सबमें एक राक्षस होता है और जब वह जागता है तो आंखों पर पट्टी पड़ जाती है… अच्छे-बुरे का भेद खत्म हो जाता है.. समाज, सरोकार और सम्मान आदि की बातें जेहन से गायब हो चुकी होती हैं… पर जब पागलपन, उन्माद, आवेग, तामसिकता का वह वक्त गुजरता है तो पश्चाताप व अवसाद का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है… तरुण तेजपाल के मामले में मुझे लगता है कि पीड़ित लड़की को अब तरुण को माफ कर देना चाहिए… उनकी जितनी जलालत हो सकती है, हो चुकी है… अब केवल इस पर राजनीति हो रही है और आगे भी होगी… करप्ट न्यूज चैनल्स और करप्ट मीडिया हाउसेज को मौका मिल गया है तेजपाल व तहलका को डाउन डाउन करने का… भाजपा जैसी फासिस्ट, करप्ट व बेसिरपैर की पार्टी बंगारु लक्ष्मण घूस कांड उजागर करने वाले तहलका के तरुण तेजपाल से बहुत ठीक से हिसाब-किताब चुकता करने व बदला लेने में जुट गई है और इस पार्टी की गोवा सरकार ने पुलिस वाले भेज दिए हैं दिल्ली, तेजपाल को बेइज्जत व प्रताड़ित करने के लिए…
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कुछ लोग सवाल कर सकते हैं कि आखिर आसाराम व तेजपाल में फर्क क्यों? आसाराम का पूरा कारोबार जनविरोधी, अंधविश्वासी व ठगी पर आधारित है. वो लोगों की चेतना को भ्रष्ट कर, सम्मोहित कर अपनी पैसे, पावर, प्रसिद्धि, सेक्स आदि की भूख को मिटाता था… उसका मीडिया ट्रायल सही था और है… कम से कम बाकी हरामखोर बाबाओं के भीतर डर तो बैठा …. बाकी इसी किस्म के चिरकुट बाबा किसी लड़की-महिला के साथ बुरा काम करने से पहले दस बार सोचेंगे… पर तरुण तेजपाल का केस बिलकुल डिफरेंट है… वो चीजों को बहुत लाजिकली व डेमोक्रेटकली कुबूल चुके हैं… अब अलग बात है कि जब लोग राजनीति करने लगे हैं तो उन्हें भी अब स्ट्रेटजिक बयान देने पड़ रहे हैं ताकि वे कोर्ट में अपना बचाव कर सकें और यह अधिकार भारतीय न्यायिक व्यवस्था सभी को देता है कि वो अपना बचाव कर सके… जाहिर है, मामला लीगल होता जा रहा है तो उन्हें अपने वकील से परामर्श कर बयान देना पड़ रहा है… पर इसके पहले का देखिए. उन्होंने मेल एसएमएस आदि के जरिए अपमानित व पीड़ित लड़की से बार-बार माफी मांगी, गल्ती कुबूल की और आखिरकार संपादक पद तक त्याग दिया… ऐलान करके… लेकिन लड़की जाने क्यों अड़ी हुई है तेजपाल की बैंड बजवाने के लिए… प्रायश्चित से बड़ा दंड कोई नहीं होता… तरुण तेजपाल को जो अपने पर गुमान रहा होगा कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, वो गुमान खत्म हुआ…

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लड़की ने अपने साथ हुए हरकत के खिलाफ जो कुछ भी किया, बिलकुल सही किया. तरुण तेजपाल की बेटी को पूरी बात बताई. मेल लिखा. अपने सहयोगियों को बताया. इनटरनल इनक्वायरी की बात की… प्रायश्चित करने हेतु तरुण के दिए गए इस्तीफे से असंतुष्टि जाहिर की…. पर उसकी अगर मंशा तरुण तेजपाल को आसाराम की तरह नंगा करके बेइज्जत करने या दिल्ली गैंगरेप के