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सुख-दुख...

ठकुर-सुहाती कहने वाले मौज उड़ाते, खरे समीक्षक नहीं मंच पर जाने पाते

: डा॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक की याद में (जन्मतिथि २१ अक्टूबर १९१८ – निर्वाण तिथि ३० दिसम्बर २०११) : कभी दरबारी रही कविता सत्ता को चुनौती भी दे सकती है, पहले कभी सोचा नहीं जाता था। पर ऐसा समय भी आया जब कविता में सत्ता को चुनौती देना कवियों का प्रिय शगल बन गया। दिनकर, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा जैसे तमाम कवि हैं जिन्होंने पौराणिक कथाओं को कविता में गूंथ कर सत्ता से सीधा मुठभेड़ किया तो कबीर, राम प्रसाद बिस्मिल, फ़ैज़, दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जैसे कवि भी हैं जो सीधे-सीध सत्ता को कठघरे में खडा़ करते हैं और ऐसे सवाल करते हैं कि मुहावरा बन जाते हैं और किसी भी सत्ता के पास कोई उत्तर होता नहीं।

: डा॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक की याद में (जन्मतिथि २१ अक्टूबर १९१८ – निर्वाण तिथि ३० दिसम्बर २०११) : कभी दरबारी रही कविता सत्ता को चुनौती भी दे सकती है, पहले कभी सोचा नहीं जाता था। पर ऐसा समय भी आया जब कविता में सत्ता को चुनौती देना कवियों का प्रिय शगल बन गया। दिनकर, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, श्रीकांत वर्मा जैसे तमाम कवि हैं जिन्होंने पौराणिक कथाओं को कविता में गूंथ कर सत्ता से सीधा मुठभेड़ किया तो कबीर, राम प्रसाद बिस्मिल, फ़ैज़, दुष्यंत कुमार और अदम गोंडवी जैसे कवि भी हैं जो सीधे-सीध सत्ता को कठघरे में खडा़ करते हैं और ऐसे सवाल करते हैं कि मुहावरा बन जाते हैं और किसी भी सत्ता के पास कोई उत्तर होता नहीं।

धर्मवीर भारती अंधा युग के मार्फ़त, नरेश मेहता महाप्रस्थान के मार्फ़त तो श्रीकांत वर्मा मगध के मार्फ़त सत्ता को जिस तरह घेरते हैं और सुलगते हुए सवालों से जिस तरह वर्तमान सत्ता को भी सवालों के फंदे में घेरते हैं वह अदभुत है। ऐसे ही एक और कवि हैं लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक। जिनको जाने क्यों ज़रा कम जाना गया। निशंक न सिर्फ़ सत्ता को अपने सवालों से घेरते हैं बल्कि कई पौराणिक पात्रों को उनकी पारंपरिक छवि से भी उन्हें मुक्त करते हैं। न सिर्फ़ सत्ता से सवाल करते हैं, सत्ता और व्यवस्था के चरित्र पर प्रहार भी करते हैं। राम कथा के बहाने बहुतों ने बहुतेरी बातें कही हैं। तुलसी से लगायत मैथिली शरण गुप्त तक और भी कई ने। पर निशंक जब राम कथा को हाथ में लेते हैं तो उन के यहां कैकेयी, सुमित्रा और विभीषण तक की न सिर्फ़ पारंपरिक छवियां टूटती हैं बल्कि सत्ता और व्यवस्था विमर्श से एक नई मुठभेड़ भी होती है। नए सवाल सुलगते हैं और इन की एक नई ही छवि हमारे सामने उपस्थित होती है।

