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तहलका हिन्दी के साथी अतुल चौरसिया को रामनाथ गोयनका पुरस्कार

Himanshu Bajpai : तहलका हिन्दी के हमारे साथी Atul Chaurasia को आज दिल्ली में रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा. ये पुरस्कार उन्हे 2010 में की गई उनकी स्टोरी 'महान लोकतंत्र की सौतेली संतानें' पर दिया गया है. इस स्टोरी में अतुल जी ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में सरकारी अराजकता और आत्महंता विकास के बीच सिसकती मानवीय त्रासदी को उजागर किया था. बांधों,फैक्ट्रियों,बिजली, और खनन के रूप में पैदा हुआ विकास का भस्मासुर किस तरह इंसान और प्रकृति को निगलने लगता है, स्टोरी इसको गहरी संवेदना के साथ बताती है.

Himanshu Bajpai : तहलका हिन्दी के हमारे साथी Atul Chaurasia को आज दिल्ली में रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा. ये पुरस्कार उन्हे 2010 में की गई उनकी स्टोरी 'महान लोकतंत्र की सौतेली संतानें' पर दिया गया है. इस स्टोरी में अतुल जी ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में सरकारी अराजकता और आत्महंता विकास के बीच सिसकती मानवीय त्रासदी को उजागर किया था. बांधों,फैक्ट्रियों,बिजली, और खनन के रूप में पैदा हुआ विकास का भस्मासुर किस तरह इंसान और प्रकृति को निगलने लगता है, स्टोरी इसको गहरी संवेदना के साथ बताती है.

आज के समय में जब विकास को किसी भी सामाजिक-राजनैतिक बहस का 'हर्फे आखिर' बनाकर पेश किया जा रहा है तब अतुल की ये स्टोरी सबको पढ़नी चाहिए. हालांकि मुझे ये फिलहाल इंटरनेट पर नहीं दिखी लेकिन चाहूंगा कि अतुल जी इसे दोबारा यहां साझा करें. यही वो स्टोरी थी जिसने मुझे भी सोनभद्र के सुदूर इलाकों में जाकर रिपोर्टिंग करने के लिए धकेला. 2011 में मैने भी एक स्टोरी 'सोनकब्र' तहलका के लिए की. लेकिन पढ़ने लायक स्टोरी वो थी जिसका सम्मान आज तीन साल बाद होना है.

मुझे याद आता है कि 2010 में तहलका के उत्तर प्रदेश संस्करण को लांच करने की तैयारी चल रही थी. हम सभी लोग कुछ तगड़ी स्टोरी तलाशने में जुटे थे. इस सिलसिले में दिन भर चर्चाएं होती थीं. अतुल जी को सोनभद्र जाना है ऐसा हमने सुना था. ईशू लांच होने का इंतज़ार हम सब कर रहे थे. उसी वक्त हमारे फोटोग्राफर मरहूम मयंक ने मुझसे कहा था- 'अगर अतुल जी सोनभद्र गए और दो-तीन दिन वहां कायदे से दौड़-धूप कर ली तो एक मजबूत पढ़ने वाली स्टोरी लाएंगें. दिल्ली के पत्रकार सोनभद्र जाते ही कहां हैं. वो जगह खबरों की खान है.'

लेकिन दु्र्भाग्य से स्टोरी के पूरा होने और ईशू के बाज़ार में आने से पहले ही मयंक की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई. विडम्बना देखिए कि जिस अंक का मयंक को बेसब्री से इंतज़ार था उसी अंक में मुझे उनका श्रद्धांजलि संस्मरण लिखना पड़ा. अपने निधन से पहले मयंक ने जेपी की यूपी में फर्जी एनकाउंटर वाली स्टोरी के लिए एक मार्मिक तस्वीर खींची थी जिसमें पुलिस हिरासत में प्रताड़ना से जान गंवाने वाले एक किशोर को पुलिस टेम्पो में भरकर कहीं ले जा रही थी.

ये तस्वीर अपने आप में इतना कुछ बोलती थी कि सब पर तरजीह देकर इसे तहलका उप्र संस्करण के पहले अंक के कवर पर रखा गया. लेकिन मयंक इसे देखने के लिए हमारे साथ नहीं थे. एक तरह से तहलका का वो कवर मयंक को श्रद्धांजलि भी थी. कवर स्टोरी एनकाउंटर पर रही और सेकेण्ड लीड रही अतुल जी की सोनभद्र वाली स्टोरी. वही स्टोरी जिसे पढ़ने के लिए मयंक लालायित थे. आज जब इस स्टोरी को सम्मान मिलने की बात हुई तो पिछली बहुत सारी बातें याद आ गईं. हम सब बहुत खुश हैं. लेकिन मन में अचानक एक कसक भी उठी कि मयंक इस स्टोरी को पढ़ना चाहते थे लेकिन नहीं पढ़ पाए…

हिमांशु बाजपेयी के फेसबुक वॉल से.

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