वे बड़ा लक्ष्य लेकर गुजरात से लखनऊ पहुंचे हैं। अगले ही कुछ महीनों में उन्हें यहां पार्टी के लिए रेतीली हो चली जमीन में शानदार चुनावी फसल लहलहानी है। इस मुश्किल काम की जिम्मेदारी उनके उस्ताद ने दिलाई है। सो, वे पूरे प्रदेश में घूम-घूमकर सियासी अलख जगाने की जुगाड़बंदी देख रहे हैं। फिलहाल, उन्हें चुनावी संजीवनी के लिए रामलला की शरण ही मौंजू लग रही है। उन्हें लगता है कि पार्टी को राम-मंदिर मुद्दे से दूरी नहीं बनानी चाहिए। क्योंकि, देश के करोड़ों-करोड़ हिंदुओं की भावनाएं इससे जुड़ी हैं।
उन्हें यह पसंद नहीं आ रहा कि कुछ सहयोगी दलों के दबाव में इस मुद्दे को दरकिनार कर दिया जाए। वे ये बातें अनौपचारिक रूप से अपने सहयोगियों के बीच कहने लगे हैं। ‘मिशन-2014’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के रूप में उत्तर प्रदेश संगठन का प्रभारी बनाया गया है। उनकी पहली जिम्मेदारी यही है कि वे हर इलाके में जाकर ‘जिताऊ’ उम्मीदवारों की एक सूची तैयार करें। ताकि, इस पर आगे चर्चा की जा सके। वे अपने मिशन में जुट गए हैं। इसी के तहत शनिवार को वे अयोध्या पहुंचे थे। वहां पर उन्होंने भव्य राम-मंदिर बनवाने का संकल्प दोहराया। इस तरह से उन्होंने संकेत दे दिए कि अब की बार भाजपा के लिए यह मुद्दा ‘अछूत’ नहीं रहेगा और रामलला की ‘कृपा’ से बड़ा सपना हकीकत बन जाएगा।
हम यहां बात कर रहे हैं भाजपा के नव नियुक्त राष्ट्रीय महासचिव अमित शाह की। वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खास करीबी माने जाते हैं। मोदी सरकार में वे चर्चित गृहराज्य मंत्री रह चुके हैं। मंत्री के रूप में गृह मंत्रालय के अलावा उनके पास करीब 10 मंत्रालयों का कामकाज था। मोदी सरकार में लंबे समय तक शाह का राजनीतिक रुतबा रहा है। 2002 में गुजरात में भयानक सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों के बाद ही टीम मोदी ने सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण का खेल खेला था। इसमें वे पूरी तौर पर सफल भी रहे। तमाम विरोध के बावजूद उन्हें चुनावी सफलता मिली थी। इस दौर में ही अमित शाह जैसे मोदी के ‘नवरत्नों’ का उभार हुआ था। अमित शाह, शुरुआत से ही जोशीले जज्बे के शख्स रहे हैं। जल्दी ही उन्होंने समझ लिया था कि उनके उस्ताद मोदी को किस तरह की राजनीतिक शैली पसंद है? इस हुनर में वे इतने दक्ष हो गए कि उन्होंने मोदी के तमाम और करीबियों को पछाड़ कर रख दिया। 2004 आते-आते उनकी गिनती मोदी के सबसे उम्दा वफादारों में होने लगी थी।
हिंदुत्व के प्रति वे आम तौर पर बेलाग टिप्पणियां करते रहे हैं। कई बार तो उनका अंदाज प्रवीण तोगड़िया जैसे विहिप के जाने-माने नेताओं से भी ज्यादा ‘विस्फोटक’ होता था। इसके चलते वे संघ परिवार के दूसरे घटकों के बीच भी खासे लोकप्रिय बन गए। दरअसल, टीम मोदी को काफी पहले से 2007 की चुनावी चुनौती की चिंता हो गई थी। क्योंकि, 2002 का चुनाव तो दंगों के बाद हुए हिंदुवादी ध्रुवीकरण के बल पर आसानी से पार हो गया था। ऐसे में, हर तरह के कंटक दूर करने के लिए शाह जैसे नेताओं को खास जिम्मेदारियां दी गई थीं। भाजपा नेताओं ने यह प्रचार जोर-शोर से शुरू किया था कि कुछ इस्लामी आतंकवादी संगठन नरेंद्र मोदी के खिलाफ घातक साजिश रच रहे हैं। ऐसे में, जरूरी है कि सुरक्षा मामलों में प्रशासन ज्यादा सतर्क रहे। गृहराज्य मंत्री के रूप में शाह खुद इस तरह के संवेदनशील मामलों की निगरानी करते थे।
