उत्तर प्रदेश के डीजीपी का कार्यालय तभी सूचना देगा जब उसकी मर्जी होगी. मर्जी नहीं तो वह कह देता है कि यदि सूचना चाहिए कहीं और से मांगो, हम नहीं देंगे. ऐसे ही दो दृष्टान्त आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के मामलों में हुआ. इन्होंने उत्तर प्रदेश शासन के 15 फ़रवरी 2012 और 27 जून 2012 के दो पत्रों, जिनका आईजी कार्मिक ने 15 मई 2013 के अपने पत्रों में उल्लेख कर ठाकुर को सूचना देने से मना किया था, की छायाप्रति मांगी.
इस पर आईजी कार्मिक का 03 जून 2013 का उत्तर मिला कि यदि ठाकुर को शासन के पत्र की प्रति प्राप्त करनी है तो वे इसे शासन से ही प्राप्त करें, अर्थात वे इसकी प्रति नहीं देंगी. यह नहीं बताया कि वे इन पत्रों की प्रतियां क्यों नहीं देंगी- क्या वे उनके पास उपलब्ध नहीं हैं या आरटीआई एक्ट में उन पर कोई रोक है. बस इतना कह दिया कि हम नहीं देंगे, यदि चाहिए तो शासन से ही पत्र की प्रति लें. चूँकि आईजी कार्मिक का यह उत्तर आरटीआई एक्ट की सीधी अवहेलना है अतः ठाकुर ने पूर्व के कई और उदाहरण रखते हुए इस एक्ट की धारा 18 के तहत मुख्य सूचना आयुक्त को शिकायती पत्र भेजा है.








