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डीजी बृजलाल के आतंक से पीड़ित सुभाष दुबे की गुहार

बड़े अधिकारी किस तरह अपनी ताकत का खुलेआम दुरुपयोग कर सकते हैं यह बात यूपी के अभी तक बहुत ही ताकतवर आईपीएस रहे बृज लाल द्वारा सुभाष दुबे नाम के एक साधारण रेलवे कर्मचारी के मामले में की गयी हरकतों से देखी जा सकती है. दुबे पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर में कार्यरत एक साधारण कर्मचारी हैं रेलवे यूनियन में भी सक्रीय रहे हैं. इन्ही कारणों से आज से करीब पन्द्रह साल पहले उनकी पूर्वोत्तर रेलवे के तत्कालीन महाप्रबंधक सोमनाथ पाण्डेय से लड़ाई हो गयी थी. बृज लालउस समय पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर में प्रतिनियुक्ति पर मुख्य सुरक्षा आयुक्त थे. सोमनाथ पाण्डेय और बृज लाल में आपस में बनती थी क्योंकि शायद दोनों के अनैतिक लाभ और निजी स्वार्थ एक तरह के रहे हों. दुबे सोमनाथ पाण्डेय के गलत कार्यों का विरोध कर रहे थे, लिहाजा जल्दी ही वे बृज लाल के सीधे निशाने पर भी आ गए. बृज लाल ने दुबे को एक-दो बार बुला कर जीएम का विरोध करने से मना किया पर जब वे नहीं माने तो कहानी शुरू हो गयी. उन्होंने अपनी कुर्सी और ताकत का गलत प्रयोग करते हुए दुबे पर हर संभव पुलिसिया अत्याचार शुरू कर दिया.

बड़े अधिकारी किस तरह अपनी ताकत का खुलेआम दुरुपयोग कर सकते हैं यह बात यूपी के अभी तक बहुत ही ताकतवर आईपीएस रहे बृज लाल द्वारा सुभाष दुबे नाम के एक साधारण रेलवे कर्मचारी के मामले में की गयी हरकतों से देखी जा सकती है. दुबे पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर में कार्यरत एक साधारण कर्मचारी हैं रेलवे यूनियन में भी सक्रीय रहे हैं. इन्ही कारणों से आज से करीब पन्द्रह साल पहले उनकी पूर्वोत्तर रेलवे के तत्कालीन महाप्रबंधक सोमनाथ पाण्डेय से लड़ाई हो गयी थी. बृज लालउस समय पूर्वोत्तर रेलवे गोरखपुर में प्रतिनियुक्ति पर मुख्य सुरक्षा आयुक्त थे. सोमनाथ पाण्डेय और बृज लाल में आपस में बनती थी क्योंकि शायद दोनों के अनैतिक लाभ और निजी स्वार्थ एक तरह के रहे हों. दुबे सोमनाथ पाण्डेय के गलत कार्यों का विरोध कर रहे थे, लिहाजा जल्दी ही वे बृज लाल के सीधे निशाने पर भी आ गए. बृज लाल ने दुबे को एक-दो बार बुला कर जीएम का विरोध करने से मना किया पर जब वे नहीं माने तो कहानी शुरू हो गयी. उन्होंने अपनी कुर्सी और ताकत का गलत प्रयोग करते हुए दुबे पर हर संभव पुलिसिया अत्याचार शुरू कर दिया.

बृज लाल वर्ष 1996 से 2003 के बीच गोरखपुर में मुख्य सुरक्षा आयुक्त  के पद पर तैनात रहे. इस दौरान दुबे पर कुल 10 मुकदमे दर्ज कराये गए. इनमे 8 मुकदमों में स्वयं पुलिस वादी थी, जो सभी बृज लाल के यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी होने के नाते उनके प्रभाव में दर्ज हुए. चूँकि ये मुकदमे फर्जी थे इसीलिए आगे चल कर वे इन दसों मुकदमों में दोषमुक्त पाए गए. दुबे ने इस बीच कई बार बृज लाल द्वारा उत्पीडित करने की बात मीडिया के जरिये उठाई लेकिन चूँकि वे बड़े अधिकारी थे, आईपीएस अधिकारी थे, इसीलिए किसी ने भी ठीक से दुबे की बात नहीं सुनी और उन पर अत्याचार कम नहीं हुए. हार कर दुबे ने ऐलान कर दिया कि वे 18 जनवरी 2001 को बृज लाल के अत्याचारों से तंग आ कर विधान सभा, लखनऊ के सामने आत्मदाह करेंगे. दुबे लखनऊ पहुँच भी गए और उन्होंने ऐसा करने का प्रयास भी किया. चूँकि इस बार दुबे ने प्रदेश की राजधानी में आ कर बृज लाल पर सीधे हमला बोला इसीलिए शायद वे भी सकते में आ गए और अचानक से दुबे पर मुकदमे दर्ज होने बंद हो गए.

