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ट्रेन में ‘टुंडला गैंग’ के आतंक का शिकार हुई थी मैं : सीमा आजमी

सिर्फ 'हापुड़ गैंग' ही ट्रेनों में आपरेट नहीं करता. दिल्ली के नजदीक के कई शहरों-स्टेशनों में ऐसे गैंग आपरेट करते हैं जो यात्रियों के साथ वीभत्स सुलूक करते हैं. 'टूंडला गैंग' भी इन्हीं में से एक है. मुंबई में रह रहीं युवा अभिनेत्री व निर्देशक सीमा आजमी ने अपने दुखद अनुभव को बयान किया है. वे इतनी निराश हैं कि कहती हैं कि उन्हें सरकार और किसी विभाग से कोई उम्मीद नहीं है. क्या रेलवे अपने यात्रियों की सुरक्षा के लिए कोई सख्त कदम उठाएगा, यह सवाल अब सभी लोग पूछने लगे हैं. हापुड़ गैंग और टूंडला गैंग जैसे दर्जनों गैंग्ग से रेल यात्रियों को कौन बचाएगा. अब हर पत्रकार, अफसर, नेता का दायित्व बनता है कि वह इन गैंग्स के खात्मे के लिए अपने अपने स्तर से प्रयास शुरू करें. दिल्ली के अखबारों और चैनलों का चाहिए कि वे इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएं ताकि सो रहे रेल मंत्रालय के कानों तक आवाज पहुंच सके. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

सिर्फ 'हापुड़ गैंग' ही ट्रेनों में आपरेट नहीं करता. दिल्ली के नजदीक के कई शहरों-स्टेशनों में ऐसे गैंग आपरेट करते हैं जो यात्रियों के साथ वीभत्स सुलूक करते हैं. 'टूंडला गैंग' भी इन्हीं में से एक है. मुंबई में रह रहीं युवा अभिनेत्री व निर्देशक सीमा आजमी ने अपने दुखद अनुभव को बयान किया है. वे इतनी निराश हैं कि कहती हैं कि उन्हें सरकार और किसी विभाग से कोई उम्मीद नहीं है. क्या रेलवे अपने यात्रियों की सुरक्षा के लिए कोई सख्त कदम उठाएगा, यह सवाल अब सभी लोग पूछने लगे हैं. हापुड़ गैंग और टूंडला गैंग जैसे दर्जनों गैंग्ग से रेल यात्रियों को कौन बचाएगा. अब हर पत्रकार, अफसर, नेता का दायित्व बनता है कि वह इन गैंग्स के खात्मे के लिए अपने अपने स्तर से प्रयास शुरू करें. दिल्ली के अखबारों और चैनलों का चाहिए कि वे इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएं ताकि सो रहे रेल मंत्रालय के कानों तक आवाज पहुंच सके. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

वो आए और महिला को थप्पड़ मारकर, कान के टाप्स नोचकर चले गए

सीमा आजमी

भूमिका राय के साथ ट्रेन में हुए अभद्र बर्ताव से संबंधित खबर पढ़कर मुझे अपने साथ घटी ऐसी ही बहुत बुरी घटना याद आ गई. ये तबकी घटना है जब मैं नौवीं-दसवीं में पढ़ रही थी. मैं अपने मम्मी पापा के साथ आजमगढ़ से दिल्ली जा रही थी. ट्रेन थी शायद गंगा यमुना एक्सप्रेस. जब ट्रेन सुबह सुबह टूंडला स्टेशन पहुंची तो वहां से लगभग पंद्रह बीस लोग हमारे कोच में चढ़े और सोते हुए लोगों को जगा जगा कर बैठने लगे. उनमें इतनी भी तमीज नहीं थी कि कम से कम लोगों से रिक्वेस्ट कर लें बैठने के लिए. वो लोग ऐसे बिहैव कर रहे थे कि ये उनके बाप की ट्रेन है और बाकी लोग गल्ती से उसमें बैठते हैं.

उन्हें देखकर मेरे मम्मी पापा ने मुझे उपर की बर्थ पर बैठने के लिए कहा. मेरी मम्मी ने मुझसे रिक्वेस्ट किया कि मैं इन लोगों को कुछ ना कहूं, ये लोग बहुत बदतमीज लोग हैं. मेरे मम्मी-पापा को पता था कि मैं कोई भी गलत बात होते देखूंगी तो कुछ ना कुछ बोल दूंगी. मैं उपर बैठ गई और कोशिश कर रही थी कि इन लोगों की तरफ ध्यान ना जाए. तभी उनमें से एक आदमी मेरे सामने वाली बर्थ पर आकर बैठ गया और लगातार मुझे घूरने लगा. वो इतनी अनकंफर्टेबल सिचुवेशन थी मेरे लिए कि मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैंने जोर से बोला- घूर क्या रहे हो, कभी लड़की नहीं देखी क्या. ये सुनते ही सब लोग उसे देखने लगे. वो थोड़ा सकपकाया. वो वहां से तुरंत उठकर चला गया. लेकिन थोड़ी ही देर के बाद हमारे कंपार्टमेंट में लगभग दस बारह लोग आकर बैठने लगे. लोगों को धक्का देने लगे. उनसे सीट से हटने के लिए कहने लगे. जब एक आदमी ने बहुत ही विनम्रता से कहा कि ये उसकी सीट है तो उसकी बात भी पूरी नहीं हुई कि एक आदमी ने उसे जोर का थप्पड़ मारा. वो यात्री बेचारा सकपका कर रह गया. वहां बैठे एक भी आदमी की इतनी हिम्मत नहीं हो रही थी कि उन लोगों से कुछ कहे. 

