पिछले दिनों एक ऐसी घटना घटी जो ऊपर से देखने पर मात्र यौन शोषण की लगती है लेकिन असल में वह राजनीति, मीडिया और अपराध की साझी दुनिया की भयावह तस्वीर पेश करती है. यह घटना अंग्रेजी और हिन्दी में प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका तहलका के मालिक संस्थापक और मुख्य सम्पादक तरुण तेजपाल से सम्बधित है. तेजपाल ने अपनी पुत्री समान ही नहीं बल्कि अपनी पुत्री की सखी पर, जो तहलका में ही काम करती थी, गोवा के एक पांच सितारा होटल की लिफ़्ट में ही ७-८ नवम्बर को अर्ध रात्रि में दो बार यौन शोषण का प्रयास किया.
पीड़िता द्वारा तहलका की प्रबन्ध निदेशक शोमा चौधरी के पास मुख्य सम्पादक की इस हरकत की विभागीय शिकायत करने पर तेजपाल के व्यवहार का अहम देखने लायक है. वह आशीर्वाद देने की मुद्रा में एक ऊंचे आसन पर जा बैठा. घोषणा कर दी कि मुझे सचमुच अपनी इस हरकत पर दुख है और एक साधक की तरह मैं अब इसका प्रायश्चित्त भी ज़रुर करूंगा. फिर स्वयं ही अपने लिये प्रायश्चित की घोषणा भी कर दी. मैं छह मास के लिये तहलका नाम की पत्रिका के मुख्य सम्पादक के आसन पर नहीं बैठूंगा. शायद तेजपाल को लगता था कि उसके इस व्यवहार से लिफ़्ट वाली पीड़िता अभिभूत हो जायेगी और आंखों में आंसू भर कर उससे प्रार्थना करेगी कि आप स्वयं को इतना कठोर दंड न दें. मैंने क्षणिक उत्तेजना में किये आपके उस व्यवहार को क्षमा कर दिया है. तेजपाल के अहंकार और दंभ की यह पराकाष्ठा है. लेकिन असली बात यह है कि अपने इस यौन शोषण के प्रयास के तेजपाल केवल हंसी ठिठोली का नाम देता है. पीडिता को भेजे गये संदेश में भी उसने इसी प्रकार की शब्दावली का प्रयोग किया है.
ताज्जुब है जिससे किसी लड़की का जीवन बर्बाद हो सकता है, तेजपालों के क्रिया कलापों में वह केवल हंसी ठिठोली है. पंजाबी में एक कहावत है. तेजपाल सिंह पंजाबी तो समझता ही होगा और उसके वे दोस्त भी जरुर पंजाबी जानते होंगे जिनका दावा है कि उन्होंने क़ानून को घोंट कर पी लिया है. कहावत है – "चिड़ियों की मौत और गंवारों की हंसी ठिठोली, इसकी व्याख्या करने की जरुरत नहीं है." तेजपाल के इस पाखंड से पीड़िता तो अभिभूत नहीं हुई अलबत्ता शोमा चौधरी ज़रुर टसवे बहाने लगी. शोमा चौधरी का यह कर्तव्य था कि जैसे ही उन्हें एक महिला सहकर्मी पर यौन आक्रमण की शिकायत प्राप्त हुई, तो वह तुरन्त पुलिस के पास इसकी शिकायत दर्ज करवाती. लेकिन उसने तेजपाल के इस छह महीने के प्रायश्चित संन्यास को ही शील्ड की तरह लहराना शुरु कर दिया और यह प्रचार प्रसार भी करना प्रारम्भ कर दिया कि पीड़िता भी तेजपाल की माफी से पिघल गई है और संतुष्ट है. तेजपाल ने पीडिता को इमेल से एक प्रारुप भेजकर, उसे ही माफीनामा मान लेने का आग्रह किया. तेजपाल के दंभ और तथाकथित राजनैतिक ताकत पर भरोसे का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उसने अपनी इस कुकृत्य पर सार्वजनिक रुप से माफी मांगने से भी इंकार कर दिया. तहलका की प्रबन्ध निदेशक शोमा चौधरी की हिमाकत की तो इन्तहा हो गई जब उसने इस विषय पर चर्चा करने वालों को डांटा कि जब पीडिता कुछ नहीं कह रही है तो आप इस व्यक्तिगत मामले में रुचि लेने वाले कौन होते हैं? स्वर कुछ इस प्रकार था मानो तहलका संस्थान की महिला सहकर्मियों का यौन शोषण या उसका प्रयास भी इस संस्थान की घरेलू नीति का ही हिस्सा हो.