रेपिस्टों की तरह फांसी दिलवाने की है तो मैं इससे पूरी तरह असहमत हूं… दिल्ली गैंगरेप और आसाराम प्रकरण से तरुण तेजपाल का प्रकरण बिलकुल डिफरेंट है. यहां तरुण तेजपाल को हिंसक बलात्कारी अपराधी की तरह नहीं, किसी पाखंडी व दबंग आसाराम की तरह नहीं देखा जा सकता. एक शानदार जर्नलिस्ट, एक शानदार एडिटर, एक शानदार मनुष्य उर्फ तरुण तेजपाल ने अपोजिट सेक्स के प्रति प्रबल आकर्षण, भीषण आवेग, क्षणिक आवेश, तात्कालिक उन्माद में आकर जो कुछ किया, उसके लिए उन्हें सरेआम झिड़क देना, मेल लिख देना, उनकी बेटी व परिजनों तक को बता देना ही पर्याप्त दंड था… तेजपाल कोई असंवेदनशील और अपराधी तो नहीं हैं कि जब उन्हें जेल में डाला जाएगा तभी उन्हें एहसास होगा कि उन्होंने गलत किया है. एक बेहद संवेदनशील आदमी को अपनी गल्ती का एहसास तभी हो जाता है जब पीड़ित पक्ष लगातार इस बात पर अड़ा रहे कि उसे पीड़ित किया गया है… उसके साथ अत्याचार किया गया है… वो पीड़ित महिला जर्नलिस्ट खुद के लिए न्याय का एक फार्मेट चुन सकती थी कि अगर तरुण ये कर दें तो वो उन्हें माफ कर देगी… पर ऐसे एडिटर, ऐसे पत्रकार, ऐसे व्यक्ति को दंडित-बेइज्जत करने के लिए इतना एडामेंट रहना भी एक तरह का उत्पीड़न है…
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महिलाओं के प्रति न्याय, कानून, सिस्टम की बढ़ती संवेदनशीलता के कारण अब हर कोई पुरुष तलवार की धार पर है.. कब कौन उस पर उंगली उठा दे… सेक्स, प्यार, फ्लर्ट, ठिठोली, छूना, सहलाना, छेड़छाड़, घूरना, हंसना, आहें भरना, देखना आदि इत्यादि… ये सब तब तक तो ठीक है जब तक अपोजिट सेक्स की सहमति है या उसकी कोई साजिश नहीं है… लेकिन ये सब सहमति से होने के बावजूद अगर कोई अचानक पुलिस के पास जाकर कह दे कि मेरा मेडिकल कराओ, मेरा यौन शोषण किया गया है तो कोई ये नहीं कहेगा कि ये लड़की पीड़िता नहीं है, कोई नहीं कहेगा कि ये लड़की जेनुइन नहीं है.. यहां मेरे कहने का ये आशय बिलकुल नहीं है कि तरुण तेजपाल दोषी नहीं हैं और लड़की साजिशन आरोप लगा रही है.. प्रथम दृष्टया मामला सच जान पड़ता है … वो भी तब जब तरुण के एसएमएस व मेल पढ़े जाएं… पर इस मामले पर पीड़ित लड़की का इतना कठोर रुख अब तक अपनाए रखना और भाजपा शासित गोवा सरकार की गजब की फुर्ती दिखाना अब बता रहा है कि दाल में कुछ जरूर काला है… अब लग रहा है कि तरुण तेजपाल को एक बढ़िया से बुने गए जाल में शानदार तरीके से फांसककर कैद कर दिया गया है और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं कि कुछ गलत हो रहा है… कुछ संगीन हो रहा… क्योंकि भारत भेड़चाल का शिकार है और यहां की मीडिया भी.. याद रखिए… इतिहास गवाह है कि बड़े-बड़ों का नाश-सत्यानाश-खात्मा उनके करीबियों को भरोसे में लेकर, सिखा-पढ़ाकर ही कराया जाता है…
