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तो क्या अब गुंडागर्दी करेगी भोजपुरी अकादमी?

बनारस। बिहार भोजपुरी अकादमी के अब तक के सबसे विवादास्पद, और पहले असाहित्यिक (जिनका भोजपुरी साहित्य से कोई लेना-देना नहीं हो) अध्यक्ष, जिनका कार्यकाल इसी महीने खत्म हो रहा है, ने जाते-जाते ना सिर्फ बिहार सरकार को, बल्कि बिहार के माननीय राज्यपाल को भी सवालों के कटघरे में खडा कर दिया है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं रवि कांत दुबे की, जिनकी नजर में भोजपुरी अकादमी का काम भोजपुरी साहित्य का विकास नहीं, बल्कि अध्यक्ष की फोटो रोज अखबारों में छपवाना है, और उस फोटो को फेसबुक पर लगाकर वाहवाही लूटना है।

बनारस। बिहार भोजपुरी अकादमी के अब तक के सबसे विवादास्पद, और पहले असाहित्यिक (जिनका भोजपुरी साहित्य से कोई लेना-देना नहीं हो) अध्यक्ष, जिनका कार्यकाल इसी महीने खत्म हो रहा है, ने जाते-जाते ना सिर्फ बिहार सरकार को, बल्कि बिहार के माननीय राज्यपाल को भी सवालों के कटघरे में खडा कर दिया है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं रवि कांत दुबे की, जिनकी नजर में भोजपुरी अकादमी का काम भोजपुरी साहित्य का विकास नहीं, बल्कि अध्यक्ष की फोटो रोज अखबारों में छपवाना है, और उस फोटो को फेसबुक पर लगाकर वाहवाही लूटना है।

भोजपुरी भाषा और साहित्य के विकास के प्रति यह व्यक्ति कितना चिंतित है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि इनके तीन साल के कार्यकाल के दौरान अकादमी से भोजपुरी की एक भी किताब प्रकाशित नहीं हुई। अखबारों में नाम छपवाने के सिवा भोजपुरी साहित्य के उत्थान का कोई प्रयास नहीं किया गया, लेकिन अध्यक्ष जी की तस्वीरें रोजाना अखबारों की शोभा बढाती रहीं। और जब अंतत: उनका कार्यकाल समाप्त होने पर था, त तब उन्होंने एक शानदार कार्यक्रम कराने का निर्णय लिया, और इस से पहले भोजपुरी अकादमी की कार्यकारिणी की एक बैठक कराने की भी कोशिश नहीं की।
 
किसी भी सरकारी कार्यक्रम में किसी को सम्मानित करने से पहले उसके लिये कार्यकारिणी की अनुशंसा पर एक कमिटी बनाई जाती है, जो सम्मानित होने वाले लोगों के लिये मापदंड तय करती है, फिर उसी आधार पर उनके नामों की अनुशंसा की जाती है, लेकिन यहाँ तो हालत यह है कि भोजपुरी अकादमी की कार्यकारिणी के सदस्यों को सम्मानित होने वाले लोगों का नाम तक नहीं पता है, और सारी परंपराओं तो धत्ता बताते हुए कई ऐसे लोगों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने बदले में अध्यक्ष जी को भी सम्मानित किया है। सम्मानित होने वालों की लिस्ट में डा. शुक्ला मोहंती, डा. नर्मदेश्वर पाण्डेय, कुलदीप श्रीवास्तव, बी. एन. तिवारी समेत कई ऐसे नाम हैं, जिनका भोजपुरी साहित्य या कला जगत में कोई योगदान नहीं है। इनमें से कई लोग तो ऐसे भी हैं, जिन्हें आजतक कभी सार्वजनिक रुप से भोजपुरी बोलते भी नहीं देखा गया। लेकिन हाँ, इन लोगों ने कई बार अकादमी के अध्यक्ष को अपने मंच पर जरुर सम्मानित करवाया है। हद तो तब हो गई जब अपने ही कार्यक्रम के मंच पर रविकांत दुबे ने खुद को, और उसी कार्यक्रम के संयोजक बी. एन. तिवारी को राज्यपाल के हाथों सम्मानित करवा लिया।
 
क्या शारदा सिन्हा, भरत शर्मा, मनोज तिवारी और अन्य कलाकार इस लायक नहीं थे?
 
