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टीवी की तंज पत्रकारिता यानी बाबाजी का ठुल्लू

Nadim S. Akhter : अगर आप कोई बात लिखते या कहते हैं तो अलग-अलग लोग इसे विभिन्न रूपों में ग्रहण करते हैं. आप कोई खबर लिखते-दिखाते हैं तो आपको भी अंदाजा नहीं होता कि पाठक-दर्शक उसे किस रूप में ग्रहण कर रहा है. ये बात इसलिए भी कि आजकल टीवी पर तंज-पत्रकारिता दिख रही है, यानी खबर नहीं, भाव बताए जा रहे हैं. ये सोचकर कि दर्शक भी इसे उसी अंदाज में ग्रहण कर रहा होगा, जो सोचकर ये बात स्क्रिप्ट राइटर-वीओ आर्टिस्ट ने लिखी-कही थी.

Nadim S. Akhter : अगर आप कोई बात लिखते या कहते हैं तो अलग-अलग लोग इसे विभिन्न रूपों में ग्रहण करते हैं. आप कोई खबर लिखते-दिखाते हैं तो आपको भी अंदाजा नहीं होता कि पाठक-दर्शक उसे किस रूप में ग्रहण कर रहा है. ये बात इसलिए भी कि आजकल टीवी पर तंज-पत्रकारिता दिख रही है, यानी खबर नहीं, भाव बताए जा रहे हैं. ये सोचकर कि दर्शक भी इसे उसी अंदाज में ग्रहण कर रहा होगा, जो सोचकर ये बात स्क्रिप्ट राइटर-वीओ आर्टिस्ट ने लिखी-कही थी.

और तुर्रा ये कि भाई लोग इसे टीवी की बेस्ट स्क्रिप्ट से नवाज रहे हैं. लच्छेदार भाषा का इस्तेमाल स्क्रिप्ट में जान तो डालता है लेकिन अपने साथ कई खतरे भी लाता है. इस बात की पूरी सावधानी बरतनी चाहिए कि तुकबंदी करने या शब्दों से खेलने के चक्कर में कहीं आप अर्थ का अनर्थ तो नहीं कर रहे!!! कहीं खबर में छिपाकर अपना व्यक्तिगत मत तो नहीं प्रकट कर रहे??? कहीं अपना विश्लेषण तो नहीं बता रहे, ये कहकर कि ये पैकेज है, विशुद्ध खबर का पैकेज.

जैसे मैं अभी कुछ लिखकर बताता हूं, कहीं से कॉपी नहीं कर रहा, सिर्फ उदाहरण के लिए एक मनगढ़ंत स्क्रिप्ट टाइप की चाज लिखे दे रहा हूं…

-दिल्ली पुलिस को सबक सिखाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुले आसमान के नीचे सड़क पर सो तो गए लेकिन खुद ये सबक भूल गए कि दिल्ली का मुखिया अगर फुटपाथ पर लेट जाएगा तो लोकतंत्र की नींद उड़ जाएगी. सिंहासन खाली करो कि जनता आती है लेकिन ये क्या!! यहां तो राजा पहले ही ताज-तख्त छोड़कर प्रजा बनने को बेताब है.

-दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने सड़क पर चटाई डाल दी है. सर्दी ना लगे, इसके लिए गुलगुली रजाई का इंतजाम भी कर लिया है. कह रहे हैं कि पहले पुलिस वालों को सस्पेंड करो, तब धरने से उठेंगे लेकिन अपने मंत्री सोमनाथ भारती पर कार्रवाई करेंगे या नहीं, इस पर सस्पेंस नहीं तोड़ते.

-हमारे लोकतंत्र ने कई धरने-प्रदर्शन देखे हैं, एक धरना ये भी सही. लेकिन अबकी बार एक मुख्यमंत्री इंसाफ मांगने सड़क पर बैठा है और संतरी, जज की मुद्रा में है. -हमेशा आपके साथ, सदैव- का चूर्ण खिलाने वाली दिल्ली पुलिस के कप्तान ने आंखें तरेर ली हैं. फैसला सुना दिया है कि हमारे मातहतों ने कोई गलती नहीं की, सस्पेंशन काहे का.

-अजीब नजारा है. मंत्री और संतरी का भेद मिट रहा है. राजा और प्रजा एकाकार हो रहे हैं. अब नई क्रांति की इस बेला में आकाशवाणी भी नहीं हो रही कि रामराज्य कब आएगा!!! सीएम केजरीवाल खुले आसमान के नीचे सोए हैं, शायद आज रात उन्हें ये आकाशवाणी सुनाई दे जाए तो कल प्रजा का भला हो जाए.

