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तरुण, तहलका और पत्रकारिता की त्रासदी का युग

वर्ष 2001 में तरुण तेजपाल ने तहलका डॉट कॉम के जरिये भाजपा के नेता बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते कैमरे में कैद कर के तहलका मचा दिया था. उसके बाद मैच फिक्सिंग करते खिलाड़ियों और बुकियों को बेनक़ाब करना हो या गुजरात दंगों में अपने स्टिंग ऑपरेशन "कलंक" के जरिये माया कोडनानी और बाबू बजरंगी की संलिप्तता दिखाकर उनको सलाखों के पीछे भिजवाना, ऐसे कई खुलासों ने तहलका और तरुण तेजपाल को पत्रकारिता जगत में एक पहचान दिला दी, तहलका की खोजी पत्रकारिता लगातार जारी रही. तहलका अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए जाना माना नाम बन गया.
वर्ष 2001 में तरुण तेजपाल ने तहलका डॉट कॉम के जरिये भाजपा के नेता बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते कैमरे में कैद कर के तहलका मचा दिया था. उसके बाद मैच फिक्सिंग करते खिलाड़ियों और बुकियों को बेनक़ाब करना हो या गुजरात दंगों में अपने स्टिंग ऑपरेशन "कलंक" के जरिये माया कोडनानी और बाबू बजरंगी की संलिप्तता दिखाकर उनको सलाखों के पीछे भिजवाना, ऐसे कई खुलासों ने तहलका और तरुण तेजपाल को पत्रकारिता जगत में एक पहचान दिला दी, तहलका की खोजी पत्रकारिता लगातार जारी रही. तहलका अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए जाना माना नाम बन गया.
 
20 से 30 साल के युवा पत्रकारों की टीम ने तहलका के जरिये मीडिया के कॉर्पोरेट दौर में सरोकारी और सत्ता पर असर करने वाली पत्रकारिता का विश्वास जगाया. लेकिन ये अपने तरह का पहला मामला है कि जिस व्यक्ति ने तहलका को खड़ा किया और सफलता की बुलंदियों तक पहुंचाया आज वही व्यक्ति खुद तहलका के लिए त्रासदी बना हुआ है. वो भी अपनी पत्रकारिता के कारण नहीं बल्कि अपनी एक ऐसी करतूत से जिसका पत्रकारिता का दूद-दूर तक कोई लेना देना नहीं. तेजपाल पर उन्हीं की एक सहयोगी लड़की ने गोवा में एक समारोह के दौरान सेक्सुअल असाल्ट करने का आरोप लगाया. और तेजपाल ने अपनी गलती को मान भी लिया और अपने पद से 6 महीने के लिए त्यागपत्र दे दिया. हालांकि उन्हें असली सजा तो क़ानून देगा, लेकिन संयोग देखिये जिस तरुण तेजपाल के कारण अधिकतर युवा तहलका के जरिये पत्रकारिता करना चाहने थे, आज उसी तेजपाल के कारण कई पत्रकार तहलका छोड़ रहे हैं. जिनमे शोभा चौधरी, राणा अयूब, जैसे कई नाम हैं.
 
हालांकि कुछ लोग इस दौर में तेजपाल के इस निजी कृत्य के कारण तहलका और उसकी पत्रकारिता पर लगातार हमले कर रहे हैं, जो कि उचित नहीं है. तरुण तेजपाल ने जो किया वो अपराध की श्रेणी में आता है, ये पूर्णतः घृणित अपराध है. दोषी सिद्ध होने पर कड़ी से कड़ी सजा भी मिलनी चाहिए, और एक बड़े पत्रकार के लिए तो यह बहुत ही शर्मनाक है, क्योंकि पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं बल्कि समाज की वो आदर्श स्थिति है जिससे सामाजिक ताना-बाना सीधे सीधे जुड़ा हुआ है. पत्रकार का काम सिर्फ ख़बरों को पहुंचाना मात्र नहीं है बल्कि समाज को रास्ता दिखाना भी है. खैर मुद्दे पर लौटते हैं, तेजपाल ने जो किया उससे निपटना क़ानून का काम है, लेकिन तेजपाल के कारण तहलका और पत्रकारिता पर हमला करना उचित नहीं होगा, क्योंकि तहलका आज के दौर में तरुण तेजपाल के कारण ही नहीं बल्कि उससे इतर तहलका में काम करने वाले कई युवा पत्रकारों के कारण भी जाना जाता है. तेजपाल ने कई सत्ताधारियों की चूलें हिलाई हैं, इसलिए उनके विरोधियों की संख्या भी सम्भवतः अधिक होगी. कहावत है कि एक बुराई सौ अच्छे कर्मो को मिटटी में मिला देती है. तेजपाल के इस अपराध ने विरोधियों को हमला करने का मौका तो दिया ही है साथ ही तहलका की पत्रकारिता पर भी हमला करने का सुनहरा मौका विरोधियों को दिया है. कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि तहलका के स्टिंग भाजपा पर ही क्यों होते हैं लेकिन सवाल यह नहीं होना चाहिए क्योंकि यह कतई जरूरी नहीं किसी एक पार्टी कि चोरी पकड़ में आयी है तो दूसरी पार्टी की चोरी भी उसी के द्वारा पकड़ी जानी चाहिए थी. अगर किसी पार्टी का भ्रष्टाचार पकड़ा गया है तो इसका मतलब चोरी हो रही थी तभी पकड़ी गई.
 
