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टीआरपी के दुष्चक्र में फंसा बुद्धू बक्सा

 लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रेस की भूमिका, कार्यशैली और व्यवहार में तीव्र गति से परिवर्तन आ रहा है। एक ओर जहां जन अपेक्षाओं का बोझ है तो वहीं दूसरी ओर बाजार में टिके रहने की जद्दोजहद और पेशागत मजबूरियां भी हैं। बाजारीकरण, उदारीकरण ने जहां पत्रकारिता के स्वरूप और आत्मा को हिलाया-डुलाया और बदला है तो वहीं टीआरपी के मीटर ने ख़बरची चैनलों को खिचड़ी कार्यक्रम पेश करने को विवश किया है।

 लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रेस की भूमिका, कार्यशैली और व्यवहार में तीव्र गति से परिवर्तन आ रहा है। एक ओर जहां जन अपेक्षाओं का बोझ है तो वहीं दूसरी ओर बाजार में टिके रहने की जद्दोजहद और पेशागत मजबूरियां भी हैं। बाजारीकरण, उदारीकरण ने जहां पत्रकारिता के स्वरूप और आत्मा को हिलाया-डुलाया और बदला है तो वहीं टीआरपी के मीटर ने ख़बरची चैनलों को खिचड़ी कार्यक्रम पेश करने को विवश किया है।

टीआरपी का अर्थ है- किसी कार्यक्रम को देखने वाले दर्शकों की संख्या जितनी होगी, उसकी टीआरपी भी उतनी अधिक होगी। ऐसे कई सारे कार्यक्रम मिलकर किसी चैनल को नम्बर 1 या फिसड्डी बनाते हैं। जिस चैनल के जितने ज्यादा दर्शक  होंगे अर्थात् जिसकी टीआरपी जितनी ज्यादा होगी, उसे उतने ही ज्यादा विज्ञापन मिलेंगे। यही विज्ञापन इन न्यूज चैनलों की मोटी कमाई का मुख्य आधार हैं। तकनीकी तौर पर टीआरपी को समझे तो टैम इंडिया नाम की एक रेटिंग एजेंसी है जो विभिन्न कार्यक्रमों की टीआरपी बताती है।

देश के विभिन्न हिस्सों में एजेंसी के कार्यालय है, जिनके द्वारा लोगों की राय एकत्र की जाती है और उसी के आधार पर कार्यक्रमों की टीआरपी तय की जाती है। इस राय का बड़ा हिस्सा तो दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बंगलुरू जैसे महानगरों से आता है। छोटे शरों और कस्बों तक तो टैम इंडिया की पहुंच आज भी न के बराबर है। वहां भी इस रायशुमारी में मध्यमवर्ग का ऊपरी हिस्सा ही जुड़ा है। देश  का ग्रामीण क्षेत्र, जहां 70 फीसदी आबादी रहती है, उसका इस रेटिंग सिस्टम से कोई वास्ता ही नहीं होता है।

इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि टैम इंडिया चंद लाख संभ्रात वर्गीय लोगों की रायशुमारी करके सवा सौ करोड़ जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। दूसरे, इन न्यूज चैनलों के मालिकों व टैम इंडिया के अंदरूनी गठजोड़ और मिलीभगत का भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है। हर सप्ताह शुक्रवार को आने वाली टीआरपी पर ही इन न्यूज चैनलों का भविष्य टिका होता है।

टीआरपी के इसी गुणा-भाग के कारण न्यूज चैनलों  का स्तर गिरता चला गया। अब न्यूज चैनलों ने वह राह पकड़ी जिसने चैनलों की टीआरपी को तो आसमान चढ़ा दिया, परन्तु पत्रकारिता अपनी वि’वसनीयता, विशिष्टता  खोकर पे्रत योनि में भटकने को अभिशप्त हो गई। सामाजिक सरोकार निरंतर दबते चले गए। चमक-दमक, ग्लैमरस चेहरे, फर्राटेदार अंग्रेजी, गति, गलाकाट प्रतियोगिता, बड़ी स्पोटर्स व फिल्मी हस्तियों के इंटरव्यू, लाइव शो, चैटिंग, फोनो-वीडियो कांफ्रेसिंग तथा गरमा-गरम बहसें न्यूज चैनलों का मुख्य पहलू बन गईं।

