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‘त्रासदी…. माई फुट’ : रमेश उपाध्याय की कहानियां एक नया विमर्श रचती हैं

कवि-आलोचक चन्द्रेश्वर ने रमेश उपाध्याय की नई पुस्तक ‘त्रासदी…..माई फुट’ कुछ दिनों पहले दी थी। इसमें रमेशजी की तीन कहानियां सग्रहीत हैं। साथ में तीनों कहानियों पर टिप्पणियां भी हैं। उनकी कहानी ‘हम किस देश के वासी हैं’ उस वक्त ही पढ़ ली थी जब यह ‘कथन’ में छपी थी। अरसे बाद कोई अच्छी व सच्ची कहानी पढ़ने को मिली थी। यह कहानी कई मित्रों को सुनाई। कइयों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। श्रमिकों के समूह में भी यह कहानी पढ़ी गई। कइयों ने फोटो कराकर इसकी प्रतियां अपने पास रख ली। यह है किसी रचना की ताकत कि वह कैसे लोगों तक पहुंचती है, पाठक से अपना आत्मीय रिश्ता कायम कर लेती है और उन्हें कहानी अपनी लगने लगती है।

कवि-आलोचक चन्द्रेश्वर ने रमेश उपाध्याय की नई पुस्तक ‘त्रासदी…..माई फुट’ कुछ दिनों पहले दी थी। इसमें रमेशजी की तीन कहानियां सग्रहीत हैं। साथ में तीनों कहानियों पर टिप्पणियां भी हैं। उनकी कहानी ‘हम किस देश के वासी हैं’ उस वक्त ही पढ़ ली थी जब यह ‘कथन’ में छपी थी। अरसे बाद कोई अच्छी व सच्ची कहानी पढ़ने को मिली थी। यह कहानी कई मित्रों को सुनाई। कइयों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। श्रमिकों के समूह में भी यह कहानी पढ़ी गई। कइयों ने फोटो कराकर इसकी प्रतियां अपने पास रख ली। यह है किसी रचना की ताकत कि वह कैसे लोगों तक पहुंचती है, पाठक से अपना आत्मीय रिश्ता कायम कर लेती है और उन्हें कहानी अपनी लगने लगती है।

‘हम किस देश के वासी हैं’ से जो यथार्थ सामने आता है, जिन श्रमिक साथियों ने इस कहानी को पढ़ा, उन्हें लगता है कि उनका यथार्थ बहुत कुछ इससे मिलता जुलता है। भले ही यह कहानी एक आधुनिक कारखाने के वास्तविक संघर्ष की हो, लेकिन भूमंडलीकरण के इस दौर में आये बदलाव की यह प्रातिनिधिक अभिव्यक्ति है। इसीलिए श्रमिक साथियों को लगता है कि यह उनके अपने जीवनानुभवों की कहानी है, उनके अपने कारखाने की सच्चाई की अभिव्यक्ति है जहां निजीकरण, वी आर एस, आऊटसोर्सिंग, श्रमिको की सुविधाओं में कटौती व अधिकारों का हनन सामान्य सी बात है। इन साथियों के साथ 37 साल काम करने के बाद मैं सेवामुक्त हुआ। कभी इस पब्लिक सेक्टर में चार हजार से अधिक कर्मचारी थे पर आज बमुश्किल इनकी संख्या पाच सौ होगी। बेशक ठेका व संविदा पर काम करने वाले कर्मचारियों की बड़ी संख्या है।

जब कारखाना लगा, देखते देखते चार पाच यूनियनें बन गई। वहीं, स्टाफ व अधिकारियों की हमारी एसोसिएशन अलग। लेकिन आज ठेका व संविदा पर काम करने वाले यूनियन की बात सोच भी नहीं सकते। इधर सोचा, उधर कंपनी से बाहर जाने का रास्ता खुला। ऐसी हालत जब सार्वजनिक क्षेत्र के कारखाने की है तो निजी क्षेत्र की स्थितियां कितनी विकट, क्रूर व अमानवीय होंगी, यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। कभी पब्लिक सेक्टर को आदर्श सेवायोजक माना जाता था। पर आज यह भ्रम खंडित हो चुका है। ऐसे में ‘हम किस देश के वासी हैं’ जैसा सवाल उठता है तो यह बड़ा स्वाभाविक है। यह देश से श्रमिको के बेदखल या विस्थापित होने की कहानी है। इसीलिए जब चन्द्रेश्वरजी से मुझे रमेश उपाध्यायजी की यह कहानी पुस्तक मिली तो मेरे अन्दर अन्य दो कहानियों को पढ़ने की स्वाभाविक उत्सुकता थी। मुझे हजारीबाग में आयोजित राष्ट्रीय काव्य संगोष्ठी में जाना था। मैं रमेशजी की यह कथा पुस्तक साथ लेता गया यह सोचकर कि जब भी मौका मिलेगा, इन कहानियों को पढ़ूंगा। मौका हाथ आया हजारीबाग से वापसी में। यह कहानी जब शुरू की, उस समय हम कोडरमा से चले थे। शाम हो आई थी। जब खत्म किया, उस वक्त रात काफी गहरा चुकी थी। हम सासाराम से आगे निकल चुके थे। रमेशजी की कहानियों की कथा वस्तु व प्रवाहमयता ऐसी थी कि बिना विराम के इन्हें पढ़ता चला गया।

