Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

दिल्ली

दागी ‘माननीयों’ के लिए कवच

विवादित हो चले नए अध्यादेश से मनमोहन सरकार एक बार फिर अपने हाथ जला बैठी है। लेकिन, किसी ‘पवित्र हवन’ के चक्कर में सरकार के हाथ नहीं झुलसे हैं। यदि दो टूक अंदाज में कहा जाए, तो सरकार को अपनी राजनीतिक गोटें बैठाने की कुछ कीमत देनी पड़ रही है। पिछले तीन-चार सालों से सरकार हर छोटे बड़े फैसले पर आलोचनाओं के ऐसे तीर झेलती आ रही है।

विवादित हो चले नए अध्यादेश से मनमोहन सरकार एक बार फिर अपने हाथ जला बैठी है। लेकिन, किसी ‘पवित्र हवन’ के चक्कर में सरकार के हाथ नहीं झुलसे हैं। यदि दो टूक अंदाज में कहा जाए, तो सरकार को अपनी राजनीतिक गोटें बैठाने की कुछ कीमत देनी पड़ रही है। पिछले तीन-चार सालों से सरकार हर छोटे बड़े फैसले पर आलोचनाओं के ऐसे तीर झेलती आ रही है।

ऐसे में लगता यही है कि उसकी राजनीतिक संवेदना का स्तर भी कुछ भोथरा होने लगा है। यदि ऐसा नहीं होता, तो वह विवादित ताजा अध्यादेश को लेकर इतनी हठधर्मिता का रवैया शायद न अपनाती। लेकिन, सरकार अपने फैसले को लेकर डटी है। कांग्रेस नेतृत्व ने जोरशोर से कहना शुरू कर दिया है कि उसने व्यापक जनहित में ही अध्यादेश लाने का फैसला लिया है। जबकि, सरकार के इस फैसले से उच्चतम न्यायालय का वह ऐतिहासिक निर्णय नाकाम हो रहा है, जिसकी जमकर सराहना हुई थी। सरकार का नया अध्यादेश हमारे दागी ‘माननीयों’ के लिए कवच की भूमिका निभाने जा रहा है। निचली अदालत से इन्हें सजा मिलने के बाद भी उनकी कुर्सी अब बची रहेगी।

लेकिन, मनमोहन सरकार ने अध्यादेश के जरिए इसे पलट दिया है। मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में इस पर मुहर लगा दी गई। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह अध्यादेश कानूनी हैसियत पा लेगा। इसके चलते ऐसे तमाम दागी सांसदों और विधायकों को बड़ी राहत मिल जाएगी, जिन्हें उच्चतम न्यायालय के फैसले के चलते अपनी कुर्सी जाने का खतरा पैदा हो गया था। दरअसल, 10 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला किया था कि जनप्रतिनिधियों को आपराधिक मामलों में दो साल या उससे ज्यादा की सजा किसी अदालत से मिलेगी, तो उनकी सदस्यता उसी दिन से स्वत: ही रद्द हो जाएगी। अदालत की पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8 की उप धारा-4 को असंवैधानिक करार किया था, जिसके चलते ‘माननीयों’ को अपनी सदस्यता बचाने का कवच मिल जाता था। लेकिन, अदालत ने इस उप धारा को रद्द करते हुए कहा कि महज अपील के आधार पर सजा पाने वालों को राहत देने का कानून सही नहीं है।

अदालत के इस फैसले को राजनीतिक शुचिता के लिहाज से ऐतिहासिक करार किया गया था। पूरे देश में यह चर्चा शुरू हुई थी कि इस पहल से राजनीति में अपराधियों की बढ़ती आमद कम हो जाएगी। लेकिन, मुख्य धारा के राजनीतिक दलों को अदालत का यह फरमान एक तरह से ‘गैर-लोकतांत्रिक’ लगा। इसीलिए, 4 अगस्त को ही सर्वदलीय बैठक में सभी ने इस फैसले को कई लिहाज से गैर-जरूरी बताया। यह कहकर आलोचना की गई कि इस फैसले से तमाम नेताओं के साथ घोर नाइंसाफी हो जाएगी। क्योंकि, कई बार राजनीतिक कारणों से नेताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे लिखा दिए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि जुलाई में हुए अदालती आदेश में यह भी प्रावधान किया गया था कि जेलों में रहकर ‘माननीय’ चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। इस फैसले को पलटने के लिए सभी दलों ने पार्टी लाइन से हटकर एकजुटता दिखाई थी।