जिस समय शोमा चौधरी यह प्रचार करती हुई घूम रही थी कि पीडिता संतुष्ट और चुप है उस समय तेजपाल के घर के कुछ लोग पीड़िता के परिवार को समझाने के लिये धमकाने की शैली में उसके पारिवारिक घर में पहुंचे हुए थे. जब तक तेजपाल और उसकी विभागीय सहयोगी शोमा चौधरी को लग रहा था कि पीड़िता या तो डर जायेगी या फिर उसको समझा बुझा लिया जायेगा, तब तक तो वे इस कृत्य को हंसी ठिठोली या फिर अन्तरंगता के क्षण कहते रहे. इस समय तक तेजपाल के दूसरे सहयोगी भी उसके समर्थन में प्रकट होने लगे थे. जावेद अख़्तर का समर्थन तो देखने लायक है. वे तेजपाल के साहस के लिये उसको बधाई देते घूम रहे हैं. बकौल अख़्तर, तेजपाल में इतना साहस तो है कि उसने अपने इस कारनामे को स्वीकार किया पुरानी कथा है. गांव में एक बदमाश रहता था. किसी की भी बहू बेटी से ज़बरदस्ती करता था और बाद में चौपाल पर इसे स्वीकारता ही नहीं था अपनी बहादुरी के किस्से भी सुनाता था. खुदा का शुक्र है उन दिनों वहां जावेद अख़्तर नहीं हुए, नहीं तो उसे वीरता पुरस्कार के लिये नामांकित किये बिना न मानते. शायद वे उसी की पूर्ति अब तेजपाल सिंह के साहस की प्रशंसा करके कर रहे हैं. मानवाधिकारों के हनन को लेकर जिनकी चिन्ता कभी समाप्त ही नहीं होती, ऐसी वृन्दा ग्रोवर जावेद भाई से भी दो क़दम आगे निकल गईं हैं. उनका कहना है यदि पीड़िता चाहे तो चली जाये पुलिस के पास. यदि वह नहीं जाती तो कोई क्या कर सकता है? शायद ग्रोवर भी अच्छी तरह जानती हैं कि यही मानसिकता तेजपालों के साहस को बढ़ाती है और बाद में जावेद अख्तरों को उनके साहस की प्रशंसा करने का सुअवसर प्रदान करती है. अख़बारों में खबर छपी है कि तेजपाल शराब व्यवसाय के बादशाह रहे पोंटी चड्ढा के साथ मिल कर एक क्लब खोलना चाहता था. उसकी अब की हरकतों को देख कर लगता है कि अंतरंगता के क्षणों का अवसर प्रदान करने की प्रस्तावित व्यवस्था थी.
