नई दिल्ली। मीडिया कालेजों को पारदर्शी नियमों के दायरे में लाने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय जल्द ही ठोस फैसला लेने की तैयारी में है। इसके तहत राज्यों के तकनीकी विश्वविद्यालयों को दिशा निर्देश जारी किए जाएंगे। इस तरह के तमाम मीडिया कालेजों की शिकायतें मिलीं है जो एक एक कमरे में चल रहे हैं। इन कालेजों को तकनीकी विश्वविद्यालयों ने मान्यता भी दे रखी है। इनसे निकलने वाले छात्रों को मीडिया में उस स्तर का रोजगार नहीं मिल पा रहा है, जो सपना लेकर उन्होंने मीडिया कालेजों में दाखिला लिया था।
मंत्रालय का कहना है कि जिन मीडिया कालेजों की शिकायतें मिली है, वे ज्यादातर निजी क्षेत्र के हैं। मंत्रालय का कहना है कि इन कालेजों में बिना किसी प्रवेश परीक्षा के बारहवीं पास छात्रों को दाखिला दे दिया जाता है। ऐसे छात्रों से लंबी फीस भी ली जाती है। तमाम आकषर्णों के चलते छात्र दाखिला तो ले लेते हैं मगर धीरे-धीरे उन्हें इस तरह के संस्थानों की असलियत का जब पता चलता है तो वे अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं। प्लेसमेंट का प्रलोभन देकर उनके आक्रोश को शांत कर दिया जाता है पर कालेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद ये संस्थान अपने पूर्व छात्रों से मुंह मोड़ लेते हैं। फिर उनके पास सिवाय दर-दर भटकने के कोई दूसरा जरिया नहीं रह जाता। इस तरह के मीडिया कालेजों की वजह से वे मानक के अनुरूप चल रहे मीडिया कालेज भी बदनाम हो रहे हैं।
मंत्रालय ने मीडिया कालेजों का स्तर और उनकी गुणवत्ता सुधारने के लिए बिल्कुल उसी तरह का फैसला लेने का मन बनाया है, जिस तरह से निजी इंजीनियरिंग कालेजों के मामलों में किया जा रहा है। इस संबंध में तकनीकी विश्वविद्यालयों, डीम्ड विश्वविद्यालयों, सूचना प्रसारण मंत्रालय एवं कुछ बड़े शैक्षिक संस्थानों का भी सहयोग लिया जा रहा है। सरकार का इरादा यह है कि एक मीडिया कालेजों के लिए एक ऐसा माडल तैयार करके पेश किया जाए, जिसे मीडिया हाउसों को भी स्वीकार्य हो और इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों को भी मंजूर हो। माडल को अंतिम रूप देने से पहले मीडिया हाउसों की राय लेकर यह पता लगाना कि किस तरह के छात्रों को रोजगार मिल सकता है।
राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित ज्ञानेंद्र सिंह की रिपोर्ट.