निशंक के यहां आ कर विभीषण के प्रश्न आज के सतासीनों पर भी कैसे तो चस्पा हो जाते हैं। प्रज्ञा-उदभास निशंक का खंड-काव्य है। इस में उन्हों ने विभीषण की आत्मकथा लिखी है। जिस में उन का विभीषण कहता है, 'राजा ही बन गया विधाता, न्याय खड़ा है हाथ पसारे।' विभीषण कहता है कि, 'मनमाने निर्णय लेने पर, राजा रहता नहीं अकेला/ हां में हां कहने वालों का, सदा लगा रहता है मेला।' विभीषण की यह आत्मकथा वर्ष २००१ में यानी अब से ११ वर्ष पहले छपी थी। और निशंक विभीषण की यातना लिख रहे थे, 'मैं विभीषण हूं, मुझे जग जानता है, पर मुझे वह भ्रातृ-द्रोही मानता है/ विश्व में लोकोक्ति बन कर जी रहा हूं, राम चरणामृत मिला, विष पी रहा हूं।' और बता रहे थे कि, ' अक्षर और अमर बनने की रही प्रबल अभिलाषा, बर्वरता की राजनीति में लुप्त प्यार की भाषा/ जन-हित भुला दिया, निज -हित की वाणी पर बंधन है. भय-आतंक-दमन के बल पर फूल रहा शासन है।' जाहिर है कि विभीषण यह सारी बातें रावण के मद्देनज़र कह रहा है। वह कह रहा है कि, ' माना प्रबल बाहुबल से रक्षित रहता सिंहासन. एकतंत्र-शासन से पर होता है पंगु प्रशासन।' और बता रहा है कि, 'श्रवण-सुखद, मुंह-मीठी कहने वालों की न कमी है, राजसभा में उन की ही रहती बस धाक जमी है।' तो क्या यह बातें जो विभीषण रावण राज के लिए कह रहा है, आज का शासन भी, आज का राज भी रावण राज में तब्दील नहीं है? आज की जनता की भी हालत विभीषण की ही तरह असुरक्षित और अपमानित नहीं है? निशंक का विभीषण तो हालात बयान कर रहा है, 'बुझने पर भी असुरक्षा की आग रही जलती थी, प्रजा पराजित सी अनुभव कर, बैठ हाथ मलती थी।' विभीषण तो बता रहा है, 'जहां शील का पानी न हो, वहां- आंसुओं से मुंह धो कर क्या करता?/ यह मोह का त्याग था, द्रोह नहीं, अपमानित हो कर क्या करता?' उस की यातना देखिए कि, 'मंत्री का भी मुंह किया बंद, मंत्रणा-शक्ति पड़ गई मंद।/ फिर मैं जनहित कैसे करता? भाई के ही हाथों मरता? वह बताता है कि, 'मैं तो उन्हें नीति की तुला पर विनत हो के, चाहता था तोलना प्रतीति से, दुलार से।/ किंतु मेरी याचना पे बिना ही विचार किए, क्यों मुझे निकाला गया चरण प्रहार से?' स्पष्ट है कि यह यातना सिर्फ़ विभीषण की यातना नहीं है, यह आज के आम-जन की भी यातना है। निशंक विभीषण की यातना को आज की जनता की यातना से जोड़ते हैं। साथ ही आज की शासन-व्यवस्था को रावण के राज जैसा ही बताते हैं और ऐसे शासन व्यवस्था के हश्र से आगाह भी करते चलते हैं, ' विश्व विजय का स्वप्न संजो कर यह भी जान न पाए, आत्मशक्ति के सम्मुख जग में कौन सामने आए?/ धू-धू नगर जला, राजा की आंखों के आगे ही, कोई नहीं बचा पाया, हम ऐसे रहे अभागे।'

