Vineet Kumar : हेडलाइंस टुडे ने एम्स पर जो स्टिंग ऑपरेशन किया है वो तथ्यात्मक और बड़े संदर्भों को काटकर सनसनी फैलाने का काम है..जरा कभी स्टोरी मिले कि कुछ नहीं तो सिर्फ एक्सरे और यूरीन टेस्ट कराने के अपोलो, मेदांता, फार्टिस, रॉकलैंड कितना लेता है और एम्स में इसके लिए कितने पैसे देने होते हैं, यूट्यूब लिंक दीजिएगा. मैं अपनी जिंदगी की कमाई का अस्सी फीसद रुपया ऐसे अस्पतालों में लुटा चुका हूं और एम्स का भी लाभ लेता आया हूं..
सिटी हॉस्पीटल में छह घंटे पड़ा रहा, सात हजार बिल बना लेकिन इलाज के नाम पर जीरो जबकि एम्स में एक घंटे के अंदर इमरजेंसी में राहत मिल गयी थी. जितने मरीज एक दिन में एम्स में गिरते हैं, उसका आधा भी टीवी टुडे नेटवर्क की दैत्याकार बिल्डिंग मीडियाप्लेक्स के आगे जमा हो जाए तो मीडियाकर्मियों को दौरे पड़ने लगेंगे. बिना सिर-पैर की स्टिंग करके, सार्वजनिक संस्थानों की जड़ों में मठ्ठा घोलने के क्या खतरे हैं वो आम आदमी ही समझ सकता है..आपका क्या है, फार्टिस जैसे अस्पतालों से बिजनेस टाइप होते हैं आपके..सर्दी-खासी,दमा-खसरा से सब वहीं दिखा लीजिएगा और एस्ट्रेस के नाम पर भर्ती हो लीजिएगा.
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हेडलाइंस टुडे का तर्क है कि बड़े पैमाने पर वो लोग वहां काम कर रहे हैं जिन्हें वो काम करने का अधिकार या योग्यता नहीं है..आपलोग जरा ऐसे मीडिया संस्थानों से पूछिए कि इन्टर्न और ट्रेनी के दम पर चौथा खंभा चलाने का जो काम आप करते हैं, घंटों रगड़ते हैं और वो भी बिना एक रुपये दिए..उसको किस तरह से देखा जाए ? दूसरी तरफ दो कमरे-चार कमरे के मेडीकल कॉलेज से निकलकर निजी अस्पतालों में जो इलाज करते हैं, उसके बारे में आपका क्या कहना है..तब तो आप कृष्ण जनमाष्टमी के दिन पैदा लेनेवाले को कान्हा करार देंगे..हद है..
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सार्वजनिक संस्थानों जैसे विश्वविद्यालय, अस्पताल, स्कूल आदि को लेकर धुआंधार स्टोरी करने और तीसमार खां बनने के पीछे कार्पोरेट मीडिया का सुधार या सिस्टम का आइना दिखाने से कहीं ज्यादा कार्पोरेट धंधेबाजों के लिए जमीन तैयार करना तो नहीं होता? आपको क्या लगता है.. मैं तो यही देखता हूं कि जेएनयू, डीयू, सरकारी स्कूल, एम्स और जीबी पंत आदि का चैनल जब बाजा बजा रहे होते हैं तो शो के प्रायोजक अमेटी यूनिवर्सिटी, लवली प्रोफेशनल, फोर्टिस, जेके टायर, अल्ट्राटेक सीमेंट आदि होते हैं..कभी निजी संस्थानों पर हमने कोई स्टिंग नहीं देखें..बहुत हुआ तो फुसफुसिया खबर.. क्यों डीएलएफ पर एक स्टिंग तो बनता ही है और अब जबकि 2 जी को लेकर भी सनसनी है तो रिलाएंस पर भी..
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हेडलाइंस टुडे पर "ऑपरेशन एम्स" आ रहा है. पहली बात तो मुझे ये समझ नहीं आती कि टीवी टुडे नेटवर्क के सारे स्टिंग, ऑपरेशन कैसे हो जाते हैं. ऑपरेशन दुर्योधन, ऑपरेशन कलंक, ऑपरेशन ब्लैक…अगर इस मीडिया हाउस का ऑपरेशन से अर्थ उन्मूलन से है तो क्या इसका मतलब ये है कि एम्स का खत्म हो जाना चाहिए या फिर ऑपरेशन का मतलब उपचार से है तो ऐसे स्टिंग से कैसे स्टिंग संभव है जब वो दूसरे रास्ते खुद ऐसे झोला छाप उत्पादों से लेकर कॉर्पोरेट अस्पतालों और बाबाओं का जमकर विज्ञापन करता है.
बहरहाल एम्स को लेकर जो स्टिंग दिखाए जा रहे हैं, उसका सार यही है कि देश का सबसे नामी अस्पताल एम्स लोगों की जिंदगी से खेलने का काम कर रहा है. ये बहुत संभव है कि एम्स में तमाम तरह की गड़बड़ियां है और चूंकि अभी सुनीता नारायण वहां भर्ती है तो चैनल को इस अस्पताल का ज्यादा ध्यान आया होगा. नहीं तो आरक्षण विरोधी यूथ फॉर एक्वलिटी या वेणु गोपाल विवाद के अलावे एम्स ज्यादातर मामले को नजरअंदाज ही करता आया है. दूसरी तरफ जिस अव्यवस्था और लापरवाही की बात चैनल जोर-शोर से दिखा रहा है क्या उसे तथ्यात्मक रुप से ये नहीं बताना चाहिए कि यहां रोज कितने मरीज आते हैं, कितनी सुविधाएं हैं, कितने साधन है.
एम्स की गड़बड़ियों पर बिल्कुल रिपोर्ट और स्टोरी होनी चाहिए लेकिन देश की आखिरी उम्मीद का इस तरह से चालू टाइप इमेज न बनाएं कि निजी अस्पतालों की लूटने की दूकान ही अंतिम विकल्प के रुप में नजर आए. ऑपरेशन शब्द जोड़कर जो सनसनी फैलाने का काम ये चैनल लगातार करता आया है, अगर इस एक शब्द को हटा दें तो तथ्यात्मक रुप से खासकर ये स्टिंग बहुत बारीकी से कोई स्टिंग नहीं करता..स्टिंग न हुआ कोई बुतरखेल हो गया हो..अगर सचमुच ऐसे स्टिंग सीरियस हैं तो हम फोर्टिस, रॉकलैंड और मेदांता पर इस मीडिया हाउस के स्टिंग का इंतजार करेंगे जहां सुविधा के नाम पर लूटने का काम किसी मरघट से कम बेरहमी से नहीं किया जाता.
युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.