इस के बाद एक कदम आगे बढते हुए रवि कांत दुबे ने बकायदा अवधी और बुंदेलखंडी गायिका मालिनी अवस्थी को भोजपुरी अकादमी की ओर से भोजपुरी का ब्राण्ड एम्बैसडर घोषित कर दिया। रवि कांत दुबे की हर मनमानी को लगातार झेलते आ रहे भोजपुरिया समाज को यह बात काफी नागवार गुजरी। अखिल विश्व भोजपुरी विकास मंच के महामंत्री प्रदीप कुमार सिंह के अनुसार – "जब भोजपुरी में शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व मनोज तिवारी समेत एक से बढकर एक दिग्गज कलाकार हैं, तो फिर आखिर बाहर से एक गायिका को इम्पोर्ट करके लाने की क्या जरुरत थी? तो क्या अब यह मान लिया जाये कि कल भोजपुरी अकादमी किसी चीनी, जापानी या जर्मन गायक को अपना ब्राण्ड एम्बैस्डर घोषित कर सकती है…? अकादमी को यह जबाब देना चाहिए की सम्मानित हुए लोगों ने चयन का मापदंड क्या था, और आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि पटना में हुए इस कार्यक्रम में पद्मश्री शारदा सिन्हा को बुलाने की भी जरुरत नहीं समझी गई। और इन्हें यह जबाब देना ही होगा, क्यों कि यह किसी का निजी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सरकारी कार्यक्रम था, और माननीय राज्यपाल के हाथों किसी को सम्मानित करवाने से पहले कोई बडी वजह जरुर होनी चाहिए। अगर भोजपुरी भाषी होना ही एकमात्र मापदंड है, तो फिर शायद 34 करोड लोगों को बिहार के माननीय राज्यपाल सम्मानित के हाथों करवाना पडेगा।"

भोजपुरी अकादमी के इस नकारात्मक रवैये से नाखुश प्रसिद्ध भोजपुरी लोक गायक भरत शर्मा और प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेता तथा गायक मनोज तिवारी ने भोजपुरी अकादमी को सम्मान वापस करने का फैसला किया है। वैसे खबर तो यह भी आ रही है कि कुछ और लोग भी अपना सम्मान वापस करने का मन बना रहे हैं, और उसकी घोषणा किसी भी समय हो सकती है।  

क्या कहते हैं भरत शर्मा ?
पिछले 3-4 दशकों में भोजपुरी गायकी का पर्याय बन चूके भोजपुरी लोक गायक भरत शर्मा भोजपुरी अकादमी के निर्णय पर सवाल उठाते हुए पुछते हैं कि आखिर जब भोजपुरी में शारदा सिन्हा जी, व मुन्ना सिंह जी सरीखे दिग्गज मौजुद थे, तो फिर एक अवधी गायिका को बुलाकर यह सम्मान देने की क्या जरुरत थी? इस बात से कहीं ना कहीं यह मैसेज जा रहा है कि भोजपुरी में काबिल लोगों की कमी है, और हमें एक ब्राण्ड एम्बैस्डर तक बाहर से बुलाना पड रहा है। भोजपुरिया समाज में अकादमी के इस फैसले को लेकर खासा आक्रोश है, और इस मुद्दे पर हम समाज के साथ खडे हैं।
 
क्या कहते हैं मनोज तिवारी ?
प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेता और गायक मनोज तिवारी से जब हमने इस संबंध में बात करने की कोशिश की तो उनके सब्र का बाँध टूट पडा – "भोजपुरी भाषा, कला और संस्कृति का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, और हमारे पास शारदा सिन्हा जी, तथा भरत शर्मा जी जैसे कलाकार हैं, जिन्होंने अपने हजारों गीतों के माध्यम से भोजपुरी लोकगीतों की गौरवशाली परंपरा को सींचने का काम किया है, तो फिर ऐसे कलाकारों के रहते एक अवधी गायिका को भोजपुरी का ब्राण्ड एम्बैसडर बनाना ना सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि मेरी नजर में यह भोजपुरिया समाज का अपमान है।"

तो क्या अब गुंडागर्दी करेगी भोजपुरी अकादमी ?
इसी मामले में भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष रवि कांत दुबे पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुये भोजपुरी लोकगायक भरत शर्मा 'ब्यास' ने भोजपुरिया डॉट कॉम को बताया कि उनके द्वारा भोजपुरी अकादमी का सम्मान लौटाने की बात कहने पर नाराज होकर दुबे ने उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। भरत शर्मा के अनुसार दुबे ने तीखे लहजे में उन्हें धमकी देते हुए कहा कि "आपके भी कई पत्र और कई राज मेरे पास हैं, और मैं उन्हें सार्वजनिक कर दुँगा।" हद तो तब हो गई, जब उन्होंने भरत शर्मा को बताया कि मुझे एक महिला को ही यह सम्मान देना था, इस पर श्री भरत शर्मा ने उन्हें शारदा सिन्हा जी का नाम सुझाया, उस पर पलट कर दुबे से जबाब दिया – "शारदा सिन्हा उस लायक नहीं थी।"
 
वाह दुबे जी वाह, एक चोरी से किताब लिखने वाले लेखक से (जिसकी पत्नी उसके खिलाफ मुकदमा लड चुकी हो, जिसका पिता उसके खिलाफ लिख चुका हो, और जिसका झुठे मुकदमों का इतिहास रहा हो) इसी बात की उम्मीद की जा सकती है, और आप इस उम्मीद पर पूरी तरह से खरे उतरे। अब यह बिहार सरकार को सोचना है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की गरिमा से खिलवाड करने वाले ऐसे व्यक्ति का क्या किया जाय? और भोजपुरिया समाज को विचार करना है कि ऐसी घटिया मानसिकता वाले लोगों के साथ कैसा सलूक किया जाय। कुल मिलाकर इस घटनाक्रम को भोजपुरी अकादमी के गौरवशाली इतिहास में एक काले पन्ने के तौर पर दर्ज किया जायेगा।

प्रवीण सिंह
[email protected]

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