सिर्फ़ खंड काव्य या महाकाव्य या पौराणिक आख्यानों में ही निशंक यह और ऐसे सवाल नहीं उठाते। तूणीर में संग्रहित कविताएं भी ऐसे ही तमाम सवालों में सुलगाती हैं। वह लिखते हैं, ;त्याग, दृढ़ संकल्प तो चांडाल के हाथों बिके हैं/ कामिनी-कंचन तथा कादंब पर जीवन टिके हैं/ आप का यह राष्ट्र-चिंतन मोम का घर बन गया है/ प्रश्न उत्तर बन गया है।' कविता के दरबारी होने की यातना भी निशंक के यहां सुलगती मिलती है। और वह बताते हैं कि, 'पूस माह में पसीने की तरह/ हम रहे सत्य से कटे-कटे।/ कवि बनने चले थे दरबारी हो गए।' ज़िंदगी ताश की गड्डी कविता में वह लिखते हैं, ' आदमी हारता है, पिटता है,/फिर भी खेलता ही रहता है/ एक बार ट्रंप-कार्ड बन कर/ जो सब पर रोब गांठता है/ जब वह ट्रंप नहीं रहता है/ तो बड़ा मायूस हो जाता है/ कुछ लोग जीवन भर/ पत्ते ही फेंटते रहते हैं/ गड्डी के भीतर उन की कोई औकात नहीं/ और बाहर वे जा नहीं सकते।' आम आदमी की पीड़ा उन की कविताओं की जैसे संगिनी है। संकल्प की विजय की नायिका कैकेयी है। निशंक ने इस खंड-काव्य में कैकेयी का यहां एक नया ही मिथ , एक नया ही रुप न सिर्फ़ गढा़ है बल्कि स्थापित भी किया है कि, 'विश्व की मंगल-कामना के लिए, राम को कैकेयी ने वन भेजा।' और बताया है कि, 'यश-दीप में राम के, कैकेयी थी, खुद स्नेह बनी, जली हो कर बाती।' और फिर कैकेयी के बहाने दशरथ से जो तल्ख सवाल निशंक ने उठाए हैं यहां, सत्ता व्यवस्था पर जो निरंतर प्रहार किए हैं वह बहुत ही खौलाने वाले हैं। निशंक के यहां जैसे विभीषण पाज़िटिव पात्र है वैसे ही कैकेयी भी पाज़िटिव शेड में उपस्थित है। कैकेयी का निगेटिव शेड निशंक के यहां अनुपस्थित है। वह बहुत स्पष्ट मानते हैं कि अयोध्या का राजा बन कर राम लोक कल्याण नहीं कर सकते थे और कि राम की क्षमताओं के मद्देनज़र ही कैकेयी ने राम को वन भेज कर उन को वनाधिराज बना कर लोक कल्याण के लिए वन भिजवाया। निशंक की कैकेयी कहती है, 'अवध का राजा बना यदि राम मेरा, तो न होगा प्रीति का वन में सबेरा।/ नगरवासी सौख्य-सुविधा-युक्त होंगे, किंतु बनवासी न दुख से मुक्त होंगे।' उन की कैकेयी जैसी जोड़ती है, 'मनुज हैं सब एक, फिर अलगाव कैसा?/ है जगा पृथकत्व का यह भाव कैसा?/ नृपति का है कार्य उन को भी उठाना, उन्हें भी मानव समझ, उर से लगाना।' वह कहती है, ' सुत -विरह का दु:ख भी मैं झेल लूंगी, किंतु अब उद्धार मानव का करुंगी।/ राम सब का है, दिखा दूंगी सभी को, कैकेयी मां है, बता दूंगी सभी को।' वह जैसे फिर जोड़ती है, ' है कठिन यह कार्य, फिर भी मैं करुंगी, मैं नहीं अब लोक निंदा से डरुंगी।/ राज्य-सुत का मोह सारा छोड़ दूंगी, धार मैं इतिहास की भी मोड़ दूंगी।' तो जैसे तमाम लोग कैकेयी में खल चरित्र की पड़ताल करते हैं, निशंक उस से उलट कैकेयी का एक नया ही रुप उपस्थित करते हैं। न सिर्फ़ कैकेयी का नया और सकारात्मक रुप उपस्थित करते हैं निशंक बल्कि कैकेयी के मार्फ़त सत्ता व्यवस्था की नब्ज़ भी टटोलते हैं, ' मंत्रीगण स्वविवेक से न विचार पाते, नृपति के स्वर में सदा स्वर हैं मिलाते।/ गुरु स्वयं नृप-इष्ट ही पहचानते हैं, राज्य को वे व्यक्ति-सत्ता मानते हैं।/ भूप मंत्री ही बने सब के नियामक. वही अनुशासक, वही रक्षक, विधायक।/ शक्ति चिंतन की हमारी खो गई है, बुद्धि शासक-वर्ग आश्रित हो गई है।' इस तरह निशंक न सिर्फ़ कैकेयी के बहाने दशरथ से सत्ता के निरंकुश बनने का प्रश्न उपस्थित करते हैं बल्कि आज की राजनीतिक सत्ता से भी इस बहाने मुठभेड़ करते दिखते हैं। और फिर सवाल खड़ा करते हैं कि, ' लोक हित में कौन फिर आगे बढ़ेगा?/ कौन कष्टों के हिमालय पर चढ़ेगा?/ क्या न कोल-किरात भय से मुक्त होंगे?/ क्या न वानर-भील श्रीसंयुक्त होंगे?' निशंक जैसे सवाल-दर-सवाल उठाते हैं, ' प्रश्न है, पर कौन उन का हल निकाले? सर्प के बिल में स्वकर को कौन डाले?/ लोक-सेवा से बड़ा क्या आज शासन?/ राज-सिंहासन बडा़ है या कुशासन?' कैकेयी के कोप-भवन में राजा दशरथ से कैकेयी के संवाद भी काफी कुछ चीज़ें स्पष्ट करते हैं, ' राम को वनवास चौदह वर्ष का हो, जो कि कारण लोक के उत्कर्ष का हो।/ दूसरा वर दो यही, मत देर लाओ, धैर्य रख कर सत्य-निष्ठा-व्रत निभाओ।'