चैबीस घंटे न्यूज प्रसारित करने की पेशागत मजबूरी और हर दस मिनट में ब्रेकिंग न्यूज देने की प्रवृत्ति ने पत्रकारिता के धर्म और मर्म दोनों को गहरी ठेस पहुंचाई है। सबसे पहले न्यूज देने की होड़ में कई दफा न्यूज की प्रामणिकता और सच्चाई का महत्वपूर्ण पहलू नजरअंदाज कर दिया जाता है।

सितंबर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर हुए बम विस्फोट जैसी संवेदनशील और देश  की सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण खबर को सबसे पहले दिखाने की होड़ में लगभग सभी चैनलों ने अधकचरी खबर, मृतकों और घायलों की संख्या ही प्रसारित की। जिससे दिल्ली और देशभर में डर, दहशत और असमंजस को माहौल कुछ समय के लिए व्याप्त हुआ। सब कुछ जानते बूझते हुए भी टीआरपी के दीवाने न्यूज चैनल बार-बार गलतियां दोहराते रहते हैं।

टीआरपी के फेर में कई बार देश  और जनहित से जुड़े अनेक महत्वूपर्ण, संवदेनशील और जरूरी मुद्दे प्रकाश में नहीं आ पाते हैं। मटुक नाथ-जूली, मीका-राखी सांवत जैसे मुद्दों पर घंटों बहस और लाइव चर्चा टीआरपी का ही कुफल था। बिकाऊ, चटपटी, मसालेदार खबरों की खोज और पीछा करते-करते न्यूज चैनल और पत्रकारिता आज उस मुकाम पर पहंुच गयी है, जहां पर न्यूज दोयम स्तर पर पहुंच चुकी है।

न्यूज चैनलों की हालत उस खटारा साइकल की तरह हो चुकी है जिसमें घंटी के अलावा हर पुर्जे से आवाज आती है अर्थात न्यूज चैनलों की आत्मा न्यूज ही नदारद नजर आती   है। जनपक्ष को देश -दुनिया के सामने लाने और सरकार के कानों तक आम आदमी की आवाज, दुख-दर्दे को पहुंचाने की अहम् जिम्मेदारी से हटकर मीडिया निजी स्वार्थों, व्यवासायिक गणित और बिकने वाले उत्पाद और सनसनी फैलाने वाली खबरों के इर्द-गिर्द मंडराता दिखता है।

भूख, गरीबी, बेरोजगारी, बालश्रम, महिलाओं के प्रति बढ़ता अपराध का ग्राफ, किसानों की बदहाली, भ्रष्टाचार आदि पर मीडिया की जुबान जरूरत और निजी नफे-नुकसान के हिसाब से ही ख्ुालती है। जिस मुद्दे को एक दिन लगभग सारा मीडिया चीख-चीख कर देश-दुनिया को बताता और समझाता है अगली सुबह वही खबर स्क्रीन से गायब होती है। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में मीडिया, कारपोरेट और राजनीति का विकृत गठजोड़ देश  की जनता देख चुकी है। फिल्मी किस्सों, डेली सोप की उबाऊ कहानियों, क्रिकेट और अपराध की डोज देकर न्यूज चैनल जनता को सुलाने, भरमाने और भटकाने  का काम बखूबी करते हैं।           

टीआरपी के लिए अंधविश्वास, भूत-प्रेत-पिशाच के लाइव शो  कुछ न्यूज चैनलों पर जनता को परोसी जा रही इस अंधवि’वास की खुराक के पीछे एक विशेष  राजनीतिक मकसद ही छुपा है। मौजूदा दौर में सरकार द्वारा मीडिया पर इतना जबरदस्त व चैतरफा दबाव बनाया जा रहा है कि मीडिया उसका विरोध करने की बजाय उसके दबाव में आकर अपने निजी लाभ तलाशने में लगा है। इसके विपरित अगर मीडिया तमाम राजनैतिक कुरीतियों को समाज के सामने लेकर आएगा तो लोगों में एक राजनीतिक जागरूकता आएगी तथा वे विरोध करने का पक्ष चुनेंगे।

लेखक डा. आशीष वशिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

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