रमेश उपाध्याय की इन कहानियों की जमीन राजनीतिक व वैचारिक है। ये एक नये विमर्श को सामने लाती हैं, वह है ‘नई गुलामी का विमर्श’ या इसे ‘प्रतिरोध का विमर्श’ भी कहा जा सकता है। ये नवउपनिवेश के जाल में फंसे देश से रुबरु कराती हैं। आज देश व जनता को वित्तीय पूंजी द्वारा लूटा जा रहा है। इस बदचलन व आवारा पूंजी के साथ भारत के शासक वर्ग व सत्ता का नापाक गठजोड़ है। यह गठजोड़ विकास के नाम पर विनाशलीला के रचनाकार है। भोपाल गैसकांड इन्हीं की देन है। रमेश उपाध्याय अपनी कहानियों में इस गठजोड़ की गांठों और इनके उलझे हुए रेशों को खोलते हैं। जो हत्याएं करते हैं, नरसंहार आयोजित करते  हैं और समूचे देश को परनिर्भर व गुलाम बना रहे हैं, उनके लिए भोपाल में हुई इतनी बड़ी घटना मात्र हादसा से ज्यादा कुछ नहीं। वे इसे ‘त्रासदी’ कहते हैं जैसे यह कोई  नियति का कहर या संयोग है। पूंजीवाद भ्रम की व्यवस्था भी रचता है। इन्हें दुनिया में अपने को ‘लोकतांत्रिक’ व ‘मानवतावादी’ होने का भ्रम बनाये रखना है। अपने को दोषमुक्त व अपाराधमुक्त करने के लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है कि वे इसे.‘त्रासदी’ कहें। लोकतंत्र में असहमति व विरोध के लिए स्पेस न हो तो यह कैसा लोकतंत्र ?  वे ऐसी घटनाओं के विरोध के लिए स्पेस भी देते हैं, प्रतिवाद प्रायोजित करते हैं जिसकी सारी हवा मुआवजे तक पहुंचते पहुंचते निकल जाती है। ऐसा करना इनके लिए जरूरी है ताकि इनकी लूट का साम्राज्य कायम रहे और वे कोई दूसरा ‘भोपाल’ रच सके।

रमेश उपाध्याय की कहानियां इस पूरे खेल का पर्दाफाश करती हैं। इस खेल का ‘त्रासदी’ नाम दिये जाने पर कहानी का पात्र नूर भोपाली बौखला उठता है। उसका सारा परिवार भोपाल गैसकांड की भेंट चढ़ जाता है। वह जीवन की हताशा निराशा के खड्ड में गिरता है, वहां से वह उबरता भी है। वह गहरे अघ्ययन व शोध में जाता है तथा उसे एक उपन्यास के माध्यम से लोगों के सामने लाना चाहता है। वह इसे त्रासदी मानने या स्वीकार करने को कतई तैयार नहीं। यह उसके अन्दर पनपते गुस्से  का विस्फोट है जब इसे त्रासदी कहा जाता है….ऐसे में उसका यह कहना ‘त्रासदी ….माई फुट’ सरकार व व्यवस्था के उस पूरे सोच व चिन्तन पर करारा प्रहार है। भोपाल, 1984 के सिखों का कत्लेआम, गुजरात, उतराखण्ड…. कोई हादसा, संयोग या त्रासदी नहीं है, यह हत्याकांड है, नरसंहार है। कहानी हत्याकांड रचने वाले हत्यारों की न सिर्फ पहचान कराती है बल्कि पाठक के अन्दर उनके खिलाफ प्रतिरोध संघर्ष की चेतना को गहरा व सघन करती है।  रमेश उपाध्याय के संग्रह ‘त्रासदी…माई फुट’ की कहानियां अलग व विशष्ट महत्व रखती हैं जो अपने पाठक के यथार्थबोध को बढ़ाती हैं तथा आज के समय और इस समय में घटित परिघटनाओं को समझने की नई दृष्टि देती हैं।

लखनऊ से कौशल किशोर की रिपोर्ट.

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