: हू इज मजलिंग द मीडिया? सरकार या टाइम्स ऑफ़ इंडिया वाले! : अभी जब विश्व में इन्टरनेट सेंसरशिप के खिलाफ अभियान चल रहा है उस वक़्त पत्रकारों को वेज बोर्ड दिए जाने की कार्रवाई को मीडिया का गला घोंटने की कार्रवाई बताने वाले (मजलिंग द मीडिया) टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रबंधन ने अपने पटना दफ्तर में सम्पादकीय विभाग के कर्मियों का इन्टरनेट कनेक्शन काट दिया है. उनकी शिकायत यह है कि इन्टरनेट की वज़ह से उनकी तमाम कार्रवाइयां विभिन्न वेब-साइट्स के ज़रिये पूरे देश-दुनिया को मालूम हो जा रही हैं.
प्रबन्धन इस बात से खफा है कि इसी नेट कनेक्टिविटी की वज़ह से टाइम्स प्रबंधन की छवि मीडिया, प्रेस कौंसिल और कानून की दुनिया से जुड़े लोगों के बीच काफी खराब हो रही है. अब टाइम्स ऑफ़ इंडिया पटना के पत्रकार नेट का इस्तेमाल नही कर सकते हैं. यह सब लागू हुए एक सप्ताह हो गया है. मगर शायद टाइम्स प्रबंधन भूल गया है कि आज जब हरेक व्यक्ति की जेब में मोबाइल, नोटपैड है और पीठ की बैग में लैपटॉप है, वैसे माहौल में दफ्तर में इन्टरनेट कनेक्शन काटने का क्या अर्थ रह जाता है. इसी तरह टाइम्स ऑफ़ इंडिया न्यूज़पेपर एम्लाइज़ यूनियन के अध्यक्ष जो बिहार श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के महासचिव एवं भारतीय प्रेस परिषद् के सदस्य भी हैं, को टाइम्स प्रबंधन के निर्देश पर तमाम बीट लेकर उन्हें पैदल करने की कोशिश की गई.
उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने मनिसाना वेतन बोर्ड का वेतनमान दिलाने के लिए श्रम विभाग, डी. एल. सी से लेकर पटना हाई कोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गए. इतना ही नहीं, जब टाइम्स पटना प्रबंधन ने जुलाई २०११ में अपना कुम्हरार स्थित प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया तो उसकी गुहार लगाने भी दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए. २२० दिनों से हटाये गए कर्मी धरने पर आज भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया पटना दफ्तर के सामने फ्रेजर रोड पर बैठे हुए हैं.
इस दरम्यान मरने वाले श्रमिकों और पागलपन के कगार पर पहुँचने वाले श्रमिकों तथा उन श्रमिक परिवारों के बेटे-बेटियों जिनकी पढाई अधबीच छूट गई, जिनकी शादियाँ रुकी पड़ी हैं या विलंबित हो रही हैं, सबों का दुःख दर्द इन्ही वेब साइटों व वैकल्पिक मीडिया के सहारे आम लोगों, न्यायधीशों, कानूनविदों, राजनीतिज्ञों और समाजकर्मियों तक पहुंचाई क्योंकि प्रिंट मीडिया में ये खबरें छापने की हिम्मत कहीं नज़र नही आ रही थी. प्रसिद्ध समाजसेवी मेधा पाटकर भी इन कर्मियों का दुःख दर्द सुनने धरना स्थल पर पहुंची और टाइम्स ऑफ़ इंडिया दफ्तर के सामने से जुलूस लेकर जाते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया होश में आओ जैसे नारे भी लगाये.
मगर इससे और कुछ हुआ हो या नहीं, इन्टरनेट यूज करने वाले मीडिया कर्मियों और उनकी चर्चा की वजह से प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश ही नहीं दुनिया के लोगों तक बात पहुंची. टाइम्स प्रबन्धन या उनके भाड़े के पैरोकार अपनी ओर से एकतरफा प्रचारात्मक कार्रवाई नहीं चला सके क्योंकि उनको लोगों के सवालों से जूझना पड़ा और वे उन सवालों का कनवींसिंग जवाब लोगों को नहीं दे सके.
अब बताया जा रहा है कि प्रबंधन के खैर-ख्वाह सेलेक्टेड कुछ पत्रकारों को इन्टरनेट कनेक्शन दिया जाएगा, चूँकि ऐसा नहीं लगे कि सिर्फ वेज बोर्ड पत्रकारों का इन्टरनेट काटा गया है इसलिए सबों का कनेक्शन काट दिया गया है, मगर जब इन्टरनेट लगाने की बात आएगी तो सिर्फ सेलेक्टेड कुछ पत्रकारों को ही दिया जाएगा. यह सेंसरशिप सरकारी नहीं खेतारी है. सरकारी सेंसरशिप ख़राब- कम्पनी सेंसरशिप अच्छा. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति. और वो हिंसा जो हिंसा हिंसा चिल्लाने वालों के द्वारा की जा रही हो. प्रश्न है "हू इज म्जलिंग द मीडिया? सरकार या टाइम्स ऑफ़ इंडिया क़ी कम्पनी सरकार?