26 नवंबर 2005 को राज्य की पुलिस ने एक ‘मुठभेड़’ में शोहराबुद्दीन नाम के व्यक्ति को मार गिराया था। कहानी यही बनाई गई कि ये शख्स आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैएबा से जुड़ा था। इसके तहत मुख्यमंत्री मोदी की हत्या की साजिश रची जा रही थी। इसमें इसकी खास भूमिका थी। शोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी को भी तमाम यातनाएं दी गई थीं। उसके साथ सामूहिक बलात्कार भी हुआ था। बाद में, उसकी भी मौत हो गई। एक साल बाद इस ‘मुठभेड़’ के चश्मदीद गवाह तुलसी प्रजापति को भी एक ‘मुठभेड़’ में मार गिराया गया। लेकिन, कुछ मानवाधिकार संगठनों और शोहराबुद्दीन के भाई रुवाबुद्दीन ने अदालतों का दरवाजा खटखटाना शुरू किया। गुहार लगाई कि फर्जी मुठभेड़ों में दोनों को मारा गया है। ऐसे में, इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए। बवाल बढ़ा तो राज्य सरकार ने मामला सीआईडी पुलिस को दे दिया था। मजेदार बात है कि इस मामले में आरोप गृहमंत्री शाह पर भी थे। लेकिन, जांच सीआईडी को सौंपी गई, जो कि शाह के गृह मंत्रालय के मातहत ही काम करती थी।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जब उच्च न्यायालय ने सीबीआई जांच के आदेश दिए, तो इस मामले में पुलिस के कई आलाधिकारी भी फंसने लगे। पड़ताल में ये तथ्य सामने आए कि डीआईजी डी जी वंजारा, राजकुमार पांड्या सहित आठ बड़े पुलिस अधिकारियों की भूमिका इन मुठभेड़ों में रही है। मोदी और शाह के प्रति खास वफादारी दिखाने के लिए इन अधिकारियों ने मुठभेड़ के नाम पर हत्याएं कराई थीं। पड़ताल के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि सीआईडी के अधिकारियों ने अमित शाह को बचाने के लिए जांच से तमाम जरूरी दस्तावेज ही गायब करा दिए थे। सीबीआई ने तमाम प्रमाणों के साथ ये तथ्य अदालत में रखे, तो अमित शाह पर भी कानूनी शिकंजा कसा। गिरफ्तारी से बचने के लिए शाह ने उच्च न्यायालय से फटाफट जमानत ले ली। लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय में जमानत के मामले में याचिका हो जाने से केस ने गंभीर मोड़ ले लिया। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि जब तक इस मामले की सुनवाई इस अदालत में चल रही है, तब तक अमित शाह गुजरात में नहीं रहेंगे। ताकि, वे अपने राजनीतिक रुतबे के चलते मामले में हस्तक्षेप न कर पाएं।
लगभग इसी दौर में बहुचर्चित इशरत जहां कांड भी हुआ था। मुंबई की एक 19 वर्षीय लड़की इशरत को तीन अन्य लोगों के साथ अहमदाबाद में मार गिराया गया था। कहानी यही प्रचारित की गई कि इशरत और उसके साथी आतंकी संगठन लश्कर की योजना के तहत मोदी को मारने अहमदाबाद पहुंचे थे। बाद में, इशरत के परिजनों ने अदालत में गुहार लगाई, तो उच्च स्तरीय जांच शुरू हुई। सीबीआई जांच में यह तथ्य सामने आया कि इस मामले में भी उन पुलिस अफसरों की भूमिका रही है, जिन्होंने शोहराबुद्दीन कांड को अंजाम दिया है। शोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह को जेल भी जाना पड़ा है। अभी भी उन्हें कानूनी शिकंजे से मुक्ति नहीं मिली। इस बीच इशरत जहां मामले में सीबीआई ने पिछले