घर पहुंच गई हूं. एक बेहद तनाव भरे सफर के बाद. आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया कि ट्रेन में बहुत से मृतप्राय लोगों के बीच, फेसबुक पर आप सभी का सपोर्ट मिला जिसने बहुत साहस दिया. अच्छी बात ये रही कि हापुड़ स्टेशन पर 4 सिपाही आ गए और उन उज्जडों को पकड़कर ले गए. लेकिन इस घटना ने सच में डरा दिया था. एक मित्र ने कहा कि आजकल की लड़कियां ऐसी परिस्थितियों का सामना कर लेती हैं. सही है, लेकिन सामना करना, किसी टॉर्चर से कम नहीं.
और जरा सोचिए, 50-60 आवारा लड़के, जिनके लिए मां-बहन की गाली देना जुगाली करने जैसा हो, तमीज का त, जिनसे अछूता हो, उन्हें आप कैसे हैंडल करेंगे. और बातों से वो मानने वाले थे नहीं और ये भी सच है कि मैं कृष की बहन नहीं हूं जो पचास को अकेले संभाल लूं और आपके आस-पास के बर्थ के लोग केवल कंबल में से टुकुर-टुकुर देखने वाले दर्शक हों तो शायद आप अपने हक के लिए बोलकर फंसते ही हैं. फिलहाल सोने जा रही हूं और thanx to all of you कि आपने सपोर्ट किया और उन सभी विशेज के लिए जो आपने मेरे लिए कीं.






