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दिल्ली

तीसरा मोर्चा ‘एक्सपायर्ड इलेक्शन चॉकलेट’ जैसा, जिसका कोई उपयोग नहीं

कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में दोनों गठबंधन एक-दूसरे को मात देने की होड़ में तेजी से जुट गए हैं। ऐसे दौर में वामदलों ने दोनों गठबंधनों की बढ़त रोकने के लिए ‘तीसरे मोर्चे’ की मुहिम तेज कराने के लिए कवायद शुरू कर दी है। सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को इस अभियान का अगुवा बना दिया है। कोशिश की जा रही है कि एक महीने के भीतर ही तीसरे राजनीतिक विकल्प की सुगबुगाहट तेज करा दी जाए।

कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व में दोनों गठबंधन एक-दूसरे को मात देने की होड़ में तेजी से जुट गए हैं। ऐसे दौर में वामदलों ने दोनों गठबंधनों की बढ़त रोकने के लिए ‘तीसरे मोर्चे’ की मुहिम तेज कराने के लिए कवायद शुरू कर दी है। सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं ने सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को इस अभियान का अगुवा बना दिया है। कोशिश की जा रही है कि एक महीने के भीतर ही तीसरे राजनीतिक विकल्प की सुगबुगाहट तेज करा दी जाए।

मुलायम सिंह ने अब खुलकर तीसरे मोर्चे की पैरवी शुरू कर दी है। उन्होंने दावा किया है कि लोकसभा चुनाव के बाद तमाम सेक्यूलर दल एक साथ जुट जाएंगे। इसके लिए वे कई दलों से संपर्क साधने में जुट भी गए हैं। आगामी 30 अक्टूबर को दिल्ली में सीपीएम की पहल पर एक साझा सम्मेलन भी आयोजित किया जा रहा है। इसमें मुलायम सिंह सहित कई सेक्यूलर दिग्गज भागीदारी करने वाले हैं।

सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने कहा है कि इस दौर में तीसरे राजनीतिक विकल्प की सख्त जरूरत है। क्योंकि, कांग्रेस के नेतृत्व वाला सत्तारूढ़ यूपीए एकदम नकारा साबित हुआ है। राजनीतिक रूप से भी इसकी विश्वसनीयता एकदम खत्म हो गई है। क्योंकि, सेक्यूलर मोर्चे पर भी यह गठबंधन खरा नहीं उतरा है। कांग्रेस की भ्रष्ट और अवसरवादी राजनीति ने सांप्रदायिक ताकतों को नई ऊर्जा दे दी है। इसके चलते नरेंद्र मोदी जैसे नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के सपने देखने लगे हैं। जबकि, मोदी के दामन पर गुजरात दंगों के तमाम खूनी दाग लगे हैं। ऐसे में, देश के सामने एकबार फिर सांप्रदायिक ताकतों के खतरनाक उभार का संकट खड़ा हो गया है। इसका मुकाबला कांग्रेस का अवसरवादी नेतृत्व कतई नहीं कर सकता। ऐसे में, जरूरी हो गया है कि गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस के राजनीतिक सिद्धांत पर सभी सेक्यूलर ताकतों को एकजुट करके एक नया मजबूत राजनीतिक विकल्प खड़ा किया जाए।

अनौपचारिक बातचीत में येचुरी कहते हैं कि सपा जैसे कई सेक्यूलर दलों ने उन लोगों की पहल के प्रति काफी उत्साह दिखाया है। विभिन्न राज्यों के सेक्यूलर दलों को एकसाथ लाने की मुहिम चल रही है। इसी के तहत 30 अक्टूबर को शुरुआती पहल के रूप में एक सम्मेलन बुलाया गया है। सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया है कि इस सम्मेलन के लिए शरद यादव के नेतृत्व वाले जदयू को भी न्यौता दिया जा रहा है। उनसे पहले दौर की बातचीत भी हो चुकी है। मुलायम सिंह ने कल एक संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि तीसरे मोर्चे के लिए अभी अंदरूनी तौर पर ही आपस में समझदारी बनाने की कोशिश की जा रही है। व्यवहारिक कारणों से चुनाव के पहले तीसरे मोर्चे का गठन संभव नहीं है। क्योंकि, ऐसी कोशिश की गई, तो टिकट बंटवारे से लेकर नेतृत्व के सवाल पर कई विवाद खड़े हो जाने का खतरा है। इसे देखते हुए रणनीति यही बनाई गई है कि चुनाव के पहले आपसी समझदारी बन जाए, ताकि सभी क्षत्रपों को अपना संकल्प अच्छी तरह से याद रहे।