18 जनवरी 2001 से 2007 तक दुबे पर एक एनसीआर का मुक़दमा तक दर्ज नहीं हुआ. कुछ दिनों बाद बृज लाल रेलवे गोरखपुर से हट गए और दुबे ने भी सोचा कि बात आई-गयी हो गयी. उन्हें इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं था कि एक सीनियर आईपीएस अधिकारी इस तरह से कोई बात मन में पाले रहेगा लेकिन उस समय से बृज लाल दुबे के खिलाफ निजी रंजिश पाले रहे. चूँकि कई सालों तक बृज लाल हाशिए पर रहे इसीलिए दुबे आराम से रहे और उनके हिसाब से बात आई-गयी हो गयी. पर आगे तो कई सारे जुल्मो-सितम होने बाकी थे.

जुलाई 2007 में प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी, बृज लाल ताकतवर स्थिति में आये और दुबे पर अन्याय और अत्याचार की झड़ी लग गयी. बृज लाल के एडीजी ला ऑर्डर बनते ही एक बार फिर उन पर लगातार मुकदमे दर्ज होने लगे. उनके पांच साल के एडीजी ला आर्डर और डीजीपी यूपी के कार्यकाल में दुबे पर 22 मुकदमे दर्ज किये गए. इनमे 16 मुकदमों में वादी पुलिस है. उन पर लगातार 2007 और 2008 में गुंडा एक्ट लगाया गया. इन पांच सालों में उन पर चार बार यूपी गैगस्टर एक्ट में कार्यवाही की गयी- वर्ष 2009 में तो एक ही साल में दो बार मुझ पर गैगस्टर एक्ट लगा. ऐसा शायद ही हिंदुस्तान में किसी और के साथ हुआ हो. दो बार 110 सीआरपीसी में निरोधात्मक कार्यवाही की गयी. पुलिस के इन मुकदमों के अलावा उन पर किसी भी अन्य गंभीर अपराध में शिरकत करने की बात सामने नहीं आई. दुबे को आठ बार जेल भेजा गया और इन पांच सालों में उन्होंने चौबीस माह जेल में गुजारे.

दुबे का कहना है कि इन पांच सालों में उन्हें यह पता ही नहीं चल पाता था कि वे कब जेल में रहेंगे और कब जेल के बाहर. हमेशा उनके अंदर-बाहर का सिलसिला चलता ही रहा. इस दौरान उनका पूरा परिवार तहस-नहस हो गया. बृज लाल दुबे से किस हद तक व्यक्तिगत दुश्मनी पाले हुए हैं इसका अंदाजा 30 जून 1997 के आर के विश्वकर्मा, तत्कालीन एसएसपी गोरखपुर के महाप्रबंधक, पूर्वोत्तर रेलवे को भेजे पत्र से लगाया जा सकता है जिसमे उन्होंने बृज लाल के कहने पर दुबे जैसे साधारण रेलवे अफसर के ट्रांसफर की संस्तुति की थी. पुनः इस बार एडीजी ला ऑर्डर बनने के बाद पहले बृज लाल ने पियूष मोर्डिया, एसएसपी गोरखपुर से 07 अगस्त 2008 को उनके ट्रांसफर के लिए पत्र लिखवाया. इस पत्र की कॉपी मोर्डिया ने सिर्फ एडीजी ला ऑर्डर को दी, पुलिस विभाग के किसी अन्य अधिकारी को नहीं. अपने डीआईजी और आईजी तक को नहीं. इतने पर भी जब बृज लाल का मन नहीं भरा तो उन्होंने 26 अगस्त 2008 को खुद ही दुबे जैसे छोटे कर्मचारी के ट्रांसफर के लिए रेलवे बोर्ड के कार्मिक सदस्य तक को पत्र लिख दिया और आगे भी कई बार पत्र लिखे.

दुबे ने अब ऐलान किया है कि बृज लाल के इन अत्याचारों का वे अंत तक विरोध करेंगे और उनके हर अत्याचार के लिए उन्हें कानूनी रूप से दण्डित कराये बिना चुप नहीं बैठेंगे. उन्होंने बृज लाल द्वारा कराये गए इन अत्याचारों की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है. मानव अधिकारों पर कार्यरत होने के नाते मैं और हमारी संस्था आईआरडीएस सुभाष दुबे की इस लड़ाई में पूरी तरह साथ हैं और उनकी न्याय के लिए इस लड़ाई में कदम से कदम मिला कर चलेंगे.

लेखिका डॉ नूतन ठाकुर मानव अधिकार के लिए कार्यरत लखनऊ स्थित संस्था आईआरडीएस की कन्वेनर.

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