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तुम्हारे इस अमल से इस्लाम की तौहीन होती है

पिछले दो चार सालों से मीडिया में बार ये खबर  आ रही हैं कि पाकिस्तान  में अल्पसंख्यकों के साथ  दौगला व्यवहार किया जा रहा है. अमर उजाला में 15.4.2013 को प्रकाशित फोकस पृष्ठ पर सुभाष कश्यप, विवेक गोयल, और कमल खत्री जैसे बुद्धीजीवी लोगों ने इस मुद्दे पर महत्वपूरण लेख लिखे हैं. उन्होंने पाकिस्तान से आये लोगों की पीड़ा को महसूस किया, और अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुऐ अपनी कलम चलायी है. विवेक गोयल ने कई लोगों की दास्तानें सुनाईं हैं.

पिछले दो चार सालों से मीडिया में बार ये खबर  आ रही हैं कि पाकिस्तान  में अल्पसंख्यकों के साथ  दौगला व्यवहार किया जा रहा है. अमर उजाला में 15.4.2013 को प्रकाशित फोकस पृष्ठ पर सुभाष कश्यप, विवेक गोयल, और कमल खत्री जैसे बुद्धीजीवी लोगों ने इस मुद्दे पर महत्वपूरण लेख लिखे हैं. उन्होंने पाकिस्तान से आये लोगों की पीड़ा को महसूस किया, और अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुऐ अपनी कलम चलायी है. विवेक गोयल ने कई लोगों की दास्तानें सुनाईं हैं.

एक पांच साल की बच्ची दिव्या से बातचीत का उल्लेख उन्होंने कुछ इस तरह किया है. यहां क्यों आई हो ? दिव्या कहती है क्योंकि यहां अच्छा है. ये कौनसी जगह है ? दिव्या – इंडिया है. यहां रहकर क्या करोगी ? दिव्या – पढ़ूंगी. वहां क्यों नहीं पढ़ती ? दिव्या – वहां पर स्कूल में कलमा पढ़ाया जाता है. कलमा पढ़ने से क्या होता है ? दिव्या – कलमा पढ़ूंगी तो मुसलमान हो जाऊंगी। एक पांचवर्षीय बच्ची के इस तरह से बात करने से साफ जाहिर हो रहा है कि उनकी घरेलू शिक्षा ने उनकी मानसिकता को गुलाम बना दिया है।

जाहिर ये बातें पांच वर्षीय दिव्या को किसी स्कूली टीचर ने तो सिखाई ही नहीं होंगी दरअस्ल इस तरह की बातें उसे घर पर सिखाई गईं। और अब इन्हीं बातों से मीडिया को इमोशनली बलैक मेल किया जा रहा है। जिस देश के ये नागरिक हैं वह एसा देश है जहां पर अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्य भी खतरे में हैं खुद वह देश बारूद के ढ़ेर पर बैठा अपनी तबाही का इंताजार कर रहा है वहां पर इस तरह की घटनाएं हर खास ओ आम के साथ होती हैं।

जिस दिव्या ने स्कूल ना जाने की वजह  कलिमा बताया है उस बच्ची  की मानसिकता को अभी से ही गुलाम बनाने वाले उसके अभिभावक शायद भूल गये  कि जिस तरह पाकिस्तान में स्कूलों में इस्लामी कलमा पढ़ाया जाता है उसी तरह भारत में भी स्कूलों में हिंदू धर्म का कलिमा पढ़ाया जाता है जो इस तरह है ॐ भूर्भव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्। ये मंत्र प्रारथमिक विद्यालयों में हर रोज प्रार्थना के दौरान पढ़ाया जाता है।

लेकिन कभी किसी मुसलमान ने पाकिस्तान सरकार से ये शिकायत नहीं की कि वे स्कूल इसलिये नहीं जाते कि वहां पर हिंदू धर्म का कलिमा पढ़ाया जाता है. राम को लक्ष्मण को , दशरथ को, रामायण को महाभारत को यहां के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है उसके पढ़ने पर तो किसी ने आपत्ती नहीं जताई. फिर इस तरह का हौवा क्यों खड़ा किया जा रहा है. भारत के अल्पसंख्यकों को जो भी समस्याएं होती हैं उन्हें वे भारत सरकार से कहते हैं ना कि पाकिस्तान की सरकार से फिर पाकिस्तान से आये ये लोग भारत से क्यों गुहार लगा रहे हैं.