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कई लोग मुझे कह रहे हैं कि तरुण तेजपाल मसले पर मैं कुछ लिख बोल नहीं रहा हूं… मैं थोड़ी स्प्रिचुअल बात कहना चाहूंगा… मुझे अब कोई घटना हैरान परेशान दुखी हताश नहीं करती… खासकर इंद्रियजन्म आवेग में हुए प्रकरण… अगर गल्ती से पुरुषों के पास लिंग है और पुरुष डामिनिटेड सोसाइटी होने के कारण उनमें सेक्सुअल एक्टिविज्म ज्यादा है तो हर कोई कहीं न कहीं कभी न कभी 'एक्सीडेंट' का शिकार होता है… कोई चूमने की कोशिश करने के अपराध में बलात्कारी घोषित कर दिया जाता है और उसका मीडिया ट्रायल कर दुनिया समाज का सबसे बुरा आदमी घोषित कर दिया जाता है तो कोई अकेलेपन व अँधेरे के कारण माहौल के अनुकूल होने के नाते लव यू बोलने के साथ ही गले लगाने, किस करने, फिर पूरे बदन पर हाथ फिराने के कारण घटना के अगले दिन अपराधी घोषित कर दिया जाता है… यहां साफ कहना चाहूंगा कि मैं उन कुंठितों की बात बिलकुल नहीं कर रहा जो अकेले व अंधेरे में निर्मम हत्यारे, निर्मम बलात्कारी हो जाते हैं.. मैं उन विकृत दिमागों की बिलकुल बात नहीं कर रहा जो मौका अनुकूल देखकर अचानक से हमलावर हो जाते हैं और सामने वाली को कुछ भी सोचने-समझने का मौका नहीं देते… बहुत बारीक फर्क है एक ही घटना को दो अलग-अलग किस्म के पुरुषों द्वारा करने में.. इसे ध्यान से, समझदारी से समझना होगा… तरुण तेजपाल संवेदनशील, डेमोक्रेटिक, महिलाओं का सम्मान करने वाले पुरुष हैं… यह तो हर किसी को मानना होगा… अब वो एक गल्ती कर चुके हैं और उसकी माफी खुलेआम मांग चुके हैं तो उन्हें माफ करना चाहिए, उन्हें जीने देना चाहिए, उन्हें खुद को बदलने का मौका देना चाहिए… यही डेमोक्रेटिक व रेशनल एप्रोच है…
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आजकल भारत का एलीट क्लास चुपचाप अपने बालकों, अपने कलीगों से कहता सिखाता बताता है कि सेक्स-प्रेम-लड़की को लेकर कोई प्रयोग, कोई दुस्साहस, कोई रचनात्मकता, कोई सेंटी काम इंडिया में मत करना वरना आसाराम बनते देर न लगेगी… अब कहा जाएगा कि तरुण तेजपाल बनते देर न लगेगी.. ये एलीट क्लास अपने आदमियों को हर छह महीने में अपनी सेक्सुअल वाइल्ड फैंटेसीज को इंज्वाय करने के लिए थाइलैंड जैसे देशों में जाने की सलाह देता है जहां से लौटा हुआ आदमी बताया है कि भारत सेक्स के नाम पर शून्य है… सेक्स जैसे बहुआयामी, मैग्नेटिक, रोमांचकारी विधा का पूरा मजा, सुख, आनंद थाइलैंड सरीखे देशों में मिलता है जहां सेक्स का खुला कारोबार है और हर विदेशी के साथ उसके पसंद की एक थाई लड़की पैसे देकर लिखित डील के तहत चौबीसों घंटे के लिए अटैच हो जाती है, और कामसूत्र के संपूर्ण अध्यायों के अलावा नए जमाने के ढेरों प्रयोगों को अंजाम देती है… मतलब ये कि भारत के बेहद समझदार लोग, पैसे वाले लोग, एलीट लोग अपने को और अपने जानने वालों को बेहद साफ साफ कहते हैं कि भारत में किसी भी तरह से लड़की के चक्कर में मत पड़ना वरना सब कुछ नष्ट होते देर न लगेगी…
…जारी….
भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.
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