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‘डेढ़ इश्किया’ को महसूस करने के लिए दिल का डेढ़ गुना होना बेहद जरूरी है

शुरुआत में डेढ इश्किया देखने का तजरबा किसी मुशायरे में शिरकत करने से जैसा है। यह विशाल भारद्वाज की ही कलंदरी है कि विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म में भी वे उर्दू अदब की खुशबू इतने करीने से रखते हैं कि दिल बाग-बाग हो जाता है। मल्टी प्लेक्स में फिल्म शुरू होने के थोड़ी ही देर बाद शेर औ शायरी का ऐसा शमां बंधता है कि दर्शकों की वाह-वाह से ऐसा लगने लगता है कि हम सिनेमा हॉल में न होकर किसी मुशायरे में शिरकत फरमा है। फिल्म के कई सीन्स में हमारे दौर के हकीकत के शायर जैसे अनवर जलालपुरी साहब, डॉ नवाज़ देवबन्दी साहब को देखना मेरे जैसे ऊर्दू अदब के मुरीद के लिए बेहद सुकून भरा रहा है…

शुरुआत में डेढ इश्किया देखने का तजरबा किसी मुशायरे में शिरकत करने से जैसा है। यह विशाल भारद्वाज की ही कलंदरी है कि विशुद्ध व्यावसायिक फिल्म में भी वे उर्दू अदब की खुशबू इतने करीने से रखते हैं कि दिल बाग-बाग हो जाता है। मल्टी प्लेक्स में फिल्म शुरू होने के थोड़ी ही देर बाद शेर औ शायरी का ऐसा शमां बंधता है कि दर्शकों की वाह-वाह से ऐसा लगने लगता है कि हम सिनेमा हॉल में न होकर किसी मुशायरे में शिरकत फरमा है। फिल्म के कई सीन्स में हमारे दौर के हकीकत के शायर जैसे अनवर जलालपुरी साहब, डॉ नवाज़ देवबन्दी साहब को देखना मेरे जैसे ऊर्दू अदब के मुरीद के लिए बेहद सुकून भरा रहा है…

डॉ. नवाज़ देवबन्दी साहब का शेर हो या डॉ बशीर बद्र के शेर से अनवर जलालपुरी साहब का महफिल का आगाज हो, एकदम से फिल्म में उर्दू अदब का अहसास दिल को राहत देता है। हाँ, हो सकता है फिल्म का ऐसा कलेवर कुछ कम ही लोगों को पसन्द आये लेकिन मुझे बेहद पसन्द आया है। जिस तरह से विशाल भारद्वाज़ ने असल के शायर को फिल्म में शामिल किया है वह काबिल-ए-तारीफ है और अभी तक मैंने और किसी फिल्म में नहीं देखा है। फिल्म से मेरे जुड़ने की एक वजह यह भी हो सकती है कि फिल्म के डायलॉग पर पश्चिमी यूपी की बोली का प्रभाव है। अरशद वारसी का खालिस बिजनौरी लहज़े में डायलॉग बोलना खुद ब खुद फिल्म से जोड़ देताहै। फिल्म में लखनवी अदब और ऊर्दू जबान का वकार भी है। साथ में दो ठग/चोर के रूप में अरशद वारसी और नसीरुद्दीन साहब का बिजनौरी स्टाईल भी…।

विशाल भारद्वाज़ के चुस्त डायलॉग नि:सन्देह मुझे बेहद पसन्द आये। मैं उनके इस फन का मुरीद हो गया हूँ। फिल्म में दो हसीन अभिनेत्रियां दोनों ही मुझे बेहद पसंद हैं और बेगम पारा के रोल में तो माधुरी दीक्षित का हुस्न गजब का रुहानी अहसास लिए है। उनकी अदा, हरकतें, भाव-भंगिमाएं और अभिनय सबके सब कमाल के हैं। वो बेगम पारा के रोल को जिस उरुज तक ले गईं, यह उन्हीं के बस की बात थी। कोई और अभिनेत्री शायद ऐसा न कर पाती। हुमा कुरैशी मुझे निजी तौर पर दो वजह से पसन्द हैं। एक तो उनकी लम्बाई और दूसरी उनकी बेइंतेहा खूबसूरती। उनके चेहरे मे कस्बाई लुक है। वह अपने मुहल्ले की सबसे खूबसूरत लड़की जैसी लगती हैं, इसलिए हुमा कुरैशी का फिल्म में मुनिया का रोल फिल्म की जरूरत बनता चला जाता है। नसीर साहब के अभिनय पर मैं क्या तब्सरा करुँ, इतनी मेरी हैसियत नहीं है। वो लिविंग लीजेंड हैं। उनके अलावा अरशद वारसी की एक्टिंग की भी तारीफ बनती है और सबसे अधिक मुझे प्रभावित किया नकली नवाब की भूमिका में विजय राज साहब ने। नसीरुद्दीन साहब के साथ कई सीन्स में उनका नैचुरल एक्टिंग और कम्फर्ट उनका भी मुरीद बना देता है।

फिल्म की दो बड़ी कमजोरी मुझे नजर आई। एक तो फिल्म का अंत जरूरत से अधिक नाटकीयता लिए है और जल्दी से हजम होने वाला नहीं है। दूसरा 'हमरी अटरिया पे आजा सांवरिया' गीत फिल्म के अंत के बाद शुरू होता है जब तक दर्शक उठकर चलने लगते हैं। मैं इस गीत में माधुरी के डांस और नाट्यशास्त्र के लिहाज़ से मुद्राएं देखने के लिए भी प्रेरित होकर फिल्म देखने गया था जो आधे-अधूरे मन से ही पूरा हो पाया। हालांकि मैं अंत तक सीट पर जमा रहा, शायद एक दो और माधुरी के ऐसे मुरीद थे, जो बैठे थे लेकिन दर्शकों के जाने के क्रम में गीत का मजा किरकिरा हो जाता है।

फिल्म समीक्षकों और सिनेमा के जानकार बुद्धिवादी दर्शकों के लिहाज से डेढ इश्किया को भले ही डेढ स्टार भी न मिलें, मैं बिना इसकी परवाह इस फिल्म को विशाल भारद्वाज की एक उम्दा फिल्म करार देता हूँ। और, हाँ पिछली इश्किया से मुझे यह डेढ़ इश्किया ज्यादा पसन्द आयी…। कोई आग्रह नहीं है, ना ही मैं कोई फिल्म समीक्षक हूँ, सिनेमा का दर्शक होने के नाते फिल्म देखने के बाद जैसा मैंने महसूस किया लिख दिया। इसे फिल्म देखने की अनुशंसा जैसा भी न समझा जाए, कहीं फिर आप बाद में उलाहना दें, क्योंकि डेढ़ इश्किया को महसूस करने के लिए दिल का डेढ़ गुना होना बेहद जरूरी है।

लेखक डॉ. अजीत हरिद्वार के शिक्षक और साहित्यकार हैं.

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