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तहलका वाले तरुणजीत तेजपाल के नाम खुलापत्र : तहलका से ये उम्मीद न थी

जनाब तरुणजीत तेजपाल साहब, हम जिस तहलका को जानते हैं उसका मतलब विश्वसनीयता का पर्याय होता है। हमें याद है कि रक्षा घोटाले को उजागर करने में आपने किस तरह से स्टिंग और इंस्वेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग का शानदार नमूना पेश किया थ। मेरे पास जब भी कोई नौजवान साथी पत्रकारिता की ख्वाहिश लेकर आता है, तो मैं उसे उदाहरण देते हुए कहता हूं कि उत्कृष्ट पत्रकारिता पैसे के लिए और पैसे की जोर से नहीं हो सकती। वह जज्बा मांगती है। हमेशा निष्पक्ष रहने की। जब आपने 2008 में हिन्दी में तहलका शुरू की तो हम जैसे हिन्दी पट्टी के पत्रकारों और पाठकों को उम्मीद थी कि इसमें से अपनी मिट्टी की सुगंध निकलेगी और वह इस मानक पर खरी भी उतरी।

जनाब तरुणजीत तेजपाल साहब, हम जिस तहलका को जानते हैं उसका मतलब विश्वसनीयता का पर्याय होता है। हमें याद है कि रक्षा घोटाले को उजागर करने में आपने किस तरह से स्टिंग और इंस्वेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग का शानदार नमूना पेश किया थ। मेरे पास जब भी कोई नौजवान साथी पत्रकारिता की ख्वाहिश लेकर आता है, तो मैं उसे उदाहरण देते हुए कहता हूं कि उत्कृष्ट पत्रकारिता पैसे के लिए और पैसे की जोर से नहीं हो सकती। वह जज्बा मांगती है। हमेशा निष्पक्ष रहने की। जब आपने 2008 में हिन्दी में तहलका शुरू की तो हम जैसे हिन्दी पट्टी के पत्रकारों और पाठकों को उम्मीद थी कि इसमें से अपनी मिट्टी की सुगंध निकलेगी और वह इस मानक पर खरी भी उतरी।

आपके हिन्दी संपादक संजय दुबे ने बड़े शानदार तरीके से आपके मिशन को आगे बढ़ाया। सच में उन्होंने एक शानदार टीम कायम की, जो काबिले तारीफ काम कर रही है। अपनी निजी पक्षधरता को परे धकेलकर पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों का पालन कर। लेकिन जब आपकी पत्रिका में पत्रिका को पक्ष बनकर खड़े देखा तो मन बेहद आहत हो गया, क्योंकि आज भी हमें उम्मीद आपसे और आपकी पत्रिका से ही है। हमें उम्मीद है कि इसे आप किसी राग-द्वेष से ऊपर उठकर तो देखेंगे ही और साथ में यह भी उम्मीद है कि सिर्फ एक खराब रिपोर्ट के लिए किसी को निकालने जैसी गंभीर सजा नहीं देंगे, बल्कि उसे पत्रकारिता का मानदंड बताते हुए अपने जैसा पत्रकार बनाने की ट्रेनिंग देंगे।

तहलका के 31 अक्टूबर के अंक में ‘सिर्फ यहीं’ कॉलम में एक ‘अनकहा पक्ष’ आया है। जी हां, इस अनकहे पक्ष में तहलका ने हालिया एक साहित्यिक विवाद की रिपोर्टिंग की है और आरोपी प्रमोद का पक्ष उठाया है, लेकिन शायद रिपोर्टर महोदय यह रिपोर्टिंग करते वक्त यह भूल गए कि पत्रिका सच के साथ खड़ा होने के लिए है, न कि पक्ष बनने के लिए। वह पत्रकारिता का यह मूलभूत सिद्धांत भी भूल गए कि जो भी कह दिया जाए, वह हर बात न सच होती है और न खबर। साथ ही जो भी तथ्य सामने आ रहे हैं उसकी पड़ताल बेहद जरूरी होती है, खासकर जब मामला संवेदनशील हो और पक्ष आरोपी का रख रहे हों। आरोपी और पीड़ित में अंतर करना बेहद जरूरी होता है। इस बात का तो खास ध्यान रखा जाना चाहिए कि पत्रिका किसी खबर को उठाते वक्त पार्टी न बन जाए या फिर वह किसी की वकालत करती न नजर आए। इससे पत्रिका की विश्वसनीयता प्रभावित होती है यह तो आप भी जानते ही हैं। व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठकर वह सिर्फ खबर परोसे और वह खबर जो विश्वसनीय हो। किसी का बयान और साक्षात्कार छापते वक्त तो उसे बेहद सजग और संजीदा रहने की जरूरत होती है, ताकि किसी की मर्यादा का हनन न हो। इसलिए भी क्योंकि यहां पर झूठ और सच के बीच की बेहद बारीक फर्क में से रिपोर्टर को अपने कौशल से सच निकालना होता है और किसी का पक्ष भी नहीं बनना होता है।

