वाक्या कुछ पुराना है, लेकिन जब चुनावी समर आता है तो लोगों और नेताओं की जुबान इसे समय-बेसमय ताजा कर देती है। 2007 के विधान सभा चुनाव में बसपा ने सपा को जबर्दस्त पटकनी दी थी। उस समय बसपा के एक नारे ने काफी धूम मचाई थी और वह नारा था, ‘जिस गाड़ी में सपा का झंडा होगा, उसमें बैठा गुंडा होगा।‘ यह नारा लोगों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि वर्षों बाद भी कोई इसे भुला नहीं पाया।
समाजवादी पार्टी के ऊपर बसपा का नारा कहर बनकर टूटा। मुलायम की सत्ता तो गई ही 2012 के विधान सभ चुनाव में भी सपा नेताओं को प्रचार के दौरान जगह-जगह सफाई देनी पड़ी थी कि अबकी से सपा की सरकार बनी तो गुंडाराज नहीं चलेगा। आलम यह था कि तमाम जनसभाओं में मुलायम कसमें खा रहे थे कि अबकी सपा सरकार बनेगी तो गुंडाराज बिल्कुल नहीं चलेगा। गुंडों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जायेगा। यह और बात थी कि उनकी बातों पर मतदाताओं को किसी की तरह से विश्वास नहीं हो रहा था। तब यही बात (सपा सरकार बनेगी तो गुंडाराज बिल्कुल नहीं चलेगा, गुंडों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जायेगा।) मुलायम ने अखिलेश यादव के श्रीमुख से बार-बार कहलाई। अखिलेश युवा थे, लोगों ने उनकी बातों पर भरोसा किया और यह मान बैठे कि सपा सत्ता में आती है तो वह पिछली गलती नहीं दोहरायेगी।
जनता अखिलेश की बातों में फंस गई। समाजवादी पार्टी के नेता सत्ता मिलते ही सपा बेलगाम हो गये। उसके नेता रेलवे स्टेशन पर घोड़ा दौड़ाने लगा, सार्वजनिक मंचों से असलहे लहराने लगे, सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों से मारपीट करने लगे, सरकारी जमीनों पर कब्जा शुरू हो गया, सपा का झंडा लगा कर गाड़ियों में लाश को ढोने लगे, बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देने लगे। उधर पार्टी आलाकमान के ऊपर ‘जिस गाड़ी में सपा का झंडा…. ’नारे का खौफ बरकरार है। इस नारे की याद आते ही सपा नेताओं के माथे पर पसीना आ जाता है। डर का आलम यह था कि सपा आलाकमान अबकी शुरू से ही यह कोशिश कर रहा था कि सपाई या सत्ता से नजदीकियां बढ़ाकर अपना मकसद पूरा करने वाले लोग और नेता अपनी गाड़ियों में सपा का झंडा लगा कर न घूमें। बैनर-पोस्टरों में दिग्गज सपा नेताओं के नामों का बेजा इस्तेमाल न करें। इसके लिये बकायदा फरमान तक जारी किया जा गया, फिर भी हालात बदले। सपा का झंडा लगी गाड़ियां धड़ल्ले से बिना रोकटोक के सड़कों पर दौड़ रही हैं। पुलिस इन गाड़ियों को नजरअंदाज करने में अपनी भलाई समझती है। अनेक बार तो सपा का झंडा लगी गाड़ियों से आपराधिक कृत्य को भी अंजाम दिये जाने की खबरें आती हैं। सपा के शीर्ष नेतृत्व की बेचैनी को समझने वाले कहते हैं कि उन्हें डर सताता रहता है कि कहीं सपा को सत्ता से हटाने या फिर 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा इस नारे को दोबारा न उछाल दे। वैसे भी कानून व्यवस्था को लेकर अखिलेश सरकार की पहले से ही काफी फजीहत हो रही है।
खैर, सपा को इस समय एक और नई समस्या ने घेर लिया है। सपा का झंडा लगी गाड़ियां तो पहले से ही पार्टी के लिये मुसीबत बनी हुई थी। सपा के झंडे के बाद अब समाजवादी शब्द का दुरुपयोग पार्टी के लिये मुसीबत बनता जा रहा है, जिन संगठनों का सपा से दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं है, वह समाजवादी शब्द जोड़कर फाउण्डेशन एवं ट्रस्ट गठित करने में लगे हैं। इसके तथाकथित पदाधिकारियों द्वारा सपा के झण्डे के रंग में लैटर पैड एवं विजटिंग कार्ड का प्रयोग किया जा रहा है, जबकि यह संगठन सपा की नीतियों एवं निर्देशों के विपरीत बनाये गये हैं। ऐसे फांडेशनों के बैनर-पोस्टर अक्सर उत्तर प्रदेश में जगह-जगह सड़क किनारे दिखाई दे जाते हैं। यह लोग अपने बैनर-पोस्टरों में सपा नेताओं मुलायम सिंह और अखिलेश यादव जैसे तमाम दिग्गज नेताओं के चित्रों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। पूरा खेल ब्लैक मेलिंग का होता है।
‘पानी जब सिर से ऊपर चला गया’ तो सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सख्त कदम उठाते हुए सपा के सभी जिला एवं महानगर अध्यक्षों से ऐसे लोगों के खिलाफ विधिक कार्यवाही करने को कहा है। प्रदेश अध्यक्ष ने समाजवादी लोहिया फाउण्डेशन, समाजवादी जनेश्वर मिश्र फाउण्डेशन तथा लोहिया के लोग फाउण्डेशन/ट्रस्ट का उल्लेख करते हुए कहा है कि इन संगठनों की पार्टी से किसी प्रकार की मान्यता नहीं है। समाजवादी पार्टी के संविधान में ऐसे किसी संगठन का प्राविधान भी नहीं है। इन संगठनों को समाजवादी पार्टी के नेताओं और पदाधिकारियों द्वारा किसी प्रकार का संरक्षण एवं सहयोग समाजवादी पार्टी की नीतियों के विरूद्ध माना जाएगा। श्री यादव ने समाजवादी पार्टी के समस्त जिला/महानगर अध्यक्ष, महासचिव, सांसद, विधायक, राज्य कार्यकारिणी के पदाधिकारी/सदस्य, संबद्ध प्रकोष्ठो के प्रदेश अध्यक्ष, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रदेश तथा प्रमुख साथियों के नाम परिपत्र में निर्देश दिया है कि भविष्य में यदि समाजवादी शब्द के
साथ समाजवादी महान विभूतियों के नाम को जोड़कर कोई फाउण्डेशन/ट्रस्ट आदि संगठन के बनने की जानकारी हो तो उस पर तत्काल आपत्ति दर्ज कराई जाय तथा प्रदेश कार्यालय को भी जानकारी दी जाए।
बहरहाल, अखिलेश यादव को कौन समझाये की भले ही ऐसे संगठनों से समाजवादी पार्टी का कोई लेना-देना न हो लेकिन सच्चाई यही है कि अपवाद को छोड़कर इन संगठनों की रूपरेखा तैयार करने में ही समाजवादी पार्टी के कुछ नेता और कार्यकर्ता लिप्त हैं, जिनकी अपनी जरूरतें इससे पूरी होती हैं।
लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.





