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सुख-दुख...

टारगेट तो क्राइम का भी होता है भाई!

 

प्रोफशनल और कारपोरेट कल्चर वाला अखबार ज्वाइन किया. एडिटर ने उसे पहले ही दिन एक रिपोर्ट थमायी. रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे अखबार में रोज अपराध की औसत 19 खबरें थी. उसे हर दिन 31 खबर का टारगेट दिया गया. वह चकराया. इतना क्राइम होगा, तभी तो इतनी खबरें बनेगी. वह इस बात की गारंटी देने को तैयार था कि उससे कोई खबर छूटेगी नहीं, लेकिन हर दिन गिन कर 31 खबरें कहां से लायेगा? एडिटर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. झक मार कर उसने टारगेट पूरा करने की कसम खायी और निकल पड़ा खबर खोजने.

 

प्रोफशनल और कारपोरेट कल्चर वाला अखबार ज्वाइन किया. एडिटर ने उसे पहले ही दिन एक रिपोर्ट थमायी. रिपोर्ट के मुताबिक दूसरे अखबार में रोज अपराध की औसत 19 खबरें थी. उसे हर दिन 31 खबर का टारगेट दिया गया. वह चकराया. इतना क्राइम होगा, तभी तो इतनी खबरें बनेगी. वह इस बात की गारंटी देने को तैयार था कि उससे कोई खबर छूटेगी नहीं, लेकिन हर दिन गिन कर 31 खबरें कहां से लायेगा? एडिटर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था. झक मार कर उसने टारगेट पूरा करने की कसम खायी और निकल पड़ा खबर खोजने.
 
जिस दिन एक भी खबर कम पड़ती, तो एडिटर उसे खूब लताड़ता. बोलता, डॉक्टरों को देखो, अपने वेतन से बीस गुना ज्यादा बिजनेस मैनेजमेंट को देते हैं. मरीज को कस्टमर और बीमारी को अपरच्यूनिटी मानता है. तुम जितने हजार वेतन लेते हो, हर दिन उतनी खबर तक नहीं ला पाते? डॉक्टरों से सीखो. हर इनसान के कैरेक्टर में क्राइम ढूंढ़ो. तब तक उसमें ताक-झांक करो, जब तक वह तुम्हें क्रिमिनल दिखायी नहीं दे.
 
बेचारा रिपोर्टर परेशान रहता. छोटा-मोटा क्राइम भी हो, तो गुड़ की मक्खी की तरह उससे चिपक जाता. लोग जिन छोटे-मोटे मामलों को रफा-दफा करना चाहते, उनमें भी अखबार में छपने लायक मसाला खोज निकालता. खबर लिखने से ज्यादा, उसकी गिनती को लेकर सतर्क रहता. किसी से मिलता, बस क्राइम के बारे में बात करता. हर इनसान और वस्तु को संदेह की नजर से देखता. खबर निकालने के लिए उसने थानेदार से दोस्ती गांठी, मगर थानेदार ने साफ -साफ बता दिया कि उसका भी हर दिन का टारगेट फिक्स्ड है. सौ रुपया भी कम पड़ा नहीं कि थानेदारी गयी. लिहाजा आधे से ज्यादा क्राइम ले-देकर मैनेज हो जाते. उसने अक्ल लगायी और जा पहुंचा सरकारी अस्पताल, मगर डॉक्टर की हालत भी कुछ वैसी ही थी, जैसी थानेदार की. शहर के अस्पताल में पोस्टिंग की खातिर वे आधे वेतन की कुरबानी दे रहे थे. क्राइम और एक्सीडेंट के आधे से ज्यादा मामले अस्पताल में ही ले-दे कर सेटल कर रहे थे. मामले का रिकॉर्ड ही नहीं बनता, तो खबर कैसे बने.
 
हार कर उसने तय किया कि छोटे-बड़े दादाओं और क्रिमिनलों से दोस्ती करेगा. वहीं से कुछ खबर निकाल लेगा. उनके बीच घुसपैठ के लिए वह अपने भीतर वैसे ही हाव-भाव पैदा करने में जुट गया, मगर रिपोर्टर के चरित्र पर दादाओं को भरोसा नहीं हुआ. उसने एक कोशिश और की. दादाओं के अंदाज में शराब पी ली. पहली-पहली बार पी थी. लिहाजा सड़क किनारे बेसुध लुढ़क गया. दूसरे दिन एडिटर फिर टेबुल पर घूंसा मार रहा था : ‘नालायक, डॉक्टरों से कुछ सीखो..’ उसी दिन दूसरे अखबारों में एक खबर ज्यादा थी, ‘शराब के नशे में धुत्त युवक को लॉरी ने रौंदा.’
 
जेपी सिंह
 
प्रभात खबर, देवघर
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