जरा सी असावधानी का नतीजा यह होता है कि पत्रिका किसी की पक्षकार लग सकती है। इस रिपोर्ट के साथ भी जाने – अनजाने वही हुआ है, जिसकी मैं यहां बात कर रहा हूं। पत्रिका की पूरी रिपोर्ट निष्पक्ष और निष्कलुषित न लगकर एक पक्ष का पैरोकारी करती लगती है और पत्रिका खुद पार्टी बनी लगती है। ‘अनकहा पक्ष’ के रिपोर्टर ने अपनी तरफ से एक तरह से आरोपी प्रमोद को तमाम आरोपों से बरी ही कर दिया है, जबकि जरा सी पड़ताल कर ली जाती तो इस रिपोर्ट में आए कई गलत तथ्यों का पता रिपोर्टर को खुद चल जाता। जैसे ही मैंने यह रिपोर्ट पढ़ी, यह मुझे चौंका गई, क्योंकि इसमें एक-दो नहीं दर्जनों बातें ऐसी थीं, जो पच नहीं रही थीं। मैंने जरा सी पड़ताल की तो कई ऐसे सच मेरे सामने आए, जिससे लगा कि यह रिपोर्ट किसी दबाव या… में लिखी गई है। इस कोशिश में इस रिपोर्ट में पत्रिका की स्थिति हास्यास्पद नजर आती है और लगता है कि पत्रिका खुद एक पक्ष बन गई है।

एक साहित्यिक विवाद पर लिखी इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि राजेंद्र यादव अपनी पत्रिका ‘हंस’ के संपादकीय में विवाद के बाद से अपना पक्ष लिखते रहे हैं, जिसमें वह कभी युवा लेखिका पर आरोप लगा रहे हैं और कभी लिखे गए तथ्यों के लिए खेद जता रहे हैं। रिपोर्टर ने यह लिख तो दिया, लेकिन यह नहीं जानने की कोशिश की कि क्या वे तथ्य जिनकी वे बात कर रहे हैं वह इस केस से जुड़े हैं या वे किसी और मामले को इस मामले में मिक्स करने की कोशिश कर रहे हैं? मैंने भी इस विवाद के बाद आई राजेंद्र यावद की संपादकत्व में निकलने वाली पत्रिका ‘हंस’ की सारी प्रतियां पढ़ी हैं, लेकिन उन्होंने इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक किसी भी अंक में इस के बारे में अभी तक नहीं लिखा है, तो क्या मैं यह मानूं कि इस रिपोर्ट के रिपोर्टर को यह सपना आया था?

