राजदीप सरदेसाई ने राहुल गांधी को सलाह दिया है कि पांच साल तक वे विपक्ष में बैठ कर राजनीति सीख लें. ये डिब्बा पत्रकार कई बार कथित राजनीतिज्ञों से भी गए गुजरे मूढ़ लगने लगते हैं. राजदीप किस विपक्ष की बात कर रहे हैं? क्या इस विपक्ष से कुछ सीखा भी जा सकता है? संसद कैसे जाम किया जाता है? पैसा लेकर कैसे सवाल पूछा जाता है? कबूतरबाजी कैसे की जाती है? दलाली, चोरी, चम्चोरी, जरायम पेशा धंधे कैसे होते हैं? बलात्कार, कुपंथ की डगर कैसे खुलती है? किसी महिला से जबरन मोहब्बत कैसे की जाती है और उसकी जासूसी कैसे होती है? दूसरे समुदाय का संहार कर के खौफ खड़ा करना और यह कहना कि हमारे यहाँ दंगा नहीं होता? यही सिखाना चाहते हैं देसाई जी?
लेकिन आपने जाने अनजाने एक सही शब्द सही बोल दिया है, वह है विपक्ष. आपने प्रतिपक्ष नहीं कहा. 77 के बाद देश की संसदीय व्यवस्था ने 'प्रतिपक्ष' की हत्या करके उसकी जगह विपक्ष का 'धोख' खड़ा कर दिया है. विपक्ष और प्रतिपक्ष में सोच का अंतर है और यह सोच बहुत मायने रखती है. अगर आपको प्रतिपक्ष की भूमिका देखना हो तो कृपया पीछे जाइए, प्रतिपक्ष का प्रवेश संसद में 1963 में होता है. दो धुरंधर कांग्रेसी गैर कांग्रेसी के अवतार के साथ संसद में प्रवेश लेते हैं- एक हैं डॉ राम मनोहर लोहिया और दूसरे आचार्य जेबी कृपलानी. ये दोनों टक्कर देने जा रहे हैं देश के ही नहीं, दुनिया के सबसे बड़े 'डेमोक्रेट' जवाहर लाल नेहरू को.
संसद में पहली बार अविश्वास का प्रस्ताव आया. संसद में पहली बार देश की भाषा में बहस की शुरुआत हुई. आम आदमी को लगा यह तो अपनी पंचायत है. गाजीपुर के सासद विश्वनाथ सिंह गहमरी गाँव की गरीबी पर बोल रहे हैं, किस तरह से लोग गोबर से अन्न छान कर निकाल रहे हैं और खा रहे हैं, देश का प्रधान मंत्री अपने आपको नहीं संभाल सका था, आँख नम हो गयी थी. योजनाओं का खाका गाँव की ओर मुड़ा था. संसद में डॉ लोहिया प्रति व्यक्ति औसत आमदनी पर बहस कर रहे हैं, नेहरू सरकार को चुनौती मिल रही है- 'अगर देश के प्रति व्यक्ति की औसत आमदनी तीन आने से ज्यादा हो तो हम राजनीति से संन्यास ले लेंगे और अगर यह सच है तो पंडित नेहरू संसद में रहें लेकिन अपनी गद्दी से हट जायें'. 'तीन आने बनाम तेरह आने' की बहस संसद के पुस्तकालय की कीमती धरोहर है. किशन पटनायक संसद में थे. पंडित नेहरू से उनके खर्चे के बारे में खतो किताबत होती है. एक दिन वह पुस्तक के रूप में आती है- 'रुपीज ट्वंटी फाइव थाउजंड ये डे'. वह है संसदीय प्रतिपक्ष. पिछले बीस साल के संसदीय कार्यवाही को पलट कर देखिये, उसमे देश नहीं है, व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप और जाम है. सो हे सर देसाई जी, हम बड़ी अदब के साथ आपको सलाह देते हैं कि आप सारे नेताओं को इसी तरह का सलाह देते रहें. कोई तो मानेगा…
पत्रकार, स्तंभकार, रंगकर्मी और पोलिटिकल एक्टिविस्ट चंचल के फेसबुक वॉल से.






