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झारखंड में बिजनेस करने जाएंगे तो जान चली जाएगी

: क्या आप झारखंड में बिजनेस करने जा रहे हैं? हां, तो ठहरिए! आप यदि ‘‘ए’’ ग्रेड के बिजनेसमैन नहीं हैं, तो आपकी जान भी जा सकती है। बच गए, तो लुटने से आपको कोई रोक नहीं सकता…। ऐसा आपको डराने के लिए नहीं, बल्कि आंकड़ों के आधार पर सतर्क किया जा रहा है, क्योंकि वहां की सरकार ‘विकलांग’ हो चुकी है। पढ़ें, अखिलेश अखिल की खास रपट…

: क्या आप झारखंड में बिजनेस करने जा रहे हैं? हां, तो ठहरिए! आप यदि ‘‘ए’’ ग्रेड के बिजनेसमैन नहीं हैं, तो आपकी जान भी जा सकती है। बच गए, तो लुटने से आपको कोई रोक नहीं सकता…। ऐसा आपको डराने के लिए नहीं, बल्कि आंकड़ों के आधार पर सतर्क किया जा रहा है, क्योंकि वहां की सरकार ‘विकलांग’ हो चुकी है। पढ़ें, अखिलेश अखिल की खास रपट…

झारखंड में पिछले 11 माह में 34 से ज्यादा व्यावसायियों की हत्या और 50 से ज्यादा उद्यमियों से हुई लूट को देखकर कहा जा सकता है कि यहां पुलिस-प्रशासन व्यवस्था पंगु हो चुकी है। अगर आप समझते हैं कि राज्य की अर्जुन मुंडा सरकार आपको सुरक्षा देगी, तो गलत समझ रहे हैं। जिनकी हत्याएं हुई हैं, उन्हें भी राज्य सरकार ने सुरक्षा देने का वादा किया था।

एक जानकारी और दे दें। अभी राज्य में व्यावसायियों से ‘लेवी वसूली’ के नाम पर जितने निजी संगठन काम कर रहे हैं, उतने शायद ही किसी और राज्य में हों। कहने के लिए देश के तमाम नक्सली गु्रपों का 2004 में सीपीआई (माओवादी) में विलय हो गया, लेकिन झारखंड में अभी भी आधा दर्जन से ज्यादा ग्रुप कार्यरत हैं और व्यावसायी निशाने पर हैं। यह ग्रुप हैं एमसीसी, जेएलटी, टीपीसी, जेपीएलएफ, पीपीसी और पहाड़ी चीता।

झारखंड रो रहा है। झारखंड बोले, तो आदिवासी, और आदिवासी बोले, तो एक खास निर्दोष संस्कृति। लगता है पूरे राज्य में लंपटता का आलम है। दिल्ली में बैठे लोगों को बिहार का लालू राज याद ही होगा। जिस तरह लालू राज में अपराधियों के पौ बारह थे और व्यापारियों की हत्या की जा रही थी, व्यापारी जान बचाकर भागते फिर रहे थे, आज वही अराजकता झारखंड में है। हत्या पर हत्या हो रही है और सरकार से लेकर विपक्ष चैन की नींद सो रहे हैं। आप कह सकते हैं कि झारखंड की सरकार भी लंपट है, जिसकी बागडोर नीरो के हाथ में चली गई है। आइए, आपको झारखंड की एक तस्वीर दिखाते हैं।

राज्य के गुमला, सिमडेगा और खूंटी इलाके में पिछले पांच दिनों में 10 व्यावसाइयों की हत्या से मातम का माहौल है, वहीं मुख्यमंत्री से लेकर उपमुख्यमंत्री केवल भाषण और बयानबाजी करते फिर रहे हैं। आपको बता दें कि खूंटी इलाके से सांसद हैं करिया मुंडा। मुंडा जी अभी लोक सभा के डिप्टी स्पीकर हैं। इलाके के सम्मानित लोगों में मुंडा की गिनती होती है, लेकिन हत्याओं की इस सूची से मुंडा को कोई मतलब नहीं। खबर लिखते समय मुंडा से इन हत्याओं के बावत जानकारी लेने की कोशिश की, तो मुंडा का फोन उनका पीए मदन सिंह मुंडा ने उठाया। हमने खूंटी में हुई हत्याओं के बारे में चर्चा की और मुंडा जी से बात कराने का आग्रह किया, तो पीए साहब झल्ला गए। कहने लगे, हां ठीक है, साहब अभी खाना खाए हैं और आराम कर रहे हैं। खूंटी पर अभी बात नहीं होगी। यह कहकर पीए ने फोन रख दिया।