सपा प्रमुख ने यही कहा है कि रणनीति के तौर पर यही समझदारी बन रही है कि सभी सेक्यूलर दल राज्यों में अपनी-अपनी ताकत पर जीतकर आएंगे। चुनाव परिणाम के बाद कुछ घंटों के अंदर ही तीसरे मोर्चे का औपचारिक गठन हो जाएगा। उन्होंने तो उम्मीद जाहिर की है कि मौजूदा राजनीतिक स्थितियों में यूपीए और एनडीए की बजाए तीसरा मोर्चा ही सरकार बनाने की स्थिति में होगा। जब उनसे पूछा गया कि तीसरे मोर्चे में प्रधानमंत्री पद का कौन चेहरा होगा? इस पर उन्होंने यही कहा कि आप लोग शुरुआत से ही ऐसे सवाल पूछ रहे हैं, जिससे कि सेक्यूलर ताकतों में एकजुटता के बजाए टकराव बढ़े। लेकिन, ऐसा होने नहीं जा रहा। जहां तक प्रधानमंत्री पद की दावेदारी है, तो यह सब चुनावी आंकड़ों के सामने आने पर महज कुछ घंटों में ही तय हो जाएगा। क्योंकि, हमारे लिए सबसे जरूरी है कि भ्रष्ट और सांप्रदायिक ताकतें सत्ता से दूर रहें।

मुलायम सिंह की पहल और उनके तमाम दावों के प्रति जदयू प्रमुख शरद यादव ने सहमति के स्वर निकाले हैं। उन्होंने कहा है कि इस समय देश को सांप्रदायिक   उन्माद में झोंकने की साजिश की जा रही है। इसका एक प्रयोग पिछले दिनों मुजफ्फरनगर में किया भी गया है। सांप्रदायिक ताकतें चुनावी फायदे के लिए ऐसी तमाम साजिशें रच सकते हैं। ऐसे में, राजनीति में एक साफ-सुथरा विकल्प निकलने की जरूरत है। उनका मानना है कि चुनाव के बाद तीसरे मोर्चे का गठन पूरी तरह से संभव है। जिस तरह का माहौल बन रहा है, ऐसे में तीसरे मोर्चे के लिए अच्छी संभावनाएं बनती दिख रही हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनका दल इस मोर्चे की पहल का हिस्सेदार बनना चाहेगा? इस पर उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने सांप्रदायिकता के मुद्दे पर ही एनडीए का साथ छोड़ा है। जाहिर है, ऐसे में जदयू का सपना यही है कि 2014 में केंद्र में सेक्यूलर और ईमानदार सरकार बने।

जदयू की रणनीति को लेकर राजनीतिक हल्कों में इस बीच कई तरह की चर्चाएं शुरू हुई हैं। क्योंकि, कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस उम्मीद में हैं कि इस बार जदयू, यूपीए का हिस्सेदार बन सकता है। पिछले कई महीनों से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रति कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का रुख काफी नरम है। जदयू के वरिष्ठ नेता नीतीश कुमार भी इस दौर में मनमोहन सरकार के प्रति ज्यादा आक्रामक रवैया नहीं अपना रहे। वे अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी की राजनीति के खिलाफ लगाने में जुटे हैं। उनका रुख कांग्रेस नेतृत्व के प्रति भी इधर काफी नरम हुआ है। इस ‘दोस्ती’ के चलते बिहार सरकार को केंद्र सरकार ने एक बड़ा ‘इनाम’ भी दे दिया है। उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने बिहार को विशेष आर्थिक पैकेज के रूप में 12 हजार करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता दे दी है।

कांग्रेस के रणनीतिकार भाजपा के खिलाफ आक्रामक रणनीति तैयार करने में लगे हैं। इस मोर्चे पर जदयू का नेतृत्व कांग्रेस की सहायक भूमिका में दिखाई पड़ने लगा है। इसी से राजनीतिक हल्कों में इस आशय के कयास बढ़े हैं कि जदयू और कांग्रेस के बीच चुनाव के पहले ही कोई रणनीतिक समझदारी बन सकती है। वैसे भी बिहार में यूपीए के सहयोगी दल राजद की राजनीति को ‘ग्रहण’ लग गया है। क्योंकि, चारा घोटाला के मामले में इस पार्टी के प्रमुख लालू प्रसाद यादव को पांच साल की सजा सुना दी गई है। वे रांची की जेल में बंद हैं।

