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सुख-दुख...

दयाशंकर शुक्ल सागर को तीसरा कुलिश अवार्ड देंगे राष्ट्रपति

इलाहाबाद “हिन्दुस्तान” के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर के नेतृत्व में “हिन्दुस्तान टीम” को इस साल के “केसी कुलिश अवार्ड फार एक्सिलेंस इन जर्नलिज्म” के लिए फिर चुना गया है। यह अवार्ड ‘अंधे दलित का दर्द’ नाम की उस समाचार श्रृंखला के लिए दिया जा रहा है जिसमें अखबार के प्रयास से एक दलित परिवार को इंसाफ मिला। इससे पहले श्री शुक्ल को ‘इस आतंकवादी की खता क्या है और ‘फर्जी खाते बना कर करोड़ों की लूट नाम की समाचार श्रृंखला पर दो बार केसी   कुलिश अवार्ड से नई दिल्ली में नवाजा जा चुका है।

इलाहाबाद “हिन्दुस्तान” के संपादक दयाशंकर शुक्ल सागर के नेतृत्व में “हिन्दुस्तान टीम” को इस साल के “केसी कुलिश अवार्ड फार एक्सिलेंस इन जर्नलिज्म” के लिए फिर चुना गया है। यह अवार्ड ‘अंधे दलित का दर्द’ नाम की उस समाचार श्रृंखला के लिए दिया जा रहा है जिसमें अखबार के प्रयास से एक दलित परिवार को इंसाफ मिला। इससे पहले श्री शुक्ल को ‘इस आतंकवादी की खता क्या है और ‘फर्जी खाते बना कर करोड़ों की लूट नाम की समाचार श्रृंखला पर दो बार केसी   कुलिश अवार्ड से नई दिल्ली में नवाजा जा चुका है।

इलाहाबाद के कोरांव तहसील के सुदूर लड़ियारी गांव में मायावती शासन के अंतिम दौर में एक दलित के आधे परिवार की भूख से मौत हो गई। इन मौतों के कारणों की पड़ताल करते हुए ‘हिन्दुस्तान‘ ने ‘अंधे दलित का दर्द’ नाम की एक श्रृंखला शुरू की। इन खबरों को इस साल पत्रकारिता के मशहूर ‘केसी कुलिश इंटरनेशनल अवार्ड फार एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म’ के लिए चयनित किया गया है। 30 अक्टूबर 2013 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी श्री शुक्ल को सम्मानित करेंगे। टीम के सदस्यों में लड़ियारी गांव के संवाद साथी धीरेन्द्र शुक्ल व गंगापार यमुनापार संस्करण के डेस्क प्रभारी देवेन्द्र कुमार शुक्ल शामिल हैं। सामाजिक सरोकार से जुड़ी पुरस्कृत स्टोरी  ‘भूख से मौत और सिस्टम का सच हम यहां दे रहे हैं जिसमें बताया गया कि आज के दौर में भी अखबार कैसे बदलाव की शुरूआत कर सकता है।    

भूख से मौत और सिस्टम का सच

दयाशंकर शुक्ल सागर

गरीबी रेखा की तरह भूख से मौत की भी एक अदृश्य रेखा होती है जिसे आज तककोई नहीं देख पाया। भूख से हुई मौत को साबित करना आसान नहीं। कोई आमरण अनशन के दौरान प्राण त्याग दे तो आप कह सकते हैं वह कई दिनों से भूखा था इसलिए प्रस्थान कर गया। लेकिन अपने ही घर में खाने को कुछ न हो तो भी आदमी कब तक भूख रहेगा। भीख मांगकर भी खाने के लिए दो जून की सूखी रोटी का इंतजाम कर ही लेगा। शायद इसीलिए इलाहाबाद ही नहीं देश के किसी भी जिले का प्रशासन यह मानने को कतई तैयार नहीं होता है कि फलां व्यक्ति की मौत भूख से हुई है। प्रशासन का हमेशा यह तर्क रहता है कि मौत किसी बीमारी से हुई।

इलाहाबाद के एक सुदूर गांव में दलित शिव कुमार की पत्नी प्रमिला उर्फ गूंगी गर्भवती थी और घर में प्रसव के दौरान उसकी मौत हुई। हो सकता है कि जिला प्रशासन यह मान रहा हो कि किसी गरीब की जोरू का गर्भवती होना भी एक बीमारी है। इसलिए गूंगी की मौत में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं जिस पर इतना हो हल्ला मचाया जाए। वह गूंगी थी इसलिए प्रसव पीड़ा के दौरान मदद के लिए चिल्ला नहीं पाई होगी कि उसकी आवाज एएनएम या बहूरानी आशा के कानों तक सुनाई देती। तो कोई गुनहगार नहीं। बड़े गांव कस्बों में इस तरह की छोटी-छोटी घटनाएं होती रहती हैं। सच पूछिए तो यह कोई खबर भी नहीं थी जिसके लिए अखबार के पन्ने काले किए जाएं या खबरों की श्रृंखला चलाई जाए। मीडिया के गुरू जानते हैं कि इस तरह की खबरें डाऊन मार्केट खबरें हैं। एक तरह की स्पेस किलिंग खबरें।  लेकिन पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार ने मजबूर किया कि हम इस खबर की तह दर तह कुरेदें।