इसके आगे रिपोर्टर ने अपनी टिप्पणी में लिखा है, ध्यान दीजिए प्रमोद के साक्षात्कार में तो यह लिखा ही है, अपनी जजमेंटल टिप्पणी में भी लिखा है कि प्रमोद को अभी तक कोई वकील नहीं मिला है, जबकि सच यह है कि उच्चतम न्यायालय का वकील उस प्रमोद का केस लड़ने के लिए लोआर ओर सेशन कोर्ट में आ रहा है। अमूमन ऐसा किसी हाई प्रोफाइल केस में ही देखने को मिलता है, जब सुप्रीम कोर्ट का वकील लोअर या सेशन कोर्ट में किसी मुकदमे की पैरवी के लिए आए। किसी अदने से आदमी के लिए उच्चतम न्यायालय का वकील सेशन और लोअर कोर्ट में किसी मुकदमे की पैरवी के लिए नहीं आता। प्रमोद के बयान में रिपोर्टर महोदय यह भी लिखते हैं कि प्रमोद से एक जज मैडम ने पूछा कि तुझे अपनी जमानत नहीं करानी क्या? तब पुलिसवाले ने कहा कि लगाई थी, लेकिन नहीं मिली। इसके बाद भी रिपोर्टर के कान चौकन्ने नहीं हुए कि आखिर जमानत की अर्जी लगाई किसने, खुद प्रमोद ने या वकील ने! उन्होंने प्रमोद से यह पूछने की जहमत नहीं उठाई (या लिखा) आखिर ऐसा क्यों? क्या वह मान कर गए थे कि आरोपी हर हाल में सच ही बोलेगा? आरोपी पर रिपोर्टर को इतना भरोसा क्यों हुआ। कि उन्होंने सत्यता की पड़ताल तक करने की कोशिश नहीं की, यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। इसके अलावा आरोपी प्रमोद ने रिपोर्टर को बताया कि उससे जेल में मिलने 15-20 दिन तक कोई आया ही नहीं, जबकि सच यह है कि सुप्रीम कोर्ट के वकील ने आठवें दिन ही उसकी जमानत याचिका सेशन कोर्ट में लगाई थी।

दूसरी बात यह कि रिपोर्टर ने अपनी पड़ताल में यह भी लिखा है कि फिलहाल जो बातें कहानी के हर पक्ष में समान है, वह यह कि इस दिन जिस वक्त घटना घटी उस वक्त राजेंद्र यादव के घर पर दो-तीन मेहमान भी मौजूद थे, जबकि यह बात हर पक्ष में समान नहीं है। जबकि एफआईआर रिपोर्ट को सच मानें तो जब घटना घटी उस वक्त तक कोई कोई मेहमान नहीं आया था। शायद उन्होंने एफआईआर की कॉपी भी ठीक से देखने की जहमत नहीं उठाई, बस यह मान लिया कि आरोपी जो कुछ बोल रहा है, उसके अलावा और कुछ सच हो ही नहीं सकता है। आखिर उनके इतने पुख्ता यकीन का कारण क्या था, क्या वह यह बताने का कष्ट करेंगे। फिर इसके बाद वह यह भी लिखते हैं कि दोनों (आरोपी और पीड़िता) रात के एक बजे अपने-अपने घर गए। लेकिन सच यह है कि पीड़िता जब घर लौटीं, उसके बाद भी प्रमोद वहीं थाने पर था। इस बात की पुष्टि इसी पत्रिका में छपे प्रमोद के साक्षात्कार से भी होती है। जरा गौर फरमाइएगा- ‘लेखिका वहां से चली गईं। मुझे कोई लेने भी नहीं आया। तब पुलिसवालों ने कहा कि हमारे पास तुझे रखने की जगह भी नहीं है, तू किसी को बोल कि आकर तुझे ले जाएं। तब मैंने किशन भैया को फोन किया। उन्होंने कहा कि मैडम (राजेंद्र यादव की बेटी) किसी को भेज रही हैं। मैंने अपने एजेंसी वाले भैया को भी फोन किया। उन्होंने कहा कि मैं आ रहा हूं। लेकिन थोड़ी देर में किशन भैया का फोन आ गया कि मैं ही आ रहा हूं तुझे लेने। किशन भैया पांच हजार रुपये थाने में जमा किये और मुझे वापस घर ले गए।

