''मौनी बाबा, अब ज़िद छोड़ो, चुप्पी तोड़ो… '' शीर्षक से यह कविता किन्हीं जय सिंह ने भड़ास4मीडिया के पास मेल की है. उन्होंने अपना परिचय नहीं दिया है. उनकी कविता पढ़कर आपको भी लगेगा कि इसमें पूरे देश की आवाज है. हम लोग जिस मनमोहन को प्रधानमंत्री के पद पर ढो रहे हैं, जिस दस जनपथ के इशारे पर देश में अराजकता और भ्रष्टाचार का आलम है, उन्हें समझाने, उन्हें प्रेरित करने, उन्हें कार्यकुशल बनाने की मंशा इस कविता में दिखाई पड़ रही है पर शायद कवि को नहीं पता कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते.
और, लात मारेगी जनता इन्हें, अगले आम चुनाव में. खैर, कवि जय सिंह की तारीफ करने के साथ उनकी इस कविता को इस उम्मीद के साथ यहां प्रकाशित किया जा रहा है कि देश प्रेमी लोग इसे बड़ी संख्या में फेसबुक समेत अन्य पब्लिक फोरम्स पर शेयर करेंगे ताकि यह कविता जन जन की आवाज बन सके. -एडिटर, भड़ास4मीडिया
मौनी बाबा, अब ज़िद छोड़ो, चुप्पी तोड़ो l
– जय सिंह –
मौनी बाबा, अब ज़िद छोड़ो, चुप्पी तोड़ो l
कर्मण्य बनो, कुछ काम करो, आलस छोड़ो ll
अट्टहास करता दु:शासन, भारत माँ की चीर खींचता l
दुर्योधन अति क्रूर बन गया, भ्रष्टाचार से देश बींधता ll
भ्रष्टाचारी राक्षस गण, बेवश जनता पर जुर्म ढहाते ll
देश की दौलत लूट लूट सब, अपनी अपनी लंका भरते ll
जिस कोष के पहरेदार बने तुम, "राजा" उसको लूट गया l
कलमाडी ने मुंह काला कर, इज्जत मिट्टी में मिला दिया ll
रावण बैठा तमिलनाडु में, अहिरावन कर्नाटक में l
खर- दूषण दिल्ली में फैले, भ्रष्टाचार है कण-कण में ।
"करुना" करुणा नहीं दिखाता, उसको तो बस "निधि" चाहिए l
"मारन" देश को मार गया, उसको अपनी समृद्धि चाहिए ll
अत्याचार और खून खराबा, लंकाएँ स्वर्ण से भरी हुई l
भूखी जनता बेवस भयभीत, आत्मा तक उसकी मरी हुई ll
मैडम तुषार्ड के पुतले बन कर, देख रहे चुपचाप तमाशा l
तुम्हीं बताओ इस हालत में, रखें देश कहां से आशा ?
धृतराष्ट्र बनो मत, भीम बनो, राम बनो या कृष्ण बनो l
अर्जुन बन गांडीव उठाओ, कुछ तो करो, कुछ तो करो ll
कहते खुद को तुम हरिश्चंद्र, पर सत्ता छोड़ नहीं सकते l
जाओ, शायद देश बचे, क्यों शर्म नहीं हो तुम करते?
मत बनो "मुलायम", सख्त बनो, "माया" की तुम माया तोड़ो l
बहुत सो लिए, बहुत सो लिए, अब तो यह आलस छोड़ो ll
वस्त्र तुम्हारे उजले थे तो, अब धब्बे उन पर क्यों दिखते हैं?
तुम तो देश के "मनमोहन" थे, अब तुम्हें शिखंडी क्यों कहते हैं?
यदि इतनी ही लाचारी है, गद्दी छोड़ नहीं देते हो क्यों?
जाओ, शायद देश बचे, अब इतना मोह तुम्हें है क्यों?