पाकिस्तान सरकार से कहें वहां प्रदर्शन करें अपनी आजादी के लिये अपने अधिकारों के लिये. यहां इस तरह की बातें करके यहां की सांप्रदायकि ताकतों को क्यों काद पानी दिया जा रहा है ? अगर उनके साथ में जबरन धर्म परिवर्तन करने जैसी घटनायें हुई हैं तो ये गैर इस्लामी है. इस्लाम का तो अर्थ ही शान्ति है उसमें बलात धर्म परिवर्तन के लिये कोई जगह नहीं है। वह तो यहां तक कह देता है कि धर्म के बारे में कोई जोर जबरदस्ती मत करो उनका धर्म उनके लिये तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिये।

इसके बाद भी इस्लाम दोषी. इसके बाद भी तरह तरह के भद्दे आरोप शान्ति के धर्म पर क्यों लगाये जा रहे हैं ? जिस देश के सरकार के सामने आकर ये अपनी समस्याओं का रोना रो रहे हैं उस देश में भी लोगों पर जुल्म होता है. 1947 के दंगों से लेकर आज तक दंगों के जख्म हरे हैं दलितों पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं. मगर क्या इन शोषित लोगों ने किसी विदेशी सरकार से ये अपील की कि वह उसका समाधान करे. पाकिस्तान से आये लोग ये क्यों भूल गये कि भारत उनका शत्रू देश है. और उसके गुणगान करना उन्हें गद्दार बना सकता है जैसा यहां पर होता है. अगर कोई मुस्लिम पाकिस्तान का नाम भी अपनी जुबान पर लेआता है तो उसे यहां के तथाकथित देशभक्त गद्दारी के तमगे से नवाज देते हैं।

तो क्या ये अपने देश के गद्दार नहीं हुऐ. और जिस मीडिया का कलेजा इनके लिये फटा जा रहा है, और जो बुद्धीजी इनको भारत की नागरिकता दिलाने के लिये एडीचोटी का जोर लगा रहे हैं उन्होंने पिछले वर्ष उस 80 पाकिस्तानी को भारत की नागरिकता दिलाने के लिये क्यों जुबान नहीं चलाई जिसका पूरा परिवार भारत में है और वह अकेला पाकिस्तान में जो जिंदगी के आखरी पड़ाव में बस यह चाहता था कि वह अपने परिवार के बीच आखरी सांस लेना चाहता है ना कि पाकिस्तान में. उसके लिये इन्होंने आवाज क्यों नहीं उठाई ? क्या केवल इसलिये कि उसका धर्म दूसरा था ?

खैर जो भी हो …….. पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय के साथ बहुसंख्यक समुदाय असुरक्षा और भय के माहौल में जी रहा है जिसका इलाज पाक सरकार के पास है ना कि भारत के पास। और जो लोग जबरन शादी, बलात धर्म, लूट पाट, हत्या आदी कर रहे हैं वह निंदनीय है और उसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है. लेकिन इस्लाम का नाम लेकर ये लोग उसकी छवी को बट्टा लगा रहे हैं। इससे किसी और की नहीं बल्कि खुद इस्लाम की तौहीन हो रही है. अल्लाम इकबाल ने कहा था कि

खुदा के बंदे तो हैं हजारों वनों में फिरते हैं मारे मारे
मगर मैं उसका बंदा बनुंगा जिसे खुदा के बंदों से प्यार होगा।

लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं.

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