जरा गौर फरमाइएगा रिपोर्टर ने बड़ी सफाई से यह बात छिपा ली कि प्रमोद कौन से घर गया। उन्होंने लिखा, दोनों अपने-अपने घर गए। प्रमोद का अपना घर कौन-सा था, यहां यह स्पष्ट नहीं है। मैं जरा स्पष्ट करता चलूं, वह अपना घर राजेंद्र यादव का था, जहां से वह 4 सितम्बर को गिरफ्तार हुआ। यानी कि उसे कोई बचाने की कोशिश नहीं कर रहा था, लेकिन इतने घिनौने आरोप के बावजूद राजेंद्र यादव ने अपने यहां पनाह दी। एक जुलाई से 4 सितम्बर तक, जब तक कि वह गिरफ्तार होकर जेल नहीं चला गया। मैडम ने प्रमोद को थाने से लिवा लाने को किशन को भेजा। किशन प्रमोद का जमानतदार बना। प्रमोद की मानें तो किशन ने पुलिसवाले को पांच हजार रुपये भी घूस में दिये। अगर प्रमोद की ही मानें तब तो यह भी जाहिर होता है कि मैडम ने किशन को थाने भेजा और किशन ने पांच हजार रुपये घूस दिये… तो आप समझ सकते हैं कि माजरा क्या है। लेकिन उसके बावजूद रिपोर्टर अपनी जजमेंटल टिप्पणी में (प्रमोद के कहे से अलग) कहते हैं ‘राजेंद्र यादव अपने इस सेवक को बचाने के लिए कुछ नहीं करते। अदालत में अपने बचाव के लिए प्रमोद को कोई वकील तक नहीं मिला है।’

इतना ही नहीं वह सीधे लिख देते हैं कि पुलिसवाले ने पांच हजार रुपये लिये, ऐसा लगता है कि इस बारे में उन्हें पुलिस का पक्ष जानना भी जरूरी नहीं लगा। आखिर उन्हें प्रमोद को निर्दोष बताने की इतनी जल्दी क्या है। यह सवाल उनसे पूछा जाना चाहिए। इसके अलावा इस केस में प्रमोद को बचाने के लिए रखूस और दबदबे का किस कदर इस्तेमाल किया गया है, इसका पता प्रमोद की इस बात से भी चलता है कि पुलिसवाले कहते हैं कि हमारे पास (थाने में) तुझे रखने की जगह भी नहीं है, तू किसी को बोल कि तुझे आकर ले जाएं। अगर प्रमोद की इस बात को सच मानें तो क्या रिपोर्टर ने इस बात की पड़ताल की कि आजतक उस थाने में क्या कभी किसी को रखा गया है या नहीं। क्या ऐसा भी संभव है कि थाने में किसी आरोपी को जिसे पुलिस ने पकड़ा हो उसे रखा ही न हो? जाहिर है नहीं, तब प्रमोद की बात से इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि पुलिस पर उसे थाने में न रोकने के लिए किसी न किसी ने बेहद दबाव बनाया होगा और वे दबाव किसने बनवाया होगा, इतनी मामूली सी बात भी रिपोर्टर की समझ में नहीं आई।

रसूख और दबदबे का एक और उदाहरण देखिए, बकौल प्रमोद, सितम्बर में पुलिसवाले आए और प्रमोद के बाऊजी उर्फ राजेंद्र यादव से बोले की तीन सितम्बर को प्रमोद को कोर्ट लेकर जाना है। तीन तारीख को मंगलवार था और बाऊजी को कहीं बाहर जाना था, तो बाऊजी ने पुलिस से कहा कि तुम उसे या तो सोमवार को कोर्ट ले जाओ या फिर बुधवार को ले जाना। और कमाल देखिए, कितना वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है प्रमोद को। पुलिसवाले मान जाते हैं और नहीं ले जाते तीन सितम्बर को प्रमोद को, वह उसे चार सितम्बर, बुधवार को आकर ले जाते हैं। इतना ही नहीं, प्रमोद के अनुसार, ले जाने से पहले पुलिस राजेंद्र यादव को गारंटी भी देती है कि उसे दिन में कोर्ट में पेश करेंगे और शाम तक घर छोड़कर जाएंगे। ध्यान दीजिए छोड़कर जाएंगे। वह तो न्यायालय थी, जिसने उसे नहीं छोड़ा। लेकिन तब भी पुलिसवालों ने अपना खेल, खेल ही दिया। मामूली से मामूली मामले में भी लंबी रिमांड मांगने वाली पुलिस ने इस मामले में प्रमोद से पूछताछ के लिए एक दिन का भी रिमांड नहीं मांगा। आखिर क्यों? यह इतनी अबूझ पहेली भी नहीं। लेकिन इसके बावजूद रिपोर्टर का यह मानना है कि प्रमोद को बचाने के लिए राजेंद्र यादव ने कुछ नहीं किया।

