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तवलीन सिंह कौन सा काम लेकर मंत्रालय जाती हैं, जवाब दें

यशवंतजी, आपका ध्‍यान एक रुचिकर मामले की तरफ ध्यान दिला रहा हूं। तवलीन सिंह ने नौकरशाहों की मनमर्जी पर कटाक्ष किया है। सवाल ये है कि सुविख्‍यात स्तंभकार तवलीन सिंह पाठकों को साफ-साफ बताएं कि वे बड़े मंत्रालायों के नौकरशाहों के पास कौन से काम कराने की मांग लेकर गईं थीं, जो पूरे न होने के कारण उनको निराशा हुई। उन्होंने पाठकों के साथ ये दर्द तो साझा किया कि वे मंत्रालयों में नौकरशाहों के पास कुछ काम कराने की उम्‍मीद लेकर जाती रही हैं, लेकिन काम होते नहीं है। ये नहीं बताया कि काम का स्वरूप कैसा है? भाई ऐसा न बताना सीधे-सीधे पाठकों के साथ धोखा है।

यशवंतजी, आपका ध्‍यान एक रुचिकर मामले की तरफ ध्यान दिला रहा हूं। तवलीन सिंह ने नौकरशाहों की मनमर्जी पर कटाक्ष किया है। सवाल ये है कि सुविख्‍यात स्तंभकार तवलीन सिंह पाठकों को साफ-साफ बताएं कि वे बड़े मंत्रालायों के नौकरशाहों के पास कौन से काम कराने की मांग लेकर गईं थीं, जो पूरे न होने के कारण उनको निराशा हुई। उन्होंने पाठकों के साथ ये दर्द तो साझा किया कि वे मंत्रालयों में नौकरशाहों के पास कुछ काम कराने की उम्‍मीद लेकर जाती रही हैं, लेकिन काम होते नहीं है। ये नहीं बताया कि काम का स्वरूप कैसा है? भाई ऐसा न बताना सीधे-सीधे पाठकों के साथ धोखा है।

भारतीय पत्रकारिता में जिन लोगों को वट वृक्ष, बड़े स्तंभ और न जाने किन किन बड़े विशेषणों से अलंकृत किया जाता है, उनमें से एक सम्‍मानीय तवलीन सिंह ने अमर उजाला के  रविवारीय अंक में प्रकाशित लेख में नौकरशाओं की मनमर्जी या यूं कहें की दादागिरी पर कड़ा कटाक्ष किया है। नौकरशाहों की कार्यशैली पर जो सवाल उठाए, वो बात सोलह आने सच है। लेकिन उन्होंने केंद्र में ये बात रखी कि वो बड़े मंत्रालयों के बड़े पावरफुल नौकरशाहों से मिलने जाती हैं। वो बातें तो मिठ्ठी करते हैं, लेकिन जब वो उनसे कोई काम करने को कहती हैं, तो वो बहाने बनाकर टाल जाते हैं। ये भी कहा कि जब हम लोगों के काम नहीं होते, तो सोचिए आम आदमी का क्या हाल होता होगा?

एक बात तो साफ है कि वो लोग मैडम को पत्रकारिता लेखन के लिए कोई जानकारी मांगने से तो मना करते नहीं होंगे। फिर ये काम कौन से है़? अगर नितांत निजी काम भी हैं, तो साफ बता दें। इसमें बुराई भी क्या है? अगर ये काम उनके अपने खास होते हुए भी नियम कानून के दायरे में है, तो क्यों नहीं एक पत्रकार को भी तो काम के लिए कहीं जाने का अधिकार है। अगर कहीं ये बड़े पत्रकारों की मुफ्त यात्राओं का टंटा है, तो थोड़ा नागवार गुजरेगा।

छोटी मुंह बड़ी बात, हम मैडम की विश्वसनीयता या उनके मंत्रालय से जुड़े कामों पर कोई उंगली नहीं उठा रहे हैं, हां सवाल तो उठाना ही पड़ेगा। क्योंकि मैडम ने अपनी बात को ऐसे रखा, जैसे गर्भ में शिशु हो। अब इस गर्भ में क्या था इसकी डिलिवरी तो होनी ही चाहिए। एक सवाल और भी है पहले मैडम अपने लेखों में बड़े रिसर्चफुल आंकड़े लेकर आतीं थीं, लेकिन अब तो उसमें शब्दों की चासनी और उनके अपने मंत्वय ही ज्यादा होते हैं, हालांकि मंत्वयों में बड़ा तजुर्बा झलकता है। कटाक्ष उनके अच्छे हैं लेकिन पाठक उनके रिसर्चफुल काम को भी याद करता है। खैर बस फिल्हाल तो मैडम आप अपने मंत्रालय में कार्यों को लेकर पारदर्शी हो जाएं, आपकी मेहरबानी। छोटे मुंह बड़ी बात कर गया हूं, माफ कीजिएगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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