विपक्षी दलों का रुख देखकर सरकार ने मानसून सत्र में ही सर्वोच्च अदालत के फैसले को पलटने की तैयारी कर ली थी। कानून में संशोधन करने के लिए एक विधेयक भी तैयार किया गया था। इसे राज्यसभा में रख भी दिया गया था। लेकिन, कुछ प्रावधानों को लेकर वामदलों और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने विरोध कर दिया था। इसी के चलते सरकार यह विधेयक मानसून सत्र में पास नहीं करा पाई। भाजपा के नेता यही मांग करते नजर आ रहे थे कि विधेयक की खामियों को दुरस्त करने के लिए इसे संसद की स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया जाए। ताकि, सभी दलों के सांसद इसमें अपनी राय दे सकें। वामदलों ने भी यही नजरिया रखा था कि जल्दबाजी में यदि अदालत के फैसले को पलटने की कोशिश की गई, तो राजनेताओं के प्रति लोगों में अविश्वास और बढ़ेगा।  

यह जरूर है कि मानसून सत्र समाप्त होने के पहले सरकार ने संसद से उस नए कानून पर मुहर लगवा ली, जिसके तहत जेलों में बंद नेताओं को चुनाव लड़ने का अधिकार बहाल कर दिया गया है। जबकि, अदालत के फैसले के चलते यह कानूनी प्रावधान हो गया था कि जो जनप्रतिनिधि जेल में बंद होगा, वह संसद या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता। इस पर सभी दलों ने आम तौर पर यही कहा था कि राजनीतिक कारणों से नेताओं के खिलाफ झूठे मकदमे लिखवा कर जेल भिजवा दिया जाता है। महज, इसी आधार पर उन्हें चुनाव के अयोग्य घोषित करने का फैसला सही नहीं कहा जा सकता। सरकार की इस पहल की भी काफी आलोचना हुई थी।

अब सरकार ने अध्यादेश के जरिए दागी नेताओं के लिए भी बड़ी राहत का इंतजाम कर दिया है। लेकिन, इस बार मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने जोरदार विरोध दर्ज कराना शुरू किया है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अनुरोध किया है कि वे इस ‘अनैतिक’ अध्यादेश पर अपनी मुहर न लगाएं। वाम दलों ने भी इसी तरह की गुहार लगाई है। सुषमा ने सवाल किया है कि आखिर सरकार जल्दबाजी में यह अध्यादेश क्यों लाई है? आरोप लगाया जा रहा है कि राज्यसभा के कांग्रेसी सांसद रसीद मसूद और सहयोगी दल राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को खासतौर पर राहत देने के लिए यह अध्यादेश लाया गया है। उल्लेखनीय है   कि बहुचर्चित चारा घोटाला कांड में रांची की एक विशेष अदालत ने लालू को दोषी करार किया है। उन्हें 30 सितंबर को सजा सुनाई जानी है। जबकि, कांग्रेसी सांसद रसीद मसूद भी 22 साल पुराने एक फर्जीवाड़े के मामले में दोषी करार किए गए हैं। उन्हें 1 अक्टूबर को अदालत सजा सुनाने वाली है। ये दोनों महाशय ऐसे मामलों में दोषी करार किए गए हैं, जिसकी सजा दो साल से ज्यादा होनी ही है।

ऐसे में, यदि सरकार अध्यादेश लाकर नया कानूनी प्रावधान नहीं करती, तो सांसद के रूप में दोनों की सदस्यता तत्काल चली जाती। कानून मंत्री कपिल सिब्बल के पास भी इस बात का तार्किक जवाब नहीं है कि आखिर सरकार को अदालती आदेश पलटने के लिए अध्यादेश लाने की हड़बड़ी क्या थी? कानून मंत्री यही दलील दे रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उन लोगों को संरक्षण नहीं देता, जो अपील करने के बाद बरी हो जाते हैं। ऐेसे में, उनके पास फिर से चुनकर आने का ही विकल्प बचता है। क्या, यह बात न्यायोचित है?  

अहम सवाल यह है कि आम आदमी बढ़ती महंगाई से लेकर तमाम तरह की दुश्वारियों से जूझ रहा है। लेकिन, सरकार ने कभी इस मोर्चे पर कोई कारगर कदम उठाने के लिए इतनी तत्परता नहीं दिखाई। जबकि, दागी माननीयों को कवच देना, उसकी प्राथमिकता कैसे बन गई? मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस मामले में नैतिकता का झंडा जरूर उठा लिया है। लेकिन, भूलना नहीं चाहिए कि एनडीए की सरकार ने भी 2002 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलटने का पूरा जोर लगा दिया था, जिसके तहत अदालत ने यह अनिवार्य कर दिया था कि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी नामांकन के दौरान अपना आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा दें। साथ ही, अपनी वित्तीय स्थिति और शैक्षणिक योग्यता का भी ब्यौरा भी अनिवार्य रूप से देंगे। इसको पलटने के लिए वाजपेयी सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया था। इस अध्यादेश पर संसद की मुहर भी लगवा ली गई थी। लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय ने 2003 में इस कानूनी संशोधन को गैर-कानूनी करार किया था। ऐसे में, यह कहना मुश्किल है कि राजनीति के इस हमाम में कौन राजनीतिक दल नंगा नहीं है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...