नए कानून के हिसाब से वे अगले छह सालों तक चुनाव लड़ने के लिए भी अयोग्य हो गए हैं। ऐसे में, सवाल यह है कि लालू के बिना राजद की राजनीति का क्या हश्र होगा? वैसे भी, कई कारणों से लालू की राजनीति अब अपने गृह राज्य बिहार में भी पहले जैसी चमकदार नहीं रही। जबकि, नीतीश कुमार की छवि उनके मुकाबले काफी साफ-सुथरी है। चर्चा तो यहां तक है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की पहल पर नीतीश से तालमेल बनाने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। यह अलग बात है कि कई राजनीतिक कारणों से इस पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव को कांग्रेस का संग ठीक नहीं लगता। लेकिन, जदयू की जमीनी सच्चाई जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि इस पार्टी के औपचारिक प्रमुख भले शरद यादव हों, लेकिन यहां फैसले वही लागू होते हैं, जिन्हें नीतीश चाहते हैं।

पिछले दिनों सीपीएम के महासचिव प्रकाश करात और मुलायम सिंह की दो-तीन मुलाकातें हो चुकी हैं। इन मुलाकातों को तीसरे मोर्चे के गठन की मुहिम के रूप में देखा जा रहा है। करात ने कहा भी है कि मुलायम सिंह तीसरे मोर्चे की अगुवाई कर सकते हैं। उन्हें व्यक्तिगत तौर पर मुलायम सिंह में देश का नेतृत्व करने के सभी गुण दिखाई पड़ते हैं। सपा प्रमुख ने अपनी पार्टी के सिपहसालारों से खुलकर कह दिया है कि यदि लोकसभा चुनाव में पार्टी ने यूपी में 80 में से 40 सीटें भी जीत लीं, तो उनकी दावेदारी नेतृत्व के लिए मजबूत हो जाएगी। ऐसे में, पार्टी के सभी लोग इस लक्ष्य को पाने के लिए युद्ध स्तर पर जुट जाएं। सीपीएम ने इस बीच बीजू जनता दल के प्रमुख एवं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से भी संपर्क साधा है। दावा किया जा रहा है कि नवीन पटनायक तीसरे मोर्चे के गठन के हिमायती हैं। लेकिन, वे अपने पत्ते लोकसभा चुनाव के बाद ही खोलना चाहते हैं।

तीसरे मोर्चे की मुहिम में वामदलों की अगुवाई से तृणमूल कांग्रेस को लेकर मामला कुछ उलझ जरूर रहा है। जब इस मुद्दे पर सपा के एक वरिष्ठ नेता से बात की गई, तो यही जवाब मिला कि चुनाव के बाद सारी तस्वीर साफ हो जाएगी। जब कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखने के लिए वामदल और भाजपा पहले भी वीपी सिंह की सरकार को एक साथ समर्थन देने का प्रयोग कर चुके हैं। ऐसे में, तृणमूल कांग्रेस की ‘फांस’ का माकूल जवाब भी उचित समय पर मिल जाएगा। क्योंकि, ममता बनर्जी कभी नहीं चाहेंगी कि वामदलों और उनके मतभेदों का लाभ मोदी जैसे दंगाई छवि वाले नेता उठा लें। वामदलों और मुलायम सिंह की ताजा पहल पर भाजपा नेतृत्व ने तीखे कटाक्ष शुरू किए हैं। पार्टी के एक प्रवक्ता ने कहा है कि तीसरा मोर्चा, ‘एक्सपायर्ड इलेक्शन चॉकलेट’ जैसा है, जिसका कोई उपयोग नहीं है। एनसीपी के नेता एवं केंद्रीय राज्यमंत्री तारिक अनवर का मानना है कि तीसरे मोर्चे की विश्वसनीयता नहीं रही है। क्योंकि, इसको लेकर पिछले अनुभव अच्छे नहीं रहे। पहला सवाल तो इसमें नेतृत्व को लेकर उठेगा। ऐसे तमाम सवाल तीसरे मोर्चे की उपयोगिता पर ‘ग्रहण’ लगा देंगे। इसीलिए एनसीपी इस राजनीतिक पहल को व्यवहारिक नहीं मान रही।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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