मामला केवल खूंटी में 10 लोगों की हत्या का ही नहीं है। पिछले 11 माह में 34 व्यावसाइयों की हत्या गुंडे, अपराधी और नक्सलियों ने कर दी है। कुछ हत्याएं लेवी के लिए की गर्इं, तो कुछ पुलिस मुखबिर होने की वजह से। कुछ लोगों की जानें गैंगवार के कारण भी गई हैं। किस जिले में कितने व्यावसायियों की हत्याएं हुई हैं, उसकी सूची आप देख सकते हैं।

बोकारों में तीन, गढ़वा में 2, साहेबगंज में 3, पलामू में 3, रांची में 7, खूंटी में 9, देवघर, दुमका, धनबाद, गिरीडीह, गुमला, गोड्डा और जामताड़ा में एक-एक हत्या हुई है। मामला केवल हत्या करने तक का ही नहीं है। पिछले 11 महीनों में सूबे के कोई 51 व्यावसायियों को लूटा भी गया। इसमें सबसे ज्यादा 19 रांची के व्यावसायी लूट के शिकार हुए हैं। इसके बाद धनबाद के 6, रामगढ़ के 3, देवघर के 3, जमशेदपुर के 3, हजारीबाग के 3, सिमडेगा के 2, गिरीडीह के 2, खूंटी के 2, चाइबासा के 2 और गुमला, गोड्डा, बोकारो, पलामू के एक-एक व्यावसायी लूट के शिकार हुए हैं। आपको बता दें कि अर्जुन मुंडा के पास गृह मंत्रालय भी है, लेकिन उनकी पुलिस लोगों को शायद ही सुरक्षा प्रदान कर रही है।

इस मामले में साइमन मरांडी कहते हैं, ‘लगता है कि प्रदेश में खूनी क्रांति चल रही है। अगर सरकार व्यावसायी और जनता को सुरक्षा प्रदान करने में विफल है, तो सरकार का क्या मतलब है? आलम तो यह है कि कब कौन लुट जाए, कहा नहीं जा सकता। इसकी ज्यादा जानकारी, तो अर्जुन मुंडा ही दे सकते हैं।’

इस मामले में संवाददाता ने राज्य के दोनों उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सुदेश महतो से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन दोनों के मोबाइल बंद थे। एक व्यावसायी ने इस संवाददाता को बताया कि एक तो सरकार हमें प्रोटेक्शन नहीं देती और जब हम पुलिस के पास जाते हैं, तो हमें उन्हें अलग से पैसे भी देने पड़ रहे हैं। कई दफा पुलिस अधिकारी को हम लिख चुके हैं, लेकिन यहां कोई सुनता ही नहीं है। मामला यहीं तक नहीं हैं। राज्य सरकार आदिवासी समाज को भी लंगड़ा-लूला बनाने से बाज नहीं आ रही।

पिछले सप्ताह राज्य के मुखिया अर्जुन मुंडा ने ऐलान किया कि अगले जनवरी माह से सूबे के सभी गरीबों को 10 रुपये में धोती, साड़ी दी जाएगी। सूबे के मुखिया की इस योजना की घोषणा के बाद सरकारी अमला तेजी से इस ‘महायोजना’ को अमली जामा पहनाने में जुट गया है। कहा जा रहा है कि इस महती योजना के तहत सूबे के 35 लाख उन लोगों को फायदा होगा, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं। इसके पहले भी सरकार गरीबों को जिंदा रखने के लिए या आप कह सकते हैं कि गरीबों पर उपकार करने के लिए 5 रुपये में ‘दाल-भात’ की योजना चला रही है। सरकार का तो दावा है कि इस योजना से गरीबों को बहुत ही राहत है और गरीब चैन की नींद सो रहे हैं।