तो कुछ समझा आपने??!! चैनल का प्रोड्यूसर क्या कहना चाह रहा है??? पूरी खबर आपको स्पष्ट समझ आ गई क्या?? ये तो मैंने -तंज पत्रकारिता- के स्टाइल में अपनी तरफ से कुछ लिखकर आपको ये बताने की कोशिश की है कि आखिर हो क्या रहा है. अगली दफा ध्यान से टीवी चैनल पर सुनिएगा. तेज-तर्रार-उम्दा स्क्रिप्ट के खांचे में वहां से आजकल ऐसी ही स्क्रिप्ट प्रसारित हो रही है, बुलंद-नाटकीय आवाज-वॉयस ओवर के साथ.

मानो कि खबर ना हो गई, मदारी का तमाशा हो गया. कोई उनसे ये पूछे कि भई कभी BBC, CNN, Al Jazeera या फिर Discovery वालों से ही ज्ञान ले लेते. इतना तो मानोगे ना कि आप से ज्यादा महारत है उनको खबर दिखाने और उसे पेश करने में. अगर ऐसे ही खबर बिकती-खपती और खबर की आत्मा से न्याय होता तो वे भी कब का ये तरीका अपना लेते ना??!! नाटकीयता उनसे ज्यादा अच्छा तो आप नहीं ही कर सकते. फिर क्या कारण है कि वे सीधी-सपाट भाषा में, संयमित आवाज-भाव-भंगिमाओं के साथ खबर देते हैं और आप इतने प्रयोगधर्मी हो गए कि हार्ड कोर नयूज बुलेटिन और क्राइम शो-हास्य शो-व्यंग्य शो का अंतर ही खो बैठे???!!!

ये ठीक है कि हिन्दी में लच्छेदार भाषा अच्छी लगती है, लेकिन वहीं तक, जब ये खबर की रूह के साथ इंसाफ करे. वरना ये क्या. आप तंज पर तंज कसते चले गए, लच्छेदार में इतना गोल-गोल घुमा दिया कि दर्शक के हाथ में बाबाजी का ठुल्लू भी नहीं आया. उसके भेजे में कुछ गया ही नहीं. आपका पूरा पैकेज और शो देखने के बाद वह पूछता है कि भाई, ये खबर में बताना क्या चाह रहा था??!!

मेरा सीधा मानना है कि खबर के साथ आप प्रयोग तो करो लेकिन उसे खबर के अंदाज में ही दिखाओ-लिखो. व्यंग्य करना है और तंज कसना है तो इसके लिए अलग फॉर्मेट के न्यूज शो बना-गढ़ सकते हैं. लेकिन खबर दिखाने के नाम पर आप अपनी राय-अपना विश्लेषण-अपना व्यंग्य क्यों ठूंस रहे हैं???!!! पूरी खबर और पैकेज देखकर ऐसा लगता है मानो प्रोड्यूसर ने अपनी सारी भड़ास और क्रिएटिविटी खबर में उड़ेल दी है. और वॉयस ओवर भी ऐसा कि नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के विद्यार्थी भी शर्मा जाएं.

मास कमयुनिकेशन का मतलब है सीधे खबर बताना. जो सीधा दर्शक को समझ आए. उसके दिमाग में जाए. लफ्फाजी तो इस कान से सुनिए और उधर से निकाल दीजिए. कुछ पल्ले ही नहीं पड़ा. पूरी खबर भी नहीं बताई. उसके अलग-अलग आयामों को छुआ ही नहीं. उसकी तह तक गए ही नहीं. बस 3-4 मिनट के पैकेज में एक सीन क्रिएट कर दिया. दर्शक थोड़ी देर वह देखने के लिए ठिठका और फिर आगे बढ़ गया. उसके दिमाग में आपकी खबर रजिस्टर नहीं हुई. वह अगले दिन अखबार के पन्ने टटोल रहा है कि यार कुछ तो समझ आए कि पूरी खबर है क्या??!! माजरा क्या है.

और ये फलां चैनल तो ऐसे बता रहा था कि मनोहर कहानियां का कोई प्लॉट explain कर रहा हो या फिर साहित्य में किसी नई विधा का सृजन हो रहा हो. मेरे गुरजी कहते थे कि खबर लिखो तो सबसे पहले उस आदमी को दिखाओ-पढ़ाओ, जो सबसे कम पढ़ा-लिखा और दीन-दुनिया से वाकिफ हो. अगर आपकी लिखी बात उसे समझ आ गई तो समझो कि आपने ठीक लिखा है. आपकी कॉपी मॉस क्मयुनिकेशन यानी जनसंचार के लिए तैयार है. और अगर आपकी लिखी बात उसे समझ नहीं आई, उसके सिर के ऊपर से निकल गई तो आपने कूड़ा लिखा है. उसे रद्दी को टोकरी में फेंक दो. जय हो.

लेखक नदीम एस. अख्तर प्रिंट और टीवी में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं और सोशल मीडिया पर अपने बेबाक लेखन के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. नदीम से संपर्क 085 05 843431 के जरिए किया जा सकता है. नदीम के लिखे अन्य पठनीय लेखों / विश्लेषणों के लिए क्लिक करें: भड़ास पर नदीम एस. अख्तर

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