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सुख-दुख...

डौंडिया लाइव!

ये सच है कि एक जमाने में पुरातत्वशास्त्रियों और सेधंमारों के बीच का अंतर बहुत अधिक नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वशास्त्री के भेस में घूमने वाले लोगों को कुछ खास चीजों की तलाश थी। बगैर किसी खास योजना के ये उन जगहों पर जाते जहाँ उन्हें उसके मिलने की आशंका होती या जिसके बारे में उन्होंने स्थानीय लोगों से कुछ सुना होता। फिर शुरू होता बेतरतीब खुदाई का दौर जिसमें पूरा ध्यान उन चीजों की तरफ रहता जिनकी तलाश में वे खुदाई कर रहे होते।

ये सच है कि एक जमाने में पुरातत्वशास्त्रियों और सेधंमारों के बीच का अंतर बहुत अधिक नहीं था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में पुरातत्वशास्त्री के भेस में घूमने वाले लोगों को कुछ खास चीजों की तलाश थी। बगैर किसी खास योजना के ये उन जगहों पर जाते जहाँ उन्हें उसके मिलने की आशंका होती या जिसके बारे में उन्होंने स्थानीय लोगों से कुछ सुना होता। फिर शुरू होता बेतरतीब खुदाई का दौर जिसमें पूरा ध्यान उन चीजों की तरफ रहता जिनकी तलाश में वे खुदाई कर रहे होते।

असंबद्ध या मामूली दीख पड़ने वाली चीजों को यूँ ही फेंक दिया जाता था। मनमाफ़िक चीजें मिलीं तो ठीक वरना आगे कहीं और कूच कर जाते। पीछे छोड़ जाते बुरी तरह से तितर-बितर हो चुका पुरास्थल जिसके स्तर-विन्यास का पता लगा पाना भी कई बार मुश्किल होता। खुदाई में मिली ‘चीजें’ या तो तथाकथित खुदाई अभियान के लिए धन देने वाले रईसों के घरों की शोभा बनतीं या तस्करों की मार्फ़त निजी या राष्ट्रीय संग्राहालयों तक पहुँचती। मौका लगने पर ऐसे पुरातत्वशास्त्री अपनी सरकारों के लिए जासूसी भी कर लेते थे। पुरास्थल या उससे प्राप्त चीजों के साथ जुड़ी स्थानीय भावनाओं से उन्हें अधिक लेना-देना नहीं था।

बेशक आज जमाना बदला है। पुरातत्व अब सेंधमारों और कब्र-चोरों के हाथ से निकल कर विज्ञान का दर्जा प्राप्त कर चुका है। आजकल मनमाफिक ‘चीजों’ की तलाश के लिए नहीं बल्कि एक शोध-समस्या को सामने रखकर खुदाई अभियानों की योजना बनाई जाती है। मामूली लगने वाली चीज की भी उतनी ही अहमियत होती है जितनी किसी कलात्मक वस्तु या मूल्यवान धातु से बनी चीज की। स्तर-विन्यास का ध्यान दिया जाता है और प्राप्त चीजों का ‘3-डी’ लेखा-जोखा रखा जाता है। पुरातत्व अब पुरानी वस्तुओं के संग्रह का शग़ल न रहकर मानव इतिहास के विभिन्न चरणों की समग्र तस्वीर प्रस्तुत करने का माध्यम बन चुका है।

लेकिन डौंडिया खेड़ा के घटनाक्रम ने ये साबित कर दिया है कि न सिर्फ वहाँ जमा हुए अनपढ़ तमाशबीन बल्कि तमाम पढ़े-लिखे लोग भी पुरातत्व को ख़जाना खोजने की कयावद ही समझते हैं। समस्यापरक पुरातत्व इनके लिए कोई मानो है ही नहीं। आखिर कौन लोग है जिन्होंने पुरातत्व विभाग को एक बाबा के वचन की सत्यता को परखने के काम पर लगा दिया है? कहीं ये वही लोग तो नहीं जिन्होंने इस विभाग को “बताओ ! मंदिर या मस्जिद?” के काम में जुटा दिया था।

इस मामले में नेतानगरी और बाबानगरी के बीच का संबंध कुछ-कुछ खुलने लगा है। चरणदास महंत नाम के एक प्राणी की भूमिका काफ़ी संदिग्ध मानी जा रही है। कौन हैं ये चरणदास महंत ? वही जिन्होंने एक बार कहा था कि अगर सोनिया गाँधी मुझे छत्तीसगढ़ के प्रदेश काग्रेस कार्यालय में झाड़ू लगाने के लिए कहें तो वे ऐसा करेंगे। जी हाँ वही चरणदास महंत जो केंद्र में कृषि और खाद्य-प्रसंस्करण राज्यमंत्री हैं। इस इलाके में मंत्रीवर के 22 सितम्बर और फिर 7 अक्तूबर के दौरे से ये सारा खेल शुरु हुआ। इससे पहले शोभन सरकार के सपने के बारे में कोई भी नहीं जानता था। कानपुर के किसी पंडज्जी ने मंत्रीजी को बताया और मंत्रीजी ने फिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और जिओलॉजिकल सर्वे के लोगों को लपेटे में लिया और यहीं से शुरू हो गया एक नया कार्यक्रम – डौंडिया लाइव !

लेखक डा. रजनीश कुमार जामिया मिलीया इस्लामिया विश्वविद्यालय, दिल्ली के इतिहास एवं संस्कृति विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं.


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