‘हिन्दुस्तान के पास जब दलित की पत्नी, अगले दिन नवजात शिशु और दो दिन बाद पांच साल के बेटे के भूख से मरने की खबर आई तो हमने सबसे पहले शिवकुमार की रसोई में झांककर गरीबी के अर्थशास्त्र को समझने की कोशिश की। रसोई ही थी क्योंकि वहां मिट्टी का एक चूल्हा बना था। बुझी राख की ठंडक गवाह थी कि चूल्हा कई दिन से जला नहीं था।

हमारे स्थानीय संवाद साथी धीरेन्द्र शुक्ल ने घर में रखे डालडे के पुराने डिब्बों में भी झांका जिसमें आम तौर पर गरीब परिवार आटा या दाल रखते हैं। वहां दो डिब्बे थे, दोनों खाली। इन सब की तस्वीरें खींची गईं ताकि हम साबित कर सकें कि उस गरीब के घर पर खाने के लिए वाकई कुछ नहीं था।

शिवकुमार, गर्भवती पत्नी गूंगी, तीन बच्चे और अस्सी साल की बूढ़ी मां। जरा सोचिए कि घर में अन्न का दाना न हो तो ये परिवार कितने दिन और जी पाएगा। भीख भी मांगेंगे तो कोई कितने दिन खिलाएगा। जबकि पूरा परिवार भूखा हो। हमारे लिए मुद्दा यह नहीं है कि इस 21वीं सदी में इस चमकते भारत में भूख और गरीबी से कैसे एक परिवार का आधा हिस्सा खत्म हो जाता है। असल सवाल यह है कि केन्द्र से लेकर हमारी लोकप्रिय राज्य सरकार दलितों के लिए कितनी योजनाएं चला रही हैं। आखिर यह योजनाएं दलित के चौखट तक क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं। इतनी महंगाई में हम जो टैक्स सरकार को दे रहे हैं उसका क्या हो रहा है? अगर वह गरीबों की मदद के लिए नहीं खर्च हो रहा है तो वह किसकी जेब में जा रहा है? यही सवाल अन्ना भी कर रहे हैं। इनकम टैक्स भरने वाला मिडिल क्लास इसीलिए अन्ना के साथ है। पर यह अलग बहस का मुद्दा है।

हिन्दुस्तान ने इस बारे में खबरों और फालोअप का सिलसिला चला कर  जिला प्रशासन और उसके अफसरों को सिर्फ आइना दिखाया। हमारे सिस्टम में आशा बहू से लेकिन एसडीएम तक कैसे काम कर रहे हैं? जिले में तैनात मुख्य विकास अधिकारी विकास कार्यों की निगरानी कैसे कर रहा है? जनप्रतिनिधि क्या कर रहे हैं? बीस साल से विधवा को पेंशन नहीं मिली इसके लिए कौन जिम्मेदार है? गरीबी की महीन रेखा के सबसे निचले पायदान पर खड़े इस दलित परिवार का इंदिरा आवास किसने नहीं बनने दिया? गर्भवती मां को प्रसव के दौरान घर में क्यों दम तोड़ना पड़ा? पांच साल का सोनू सूखे रोग से क्यों मर गया? छोटी सावित्री स्कूल क्यों नहीं जाती थी। दो साल का मोनू कब से भूखा है। आंगनबाड़ी में इसे दलिया क्यों नहीं मिलता? दलित की जमीन ठाकुर ने कैसे गिरवी रख ली? सवाल इतने हैं कि हर सवाल से कई और सवाल खड़े हो जाते हैं लेकिन उसका जवाब किसी के पास नहीं। ये सारे सवाल हमने खबरों के जरिए उठाए। लगातार छपी खबरों से प्रशासन की नींद टूटी। पर असल सवाल ये भी है कि क्या अखबार में छपी खबर की अलार्म घड़ी के बजे बिना सरकारी अफसरों की नींद नहीं टूटेगी?

बहरहाल, खबरें छपने के बाद डीएम साहब जागे। आनन-फानन में विधवा मां की पेंशन के कागज बनने का काम शुरू हो गया। विकलांग पेंशन भी दलित के खाते में आ गई। बिटिया का दाखिल कस्तूरबा गांधी विद्यालय में हो गया। ‘हिन्दुस्तान’ के कुछ भावुक पाठकों ने चेक देकर दलित की नि:स्वार्थ मदद की और ठाकुर साहब उस धन से गिरवी खेत वापस करने को राजी हो गए। उनका मन थोड़ा और पसीजा और उन्होंने खेत में खड़ी फसल दलित को दान कर दी। वह खुश थे मानों गंगा नहा आए। इस कहानी का अंत एक परी कथा की तरह सुखद है। घर के बाहर सब खुश थे। जब हम चेक देने गांव पहुंचे तो हाथ में चेक लिए नेत्रहीन शिवकुमार की अंधेरी आंखों में भी हमें एक चमक दिखी। कभी-कभी पीड़ा का हद से गुजर जाना भी एक तरह के सुख की अनुभूति देता है।

मैं दलित की उजाड़ झोपड़ी के उस नए लगे दरवाजे को खोलकर अंदर झांकता हूं। उस सीलन से भरी अंधेरी झोपड़ी से मुझे एक दर्दनाक गूंगी चीख सुनाई देती है। यह प्रसव पीड़ा से कराहती एक मां की चीख थी जो अब इस दुनिया में नहीं। मैं घबरा कर वह किवाड़ बंद कर देता हूं। वह चीख अब भी मेरे कानों में लगातार गूंज रही है।
 

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