अगर तहलका में प्रमोद के आए साक्षात्कार की ही बात करें, तब भी प्रमोद ने अपने ऊपर लगे लगभग हर आरोप को स्वीकार लिया है। लेकिन उसके बावजूद इस रिपोर्ट को पढ़कर लगता है कि रिपोर्टर ने उसे निर्दोश मान लिया है। गौर करें इस साक्षात्कार में प्रमोद ने क्या कहा-

‘मुझे किशन भैया ने बताया कि किसी ने इस लेखिका की वीडियो बनाई है।’

‘30 जून  के आसपास की बात है। मैंने कोई धमकी देने के लिए फोन नहीं किया था। मैंने उसे बस यह समझाने के लिए फोन किया था कि ऐसा न किया करे। मैंने उससे फोन पर भी यही कहा था, देखो तुम भी मेरे इधर की ही रहने वाली हो इसलिए मैं तुम्हें समझा रहा हूं। वो मुझ पर गुस्सा होने लगी। तब मैंने उसे बताया था कि मैं ऐसे ही नहीं कह रहा, बल्कि तुम्हारा वीडियो बन चुका है।’

इस बात से इतना तो कोई मूर्ख भी समझ सकता है कि किशन और प्रमोद दोनों ने मिलकर यह पूरा खेल रचा था और किशन के कहने पर ही फोन कर उसे धमकाया भी होगा, लेकिन क्या कोई आरोपी अपना आरोप स्वीकार करता है? कोर्ट से सजा पाया अपराधी भी अंत तक यही कहता है कि उसने कोई अपराध नहीं किया, उसे फंसाया गया है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। तब प्रमोद क्यों स्वीकारने लगा भला। इसके अलावा वह थप्पड़ मारने की बात भी स्वीकार रहा है। हां, खुद को बचाने के लिए इसमें लेखिका के थप्पड़ मारने की थ्योरी भी जड़ दी होगी उसने। इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन उसने ये साफ-साफ कहा कि उसने लेखिका को थप्पड़ मारा। अगर लेखिका ने उसे थप्पड़ मारा होता तो पुलिस प्रमोद का मेडिकल जरूर करवाती। इतना सामान्य ज्ञान तो होना ही चाहिए। इसी बात से प्रमोद के झूठ का पता चलता है। इसके अलावा वह लेखिका के एक नये नंबर पर फोन करने की बात भी वह स्वीकार रहा है।

कमाल की बात यह है कि इस पूरे आलेख को प्रमोद बनाम लेखिका से हटाकर राजेंद्र यादव बनाम लेखिका बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि मुख्य मुद्दे पर से ध्यान हटाया जा सके, जबकि न राजेंद्र यादव ने और न ही लेखिका ने कभी यह बात कही है। बात इतनी सी है कि लेखिका का आक्रोश अपने पितातुल्य राजेंद्र यादव से बस इतना ही है कि क्यों स्त्री विमर्श के पुरोधा ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। उसकी पूरी लड़ाई वैचारिक दिखती है, जिसे आरोप-प्रत्यारोप में बदलने की कोशिश की जा रही है। हमें न सिर्फ इस रिपोर्टर से बल्कि ऐसे बाकी लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है।

वैसे तो इस रिपोर्ट में कई और गंभीर त्रुटियां हैं, लेकिन मैं सिर्फ मोटी-मोटी त्रुटियों की तरफ ही ध्यान दिला रहा हूं। उम्मीद है तरुण जी आप इस तरफ ध्यान देंगे। एक और कमाल देखिए इस ‘अनकहा पक्ष’ के लेखक निष्कर्ष देते हैं। दोनों पक्षों (यानी राजेंद्र यादव बनाम लेखिका, जो है ही नहीं) से इतर सच यही है। वह तो प्रमोद के लिए जेल मैन्युअल ब्रेक करने की भी बात करते हैं। वह वहां प्रमोद को नेट कनेक्शन दिये जाने की वकालत करते नजर आते हैं। लेकिन अंत में यह सवाल अब भी मौजू है कि रिपोर्टर आखिर इस रिपोर्ट को लिखने में एक पक्ष क्यों बन गया। आखिर वह ऐसा करना क्यों चाहता है। आखिर क्यों?

आपका

देवेन्द्र गौतम


देवेंद्र गौतम के ब्लाग 'खबरगंगा' से साभार.

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