इस प्रकार की हंसी ठिठोली करने वाला व अंतरंगता के क्षणों को भोगने वालों की समर्थक मंडली कितनी ज़्यादा फैली हुई है और तेजपाल को बचाने के लिये कैसे कैसे तर्क दिये जा रहे हैं, इसे देख कर आश्चर्य तो होता ही है लेकिन समाज के पतन पर दुख भी. कहा जा रहा है कि तेजपाल लम्बे अरसे से भ्रष्टाचार से लड़ रहा है. साम्प्रदायिकता को तो देख कर ही नहीं, सूंघ कर ही दूर से फैकने लगता है. लम्बे अरसे से स्टिंग आपरेशन करता कराता रहा है. प्रगतिवाद का लाकेट गले से एक क्षण के लिये नहीं उतारता. विचारों से उदारवादी है. ऐसे आदमी को इस छोटी सी घटना में फंसाया जा रहा है. सब राजनीति है. तेजपाल जैसे प्रगतिवादी आदमी के साथ इस देश में यह सलूक हो रहा है. इन लोगों की दृष्टि में शायद लड़कियों का यौन शोषण भी इनकी राजनीति का हिस्सा है और लिफ़्ट में अकेली लड़की को घेर लेना ही वर्ग संघर्ष का सर्वश्रेष्ठ नमूना है. इनके तर्कों का लद्दो लुआब तो यह है कि तेजपाल जैसे मीडिया मुगलों को यौन शोषण की अनुमति दे दी जानी चाहिये. तेजपाल जैसे लोग समाज के लिये इतना कुछ कर रहे हैं, क्या समाज इनका इतना थोड़ा सा सहयोग भी नहीं कर सकता. यह तर्क नया नहीं है. पंजाब में जब उस समय के पुलिस प्रमुख कंवरपाल सिंह गिल ने एक महिला कर्मी के साथ अभद्र व्यवहार किया था तो उस समय के जाने माने वक़ील और पंजाब के राज्यपाल सिद्धार्थ शंकर राय भी यही तर्क दे रहे थे कि गिल देश को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, इसलिये इस छोटी सी घटना को भुला दिया जाना चाहिये.
लेकिन अब जब तेजपाल और उसके दोस्तों ने देखा कि पीड़िता इस घटना को छोटी सी नहीं मान रही और न ही वह तेजपाल की प्रत्यक्ष और परोक्ष ताक़त से आतंकित हो रही है तो तेजपाल ने एक बार फिर प्रगतिवादी पैंतरा बदला. अब उसने इस यौन शोषण के कुकृत्य को परस्पर सहमति का कृत्य बताना शुरु कर दिया. अब जावेद अख़्तर चुप हैं. अब वे तेजपाल के साहस को लेकर व्याख्या नहीं कर रहे. पीड़िता ने त्यागपत्र ही नहीं दे दिया बल्कि मजिस्ट्रेट के सामने दफ़ा १६४ में बयान भी दर्ज करवा दिया. दरअसल तेजपाल का किस्सा मीडिया और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर छिपे उन भेड़ियों का किस्सा बन रहा है जो महिला सहकर्मियों को अपना आसान शिकार ही नहीं समझते बल्कि बाद में उसे हंसी-ठिठोली का नाम भी देते हैं. पीड़िता ने अपना त्याग-पत्र देते हुए तहलका की प्रबंध संपादिका शोमा चौधरी को जो लिखा वह आंखें खोलने वाला है उसने कहा- ऐसे समय में जब मैं अपने को ऐसे अपराध में पीड़िता के रूप में पा रही हूं तब यह देखकर मैं बुरी तरह हिल गयी हूं कि तहलका के प्रधान संपादक और आप मुझे धमकाने, मेरा चरित्र हनन करने और मुझ पर लांछन लगाने जैसे हथकंडे अपना रहे हैं.
तेजपाल सिंह ने अपनी अग्रिम जमानत करवाने के लिये जो तर्क दिये हैं वे और भी इस प्रकार के लोगों की मानसिकता को नंगा करते हैं तेजपाल का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी उसे इस केस में इसलिये फंसा रही है क्योंकि वे पंथनिरपेक्षता से अपने आप को प्रतिबद्धित मानते हैं और भाजपा की सांप्रदायिकता से मीडिया के माध्यम से आज तक लड़ते रहे हैं. यह जानकर हैरानी होती है कि महिलाओं के यौन शोषण को भी शायद तेजपाल और उसके संगी साथी सैक्ल्यूरिज्म का ही हिस्सा मानते हैं. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह अत्यंत बेशर्मी से तेजपाल के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं. दिग्विजय यौन शोषण की इस पूरी घटना को तेजपाल और पीड़िता का आपसी अंदरूनी मामला बता रहे हैं. और अंत में एक और टिप्पणी. तेजपाल सिंह ने यह मांग की है कि उनके केस को गोवा से कहीं अन्यत्र स्थानांतरित किया जाये. देखना केवल यह है कि वे कहीं इसे इटली में स्थानांतरित करने की मांग तो नहीं करते.