दिनों अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया है। इसमें कहा गया है कि आठ पुलिस अधिकारियों ने अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए यह फर्जी मुठभेड़ की थी। इस मामले की आंच अमित शाह और नरेंद्र मोदी तक पहुंच सकती है। हालांकि, पहले आरोप पत्र में इन दोनों के नाम नहीं है। लेकिन, 26 जुलाई को इस मामले में एक पूरक आरोप पत्र भी आने वाला है। कयास यही है कि इसमें अमित शाह का नाम जरूर आ सकता है। क्योंकि, सीबीआई के हाथ कुछ प्रमाण आ गए हैं। यूं तो मोदी ने जगह-जगह कहना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस नेतृत्व के इशारे पर उन्हें और अमित शाह को इस मामले में घसीटने की साजिश चल रही है। लेकिन, वे इससे डरने वाले नहीं हैं।
शोहराबुद्दीन और इशरत जहां मामले में शक की सुई शाह की तरफ घूमी है। इसके बाद भी अमित शाह फिर से भारी रुतबे वाले नेता हो चले है। क्योंकि, नरेंद्र मोदी का उन्हें पूरा राजनीतिक संरक्षण हासिल है। हालांकि, शोहराबुद्दीन और प्रजापति फर्जी मुठभेड़ों के मामले अभी भी लंबित हैं। अमित शाह, जमानत पर बाहर हैं। लेकिन, इस मामले से उनकी राजनीतिक सेहत पर शायद ही कोई अंतर पड़ा हो। राज्य की राजनीति में उनका पुराना रुतबा फिर से कायम हो गया है। टीम मोदी लगातार तीसरी बार विधानसभा का चुनाव जीतने में सफल रही है। इसके बाद मोदी को दिल्ली में बड़े किरदार के रूप में स्थापित करने के लिए मुहिम तेज हुई है। संघ नेतृत्व ने भी दबाव बढ़ाया कि 2014 के चुनाव के लिए मोदी को ही पार्टी का चुनावी चेहरा बनाया जाए। क्योंकि, दबंग नेता मोदी ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई राजनीतिक करिश्मा कर सकते हैं। इसी के बल पर भाजपा एक बार फिर केंद्रीय सत्ता हासिल कर सकती है। मुहिम मोदी को लेकर पार्टी के अंदर भी विरोध रहा है। यहां तक कि वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने दबाव बनाने के लिए अपने इस्तीफे का कार्ड भी चला था। लेकिन, संघ नेतृत्व के दबाव के चलते आडवाणी की नाराजगी भी मोदी मुहिम को नहीं थाम पाई। भाजपा की गोवा कार्यकारिणी में मोदी को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बना दिया गया।
इस नई जिम्मेदारी के बाद मोदी भाजपा की राजनीति में बड़े ‘पॉवर हाऊस’ बन गए हैं। टीम मोदी को अच्छी तरह पता है कि यदि प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करना है, तो उत्तर प्रदेश में पार्टी की सेहत ठीक करनी होगी। क्योंकि, यहां पर लोकसभा की 80 सीटें हैं। जबकि, पिछले दो चुनावों से यहां पर भाजपा महज 10 सीटों पर अटकी हुई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 120 सीटें हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि इनमें से जब तक 50 सीटें भाजपा की झोली में नहीं आएंगी, तब तक भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बनना मुमकिन नहीं हो सकता। इस खास राजनीतिक जरूरत ध्यान में रखते हुए मोदी ने अपने खास वफादार अमित शाह को उत्तर प्रदेश संगठन का प्रभार दिला दिया है। ताकि, वे प्रदेश में किसी न किसी तरीके से जीत का मंत्र ढूंढ सकें। संघ नेतृत्व के इशारे पर यहां पर एकबार फिर अयोध्या मुद्दा गर्म करने की तैयारी हुई है। उल्लेखनीय है कि 1996 में पहली बार भाजपा ने केंद्र की सत्ता का स्वाद चखा था। यह अलग बात है कि यह सरकार महज 13 दिन ही चल पाई थी। लेकिन, इसके बाद एनडीए के राजनीतिक प्रयोग से भाजपा नेतृत्व वाली सरकारें छह साल तक सत्ता में रही हैं। लेकिन, गठबंधन राजनीति की बंदिशों के चलते भाजपा को राम-मंदिर सहित सभी विवादित मुद्दों पर चुप्पी साधनी पड़ी।