आचार्य मुंशीराम शर्मा सोम अभिनन्दन समारोह के अवसर पर बाँए से महादेवी वर्मा, आचार्य सोम, डा॰ लक्ष्मीशंकर मिश्र निशंक एवं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी।


कैकेयी को वरदान दे कर राम को वनवास देने के राजा दशरथ के फ़ैसले पर 'लुट गया राजा प्रणय की चांदनी में, खो गया दिनपति अंधेरी यामिनी में।' जैसे छंद इस खंड-काव्य में लिख कर निशंक दशरथ की कमजोरियों को रेखांकित कर आज की राज-व्यवस्था से भी प्रश्न खड़ा करते हैं। क्यों कि आज-कल तो नित नए किस्से उपस्थित हैं राजाओं के प्रणय की चांदनी में लुटने के। निशंक की कविताओं को ले कर कभी किसी को संशय नहीं रहा। कभी वह सुमित्रा नंदन पंत, महादेवी वर्मा,पंडित नरेंद्र शर्मा, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर जैसों के साथ कवि सम्मेलनों के मंच पर काव्य पाठ करते थे। हजारी प्रसाद द्विवेदी, यशपाल और श्रीनारायण चतुर्वेदी के साथ सभाओं में मंच शेयर करते थे। अमृतलाल नागर तो उन्हें अपना गुरुभाई कहते नहीं थकते थे। क्रांतिदूत राना बेनी माधव के जीवन पर आधारित खंड-काव्य की भूमिका में नागर जी ने लिखा है कि, 'शब्द-लालित्य निशंक जी की पुरानी सिद्धि है। क्रांतिदूत बेनी माधव सिंह में उन की यह सिद्धि और भी निखर कर सामने आई है।' निशंक जी के गीत संग्रह साधना के स्वर की भूमिका में भगवती चरण वर्मा ने लिखा है कि, 'डा. निशंक की कविता में अपनी ईमानदारी है, उनमें सुलझा हुआ शिल्प है, उनके पास मजी हुई भाषा है।'

