिकेट पसंद है न हॉकी न फुटबाल न टीवी देखना न मरने जीने की खबरें पढऩा लेकिन बिना कुछ लिखे मैं रह नहीं सकता। अब चूंकि कलम हाथ में पकड़कर लिखने का जमाना तो गया इसलिए लिखने की स्पीड भी बढ़ी है और टीवी देख-देखकर प्रतिक्रिया जताने की इच्छा भी बलवती हो गई। अब ज्यादातर अखबारों में तो संघी मार्का संपादक बैठे हैं जो मुझे छापने से रहे। लेख भेजने के बाद जवाब देना भी ठीक नहीं समझते इसलिए उनको चाहे जितना फोन करिए वे फोन ही नहीं उठाएंगे। शुक्र है फेसबुक का कि जो चाहो वह छाप तो सकते हो। और प्रतिक्रियाएं भी फौरन लीजिए। इसलिए मुझे लेखन का यह मंच सबसे अच्छा नजर आता है। मैं फिर अपना एक अनुभव शेयर कर रहा हूं।

पढ़ते वक्त मैं अक्सर गांव भी जाया करता था। कानपुर शहर से कुल 40 किमी। साइकिल उठाई और चले गए अथवा झांसी पैसेंजर पकड़ कर तिलौंची स्टेशन उतरे और नहर का रास्ता ले लिया और करीब 15 किमी पैदल मार्च करते पहुंच गए। मैं तब बी.एससी में था। और दो-तीन बार घर से भागकर कलकत्ता व दिल्ली की यात्राएं कर आया था। मेरे साथ मेरे एक पोलेटिकल साथी मोना दा भी थे। नहर के किनारे हम लोग पैदल चले जा रहे थे। बारिश के कारण नहर की पटरी में फिसलन थी इसलिए हम लोगों ने नहर के पानी के साथ-साथ उगी घास पर चलने का निश्चय किया। तिलौंची से कुछ दूर आगे जाकर दो नहरें एक नहर और एक रजबहा साथ-साथ बहते हैं।

कब से यह तो पता नहीं लेकिन सुना है कि हमारे परदादा इसी नहर के किनारे-किनारे चलते हुए एक अनजाने गांव से यहां आकर बसे थे। यहीं आकर उन्होंने शुक्ल उपनाम धारण कर लिया। वैसे हमें नहीं पता कि हम कितनी पुश्तों से शुक्ल सरनेम लगाते आ रहे हैं। शायद परदादा के समय से ही यानी कोई 1865 से। परदादा 1858 में पैदा हुए थे। मां बाप मर गए तो वे अपने दो छोटे भाइयों के साथ मेरे मौजूदा गांव मौजा दुरौली डाकखाना गजनेर जिला कानपुर के साकिन हो गए। तब उनकी उम्र कोई सात आठ साल की रही होगी। एक शुक्ल परिवार ने उन्हें अपने यहां नौकर बना लिया इसलिए हम भी शुक्ल हो गए। खैर वो किस्सा कभी और। अभी तो नहर का किस्सा चल रहा था। नहर और रजबहे के बीच करीब दो सौ मीटर का फासला है और इस फासले में तब घना जंगल था। बस बीच-बीच में नहर विभाग की कोई कोठी दिख जाती तब कुछ नजर आता। असाढ़ या सावन का महीना रहा होगा। नहर के किनारे जंगल की तरफ के पेड़ आम के पके फलों से लदे थे। डालियां झुकी हुई पानी को छू रही थीं, कहीं-कहीं जामुन के पेड़ और इनके बीच पनीले सांप का गुच्छा। बंगाली बाबू मोना मोशाय तो एकदम भावुक हो उठे और बोले कि प्रकृति को अगर प्यार किया जाए तो वह इतना देती है कि इंसान सोच नहीं सकता। लेकिन फिर सिर्फ और सिर्फ उसको ही प्यार करना पड़ेगा। आपने उसकी तरफ से मुंह फेरा नहीं कि वह ऐसा बदला लेगी कि जीवन भर याद रहेगा। आज जब प्रकृति पर कारपोरेट घराने डाका डाल रहे हैं तो मोना दा की यह बात अक्सर याद आ ही जाती है।

वरिष्‍ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल के एफबी वॉल से साभार.

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