2004 के बाद से भाजपा केंद्र की सत्ता से बाहर है। हालांकि, यूपीए सरकार भी घोटालों और महंगाई के मुद्दों के चलते राजनीतिक सुकून में नहीं है। यूपीए के इस संकट के बावजूद एनडीए के लिए सत्ता में लौटना आसान नहीं है। ऐसे में, राजनीतिक जोखिम लेकर मोदी को ‘पीएम इन वेटिंग’ बनाने की तैयारी है। शायद, इसीलिए कोशिश हो रही है कि अयोध्या के रामलला के सहारे सत्ता की डगर एक बार फिर पकड़ ली जाए। चूंकि, मोदी की छवि एक धुर हिंदुत्ववादी नेता की है। ऐेसे में, इस मुहिम को आगे बढ़ाना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। यह अलग बात है कि मोदी के मुद्दे पर जदयू ने भाजपा से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया है। अब टीम मोदी का लक्ष्य यही है कि अघोषित रूप से ‘हिंदुत्व कार्ड’ चलाया जाए। इसके जरिए भाजपा लोकसभा की कम से कम 180 सीटें हासिल कर ले, तो नए सहयोगी मिलने का रास्ता अपने आप निकल आएगा।
अमित शाह ने अयोध्या में पहुंचते ही भव्य राम-मंदिर की हुंकार लगा दी है। इससे सियासी पारा गर्म हो गया है। भाजपा के रणनीतिकार खुश हैं कि इस कार्ययोजना से संघ परिवार के तमाम घटक फिर से भाजपा के लिए ताकत लगाने लगे हैं। नरेंद्र मोदी जल्दी ही पुरी (ओडिशा) के दौरे पर जा रहे हैं। वे वहां पर धार्मिक रथ यात्रा में हिस्सेदारी करेंगे। जाहिर है राम-मंदिर से लेकर पुरी की रथयात्रा तक की कवायद इसीलिए है ताकि, हिंदुओं के बीच एक खास संदेश चला जाए। कहीं ‘हिंदुत्व कार्ड’ से कोई भारी राजनीतिक जोखिम की स्थिति न बने? इसके लिए भी खास राजनीतिक सतर्कता बरती जा रही है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अमित शाह के बहुचर्चित बयान के बाद कह दिया है कि वे सब लोग चाहते हैं कि अयोध्या में भव्य राम-मंदिर जरूर बने। क्योंकि, यह तो करोड़ों लोगों की आस्था का सवाल है। लेकिन, मंदिर मुद्दा भाजपा के लिए राजनीतिक एजेंडा नहीं है। क्योंकि, मुख्य रूप से भाजपा सुशासन और विकास के मुद्दों पर जोर दे रही है। पार्टी अध्यक्ष भले इस मुद्दे पर तमाम सफाई दे रहे हों, लेकिन टीम मोदी इस मामले में ज्यादा ‘लुकाछिपी’ की राजनीतिक शैली पसंद नहीं करती। यह अलग बात है कि अयोध्या यात्रा से तमाम राजनीतिक बवाल हो जाने से अमित शाह कुछ ‘लो प्रोफाइल’ में नजर आ रहे हैं। अब यही कह रहे हैं कि राम जी चाहेंगे, तो वहां भव्य मंदिर जरूर बनेगा। उन जैसे लोग तो सिर्फ प्रार्थना भर कर सकते हैं। उन्होंने अपने सहयोगियों को बता दिया है कि वे अयोध्या में रामलला से प्रार्थना कर आए हैं कि देश को राम जी कांग्रेस के कुशासन से मुक्ति दिलाएं। सभी को चाहिए कि राम जी से ऐसी ही प्रार्थनाएं करें। लेकिन, उन्हें यह देखकर बहुत कष्ट हुआ कि अयोध्या के रामलला एक कटे-फटे टेंट के नीचे पड़े हैं। आखिर उन्होंने भव्य राम-मंदिर की बात कहकर क्या गुनाह कर दिया?
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।