कई पत्रकार भी इसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, ये वही लोग है जो खुद पत्रकार होकर निष्पक्ष न होकर पार्टीवादी मानसिकता रखते हैं. ऐसे दौर में जब अखबारों और टीवी चैनलों पर राजनैतिक पार्टियों की चाटुकारिता के आरोप लग रहे हैं तब पत्रकारों का एकजुट होना जरूरी है, क्योंकि डर इस बात का है कि जनता का मीडिया को लेकर जो पार्टीवादी परसेप्शन बनता जा रहा है कही उसकी आड़ में जनता के असल मुद्दों और महत्व रखने वाले समाचारों की मृत्यु न हो जाये. देश के तमाम मीडिया संस्थानों को अपनी साख बचानी होगी, वरना ऐसे लोकतान्त्रिक देश के लिए जहां जनता सरकार चुनती है, और मीडिया सरकार बनाने के लिए जनमत बनाने का सबसे बड़ा माध्यम है, इसलिए इस चौथे खम्भे को मजबूत करना जरूरी है, क्योंकि पिछले कुछ बरस में लोकतंत्र की  निगरानी करने वाला चौथा स्तम्भ मीडिया भी लगातार राजनीतिकरण का शिकार हुआ है और तथाकथित पत्रकारों और संपादको कि करतूतें पत्रकारिता के लिए त्रासदी बनती जा रही हैं.
 
आज देश में सैकड़ों अख़बार और टीवी चैनल हैं, लेकिन आम आदमी की परेशानी ये है कि वह किसकी ख़बरों पर भरोसा करें. सबकी मानसिकता यह हो चली है कि ये चैनल भाजपा वालों का है और ये कांग्रेस का, क्योंकि इन अखबारों और चैनलों की पहचान भी भाजपा कांग्रेस से जुड़ती जा रही है, और ऐसे सम्पादकों की कमी नहीं जिनका सम्बन्ध किसी राजनैतिक पार्टी से ना हो, गूगल सर्च करेंगे तो कई ऐसे पत्रकारों के बारे में जानने का मौका मिलेगा जो पत्रकारिता करते-करते पिछले दरवाजे से राजनैतिक पार्टी में शामिल हो गए. पंकज पचौरी एनडीटीवी से मनमोहन के मीडिया सलाहकार बन गए, इसके अलावा अरुण शौरी, चन्दन मित्रा और हिंदुस्तान अख़बार के संपादक, कई उदाहरण है. तो समझिये कि जिस पत्रकारिता के आसरे आम आदमी सरकार या अपने नेताओं को परखता है बल्कि पब्लिक परसेप्शन भी बनाता है, वही मीडिया निष्पक्ष न होकर पार्टियों कि चापलूसी करने लगा है. अब चैनलों और अख़बारों का इस्तेमाल गलत काम करने वाली सरकार को हटाने नहीं बल्कि बचाने के लिए होने लगा है. चुनावी मौसम में कई अख़बार और टीवी चैनल पनपने लगे है, क्योंकि कमाई करने का यही सुनहरा मौका होता है. जिंदल और ज़ी न्यूज़ प्रकरण हो या 2जी स्पेक्ट्रम या फिर तहलका के संपादक तरुण तेजपाल की ताज़ा करतूत, सभी ने पत्रकारों की विश्वसनीयता की साख पर बट्टा लगाया है.  
 
लेखक सुनील रावत युवा मीडिया विश्लेषक हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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