लेकिन सरकारी दावे और हकीकत में जो अंतर है, वह सरकार की बदनीयति की पोल खोलती है। यकीन न हो, तो आप झारखंड के किसी भी इलाके में चले जाएं, यह योजना देखने को नहीं मिलेगी। कुछ शहरी और कस्बाई सेंटरों को छोड़ दें, तो आज भी राज्य के अधिकतर गरीब भात और रोटी के लिए तरसते नजर आ रहे हैं। फिर इस योजना का एक ‘साइड इफेक्ट’ भी देखने को मिल रहा है। देश का दूसरा कालाहांडी कहा जाने वाले पलामू इलाके में जहां-जहां भात-दाल की व्यवस्था है, वहां के लोग अब काम करने से कन्नी काटने लगे हैं। बिना काम किए ही किसी को भोजन मिले, तो किसी को काम की क्या गरज?

पलामू इलाके में गरीबों के बीच काम कर रहे ठाकुर प्रसाद कहते हैं कि ‘झारखंड की जनता प्रकृति के साथ तालमेल करके और मेहनत के दम पर जीने वाली थी। यह इस राज्य की पहचान थी। लेकिन सरकार ने भात-दाल, धोती, साड़ी और न जाने क्या-क्या योजनाएं चलाकर राज्य को विकलांग बना दिया है। राज्य की असली पहचान की सरकार ऐसी-तैसी कर रही है। राज्य बनने से पहले ऐसा लगा था कि राज्य के नेता राज्य की जनता के साथ मिलकर सूबे की तकदीर बदल देंगे, लेकिन यहां तो जनता को अपाहिज बना दिया गया है।’

ठाकुर प्रसाद की बातों में दम भी है। 2010 में विधान सभा चुनाव के समय सभी राजनीतिक दलों ने किसानों को पानी देने का वादा किया था। आज तक किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाया है। राज्य के किसान आठ माह तक पानी के अभाव में खेती नहीं कर पा रहे हैं, जिससे राज्य की कृषि विकास दर लगातार घटता जा रहा है। ठाकुर प्रसाद कहते हैं, ‘अगर यह सरकार सिर्फ पानी की व्यवस्था कर दे, तो यह देश का सबसे धनी राज्य हो सकता है। इस राज्य में पानी के लिए कोई बजट नहीं है। यहां के लोग इतने मेहनती हैं कि देश के हर इलाके में जाकर अपनी मेहनत से वे वहां की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं। 90 हजार से ज्यादा झारखंडी मजदूरों ने अंडमान निकोबार को कहां से कहां पहुंचा दिया है, आप जाकर देख सकते हैं, लेकिन यहां की सरकार इन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने की बजाय खैरात देकर उन्हें लंगड़ा-लूला बनाती जा रही है।’

सरकार के तीन कर्ता-धर्ता

राज्य में कहने को तो मुख्यमंत्री समेत 12 लोगों के हाथ में सत्ता चलाने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन असलियत कुछ और ही है। भाजपा, जेएमएम और आजसू के मेलजोल से चलने वाली सरकार के मुख्य कर्ता-धर्ता तीन ही हैं। भाजपा के विधायकों और मंत्रियों को अर्जुन मुंडा हांक रहे हैं, तो जेएमएम के मंत्री विधायक उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इशारे पर नाच रहे हैं। उधर पांच विधायकों के दम पर हर सरकार में शामिल रहने वाली आजसू को उसके मुखिया और उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो नियंत्रित कर रहे हैं। इन्हीं तीनों को आप सरकार कहें या फिर कुछ और। तभी तो जेएमएम के वरिष्ठ नेता व विधायक साइमन मरांडी इस सरकार को फरेबी से ज्यादा कुछ नहीं मानते। साइमन मरांडी कहते हैं कि ‘हमें शर्म होती है कि हमारी पार्टी भी सरकार में है। जब जनता का कोई काम ही हम नहीं करा सकते और विकास का कोई काम ही नहीं दिखा सकते, तब हमारे भाषण देने से क्या होगा?

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का यह लिखा हमवतन अखबार में प्रकाशित हुआ है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

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