आए हुए सारे लोग मिलकर मुझे घूरने लगे और तरह तरह के इशारे करने लगे. कुछ मेरी सीट के नीचे वाली सीट पर बैठकर मेरी सीट के पीछे के गैप से हाथ डालकर उंगली डालकर मुझे परेशान करने लगे. जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं उन पर टूट पड़ी. पूरे कंपार्टमेंट में युद्ध का माहौल हो गया. उनके कुछ और भी साथी शोर मचाते हुए वहां आने लगे. वो लोग लगभग बीस से पच्चीस हो गए.

अभी हमारी केबिन में ये सब चल ही रहा था कि हमारे बगल वाले कंपार्टमेंट से एक और के जोर जोर से रोने की आवाज आने लगी. वो लगभग पच्चीस छब्बीस साल की औरत थी और एक पांच साल के बच्चे के साथ अकेले सफर कर रही थी. उस औरत को भी ये लोग काफी देर से परेशान कर रहे थे. जब उसने इनका विरोध किया तो एक आदमी ने उस अकेली औरत को भी थप्पड़ मारा और उनके एक दूसरे साथी ने दरवाजे से झूलते हुए उस औरत के कान में पहने हुए टाप्स खींच लिए. उस महिला के कान से खून बहने लगा. वो बेचारी दर्द के मारे चिल्लाने लगी. इतनी देर में ये सारे लोग चेन पुलिंग कर भाग गए.

ये पूरा ड्रामा लगभग दो ढाई घंटे चला लेकिन इस बीच ना तो कोई पुलिस वाला आया ना ही रेलवे का कोई आदमी. हां, कुछ लोग पुलिस को बोलने गए भी लेकिन एक भी पुलिस वाला वहां आसपास नहीं था. मेरे मम्मी पापा इतना डर गए थे कि मुझे अकेले छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते थे. अगर उस औरत के साथ ये सब नहीं होता तो वो लोग मेरे साथ क्या करते, इसका आप अंदाजा नहीं लगा सकते हैं. इतना सब कुछ होने के बाद भी हमारे सहयात्री मेरे मम्मी पापा को ही समझा रहे थे कि भाई साहब जाने दीजिए, ये लोग बहुत बुरे लोग हैं. इनके तो मुंह ही नहीं लगना चाहिए था. स्टेशन पर उतरकर जब कंप्लेन करने की बात आई तो एक भी व्यक्ति हमारे साथ नहीं था. स्टेशन पर एक दो पुलिस वाले दिखे. जब उनसे हमने सारी घटना बताई तो वो भी हमें समझाने लगे कि वो लोग तो डेली कम्यूटर हैं, उन लोगों के चक्कर में कहां पड़ रहे हैं आप लोग. आप को रोज पुलिस स्टेशन आना पड़ेगा. आखिरकार हम लोग थक हार कर घर चले गए.

ऐसा नहीं कि उसके बाद मेरे साथ ऐसी घटना नहीं हुई. दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में ट्रेन में, बस में, रोड पर जो हालात हैं उसके बारे में कहने की कोई जरूरत नहीं है. आज जब भूमिका की पोस्ट पढ़ी तो मेरे सामने वो सारी घटना पिक्चर की तरह चल गई. यह बहुत दुख की बात है कि आज भी यह सब हो रहा है और रेलवे अथारिटी इस विषय में कुछ कर नहीं रही है. सच कहूं तो अब मुझे सरकार से और उसके किसी विभाग से कोई उम्मीद नहीं है. ये मैं सिर्फ आपसे और दूसरे लोगों से शेयर कर रही हूं.

लेखिका सीमा आजमी आजमगढ़ की रहने वाली हैं. नेशनल स्कूल आफ ड्रामा (एनएसडी) से शिक्षण-प्रशिक्षण लेने के बाद इन दिनों मुंबई में बतौर अभिनेत्री कई फिल्मों में भूमिकाएं निभा रही हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. फेसबुक पर सीमा तक http://www.facebook.com/profile.php?id=1100962030 के जरिए पहुंचा जा सकता है.

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