एक बार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनसे रामायण की एक उपेक्षित पात्र सुमित्रा पर लिखने को कहा तो उन्होंने सुमित्रा को ले कर एक महाकाव्य ही लिख दिया। और इस सुमित्रा भी में वह सत्ता-व्यवस्था की खबर लेने से नहीं चूके। और लिखा कि, 'नृप बडा़ नहीं होता सम्मान बिना।' लिखा कि, 'नीति ध्वस्त, नय ध्वस्त, मनुज संस्कार ध्वस्त है,/ धैर्य छिपा तम में, साहस का सूर्य अस्त है।' निशंक जी ने चाहे गीत लिखे, कविता लिखी, ब्रज भाषा में लिखा, खंड-काव्य लिखे या महाकाव्य या फिर निबंध या संस्मरण उन के यहां एक चिंता हमेशा ही मिलती है, वह है-लोकधर्म की। सत्ता और व्यवस्था से चुभते हुए सवाल करने की। और उसे आज से जोड़ने की। गोया वह ऐतिहासिक या पौराणिक कथा से नहीं आज से मुठभेड़ कर रहे हों। सुमित्रा के ही एकादश सर्ग में वह लिखते हैं, ' स्वार्थ होगा प्रबल यदि सेवा बनी व्यवसाय,/ धर्म होगा ढोंग यदि निष्ठा हुई निरुपाय।' सोचिए कि सुमित्रा का प्रकाशन वर्ष १९८९ में हुआ था। तब हमारी शिक्षा और चिकित्सा जैसे सेवा क्षेत्र प्राइवेट सेक्टर के सुपुर्द नहीं हुए थे। अब हो गए हैं तो देखिए क्या तो हाल है? शिक्षा और चिकित्सा या और भी कई सेवा क्षेत्र प्राइवेट सेक्टर के सुपुर्द हो कर कैसे तो लूट के अड्डे बन गए हैं। पर आम आदमी मुंह बाए निरुपाय खड़ा है।सोचिए कि निशंक ने यह खतरा सुमित्रा जैसे महाकाव्य में भांप लिया था। सुमित्रा में वह कई और चीज़ों पर भी विस्तार देते हैं। जो बाकी जगह उस तरह नहीं मिलतीं। जैसे सजीवनी बूटी ले कर जा रहे हनुमान को शत्रु समझ कर भरत द्वारा अयोध्या में मार गिराया जाना। फिर इलाज कर वापस भेजना। पर निशंक यह व्यौरा बहुत विस्तार से और तार्किक ढंग से बांचते हैं। निशंक जी अगर आज जीवित होते तो अब की २१ अक्टूबर को ९४ वर्ष के हो जाते।

पेशे से प्राध्यापक रहे निशंक जी जब बीते ३० दिसंबर, २०११ को बड़ी खामोशी से कूच कर गए तो अखबारों में ठीक से सुर्खी भी नहीं बन सके। तो बहुत अफ़सोस हुआ कि एक महत्वपूर्ण कवि के अवदान को हिंदी समाज इस तरह भूल सकता है? सुमित्रा में वह लिख ही गए हैं, 'ठकुर-सुहाती कहने वाले मौज उड़ाते / खरे समीक्षक नहीं मंच पर जाने पाते।' इसलिए भी कि यह लिखना आसान नहीं है, 'लुट गया राजा प्रणय की चांदनी में, खो गया दिनपति अंधेरी यामिनी में।' राजा तो प्रणय चांदनी में फिर भी लुटते रहेंगे पर अब इस को लिखने के लिए निशंक नहीं होंगे। मलाल यही है। निशंक जी ने एक गीत में लिखा भी है, 'देखता हूं बिक रहा है कौड़ियों में रुप कंचन,/ और मैं आदर्श ले कर, साधना में बांधता मन/ राह है मेरी पुरानी।' लेकिन वही यह भी लिख गए हैं, 'मैं ने एक किरन मांगी थी तुम ने नील गगन दे डाला/ मैं ने अपनापन मांगा था, तुम ने पागलपन दे डाला।' तो उन की कविताओं का नीलगगन सचमुच उन के प्रति पागलपन के पाग में डुबो देता है। उन की कविताओं के उस नीलगगन और उन को शत-शत प्रणाम !

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. दयानंद की बेबाक लेखनी का स्वाद लेने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर दनपा

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