Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

तो क्या हरिश्चन्द्र चंदोला युद्ध पत्रकार नहीं हैं?

कई युद्धों को रणभूमि में जाकर देश व विदेश के कई अखबारों में विवरण लिखने वाले भारतीय पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला का नाम विकीपीडिया वेबसाइट में युद्ध पत्रकारों की सूची में दर्ज नहीं है। यह बिडंबना है कि जिस पत्रकार ने सन् १९६८ से लकर १९९३ के बीच हुए युद्धों व क्रांतियों को घटना स्थल पर जाकर लिखा हो वो युद्ध पत्रकारों की श्रेणी में नहीं है।

कई युद्धों को रणभूमि में जाकर देश व विदेश के कई अखबारों में विवरण लिखने वाले भारतीय पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला का नाम विकीपीडिया वेबसाइट में युद्ध पत्रकारों की सूची में दर्ज नहीं है। यह बिडंबना है कि जिस पत्रकार ने सन् १९६८ से लकर १९९३ के बीच हुए युद्धों व क्रांतियों को घटना स्थल पर जाकर लिखा हो वो युद्ध पत्रकारों की श्रेणी में नहीं है।

हालांकि इस वेबसाइट में १९वीं से लेकर २१वीं शताब्दी के विश्व के १५९ पत्रकारों का उल्लेख किया गया है, लेकिन इसमें एक भी भारतीय युद्ध पत्रकार के नाम का उल्लख नहीं है। उल्लेखनीय है कि हरिश्चन्द्र चंदोला इकलौते भारतीय पत्रकार हैं, जिन्होंने देश व देश के बाहर कई युद्धों को कवर किया। इससे संबधित उनके लेख न केवल भारतीय बल्कि विदेश के कई समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुए हैं।

पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला का सुमार भारत के प्रमुख युद्ध पत्रकारों में किया जाता है। उन्होंने भारत में नागा छापामारों के बीच में विवरण लिखने के अलावा २५ सालों तक विदेशी भूमि में रहकर कई युद्धों का युद्ध भूमि में जाकर विवरण लिखा। सन् १९६८ से लेकर १९९३ के बीच हुए लगभग सभी युद्धों को उन्होंने कवर किया। अमेरिका – वियतनाम युद्ध को उन्होंने लगातार सात सालों तक दयुद्ध समाप्त होन तक½ कवर किया। वकायदा इसके लिए उन्हें अमेरिकी सेना की ओर से मिलने वाला प्रेस कार्ड भी उपलब्ध कराया गया था। इस प्रेस कार्ड को मैंकफी कार्ड के नाम से जाना जाता था। इस युद्ध को कवर करते हुए दो बार ऐसे मौके भी आये जब मौत उनके करीब से होकर गुजरी। ईरान ईराक युद्ध को भी उन्होंने सन् १९८० से ८८ तक कवर किया। लगातार आठ सालों तक हुए इस युद्ध का विवरण उन्होंने घटना स्थल पर जाकर लिखा। ईराकी सेना द्वारा मस्टर्ड गैस के प्रयोग की उनकी खबर न केवल भारतीय अखबरों में, बल्कि उनकी रिपोर्ट विदेशी पत्रों में छपी।

हरिश्चन्द्र चंदोला के साथ ईरान ईराक युद्ध को कवर करने वाले ब्रिटिश युद्ध पत्रकार चाल्र्स गलास ने द इंडिपेन्डेस समाचार पत्र में उनकी पत्रकारिता पर एक बड़ा लेख भी लिखा। अपने इस लेख में उन्होंने इस युद्ध का उल्लेख करते हुए लिखा कि जब उनके साथ के सारे पत्रकार अपने अपने वतन वापस जा चुके थे तब यह भारतीय पत्रकार ईरान के शरणार्थी शिविर में यह जानने के लिए पहुंचा था कि वहां रह रहे शरणार्थियों की क्या स्थिति है। उन्होंने लिखा कि हरिश्चन्द्र चंदोला ने अपने लेख में लिखा कि कैसे शरणार्थी सूखे खजूर व ब्रेड पर गुजर बसर कर रहे हैं। चार्ल्स ने लिखा कि हरिश्चन्द्र चंदोला आडम्बरहीन व्यक्ति हैं, जो युद्ध के मैदान व प्रेस वार्ताओं में विनीतभाव से अपना काम करते हैं। उनका मानना है कि चंदोला १९ वीं व २० वीं सदी के प्रमुख युद्ध पत्रकारों, ग्रेंट, बिलियम हाबर्ड,रसेल हिचर्ड व ल्यूमनी के दर्जे के पत्रकार हैं।

हरिश्चन्द्र चंदोला ने १९९१ में अमेरिका के ईराकी हमले, ईराक का कुवेत पर आक्रमण के साथ ही कई देशों की जनक्रांतियों पर भी कलम चलाई। उन्होंने कांगो कइंगा की लडाई,वियतनाम चीन युद्ध,इंडोनेशिया में सैनिक शासन की स्थापना के साथ ही इजरायल के लेबनान पर हमले की भी घटना स्थल पर जा कर रिपोर्टिंग की।

सन् १९५४ में उन्हें अपनी दूसरी तिब्बत यात्रा के दौरान तीन माह तक चीनी सैनिकों द्वारा युद्ध बंदी की ताह गरगुंशा सैनिक छावनी में रखा गया। कई जांच पडताल के बाद उन्हें चीनी सैनिकों ने रिहा किया। कई दिनों की पैदल यात्रा के बाद वो भारत वापस आये। यहां आने के बाद उन्होंने भारत तिब्बत सीमा पर हो रहे बदलावों पर खबरें लिखीं, जो भारतीय पत्रों के अलावा विदेशी समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुई। चंदोला ने अपने लेखों में लिखा कि कैसे नीली वर्दीधीरी चीनी सैनिक सीमा पर सड+क निर्माण कर रहे हैं। हालांकि उनकी इन खबरों का भारत सरकार ने इस वक्त संज्ञान नहीं लिया।

युद्ध की रिपोटिंग करते हुए पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला दो बार मौत के मुंह से निकले। एक बार जब वो अमेरिकी सेना की बखतरबंद गाडी में वियतनाम की तरफ जा रहे थे कि तभी सामने से गोलावारी होने लगी, किसी तरह गाडी से उतर कर उन्होंने जान बचाई। इसी तरह एक बार वो अल्जीरियन संघर्ष के दौरान तार घर से बाहर आ रहे थे कि उसी दौरान फ्रासिसी सैनिकों ने गोलावारी शुरू कर दी, कुछ ही मिनटों में पूरी सड+क, खून से लाल हो गई। हरिश्चन्द्र ने दीवाल से लिपटकर किसी तरह अपनी जान बचाई।

देहरादून से बृजेश सती की रिपोर्ट. संपर्क: ९४१२०३२४३७

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...