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दिल्ली

दिग्गी भारतीय राजनीति का शरारती बच्चा हैं और भाजपा मण्डली उनका खास टाइम पास

Badal Saroj : दिग्विजय सिंह एक खांटी, पक्के कांग्रेसी हैं. बातें बनाने में इतने चतुर कि अच्छे से अच्छा वामपंथी इनकी तुलना में खुद को कमतर और कमज़र्फ समझ बैठे. इनके गुरु-अर्जुन सिंह-मध्यप्रदेश (और शायद देश ) के इकलौते मुख्यमंत्री थे जिन्होंने अपना राज "सर्वहारा" को समर्पित किया था….बहरहाल समाजवादी तो बीच में जनसंघी भी हो गए थे. मुलायम सिंह तो हैं ही.

Badal Saroj : दिग्विजय सिंह एक खांटी, पक्के कांग्रेसी हैं. बातें बनाने में इतने चतुर कि अच्छे से अच्छा वामपंथी इनकी तुलना में खुद को कमतर और कमज़र्फ समझ बैठे. इनके गुरु-अर्जुन सिंह-मध्यप्रदेश (और शायद देश ) के इकलौते मुख्यमंत्री थे जिन्होंने अपना राज "सर्वहारा" को समर्पित किया था….बहरहाल समाजवादी तो बीच में जनसंघी भी हो गए थे. मुलायम सिंह तो हैं ही.

यूँ अपने संविधान में भी लिखा है समाजवाद-यूँ लिखने को तो धर्मनिरपेक्ष भी लिखा है. लिखने में क्या रक्खा है…दिग्गी राजा के पीछे इन दिनों एक ख़ास विचार के लोग हाथ धो कर पड़े हैं- दिग्गी पुराने सामंत हैं, उन्हें मजे लेना आता है….हर शहर में एक दो लोग होते हैं, जिनकी कोई न कोई चिढ (कुछ जगह इसे लोकभाषा में "चैंक" या चेन्क भी कहते हैं) होती है.

शरारती बच्चे इन लोगो की धोती खोल कर या कोई अल्लम-गल्लम जुमला बोलकर भाग जाते हैं-और ये हैं कि चीखते चिल्लाते रहते हैं. दिग्गी भारतीय राजनीति का शरारती बच्चा हैं और भाजपा मण्डली उनका ख़ास टाइम पास. वे फुलझड़ी सुलगाते हैं और भाजपा मण्डली अपनी धोती खुद खोलकर उनके पीछे भाग पड़ती है. वैसे दिग्विजय सिंह के इन दिनों के लावण्य की वजह इस मण्डली द्वारा दिए गए श्राप ही नहीं हैं. क्योंकि साम्प्रदायिकता पर प्रहार करके दिग्गी कोई शौर्य नहीं दिखा रहे होते. उनकी चमक के पीछे बाकी कांग्रेसी भेड़ों के डर-भय की कालिमा है-जो साम्प्रदायिकता के खिलाफ कुछ बोलते तक नहीं हैं. मगर लोग भूल जाते है की ये दिग्विजय सिंह ही थे जिन्होंने गरम हिंदुत्व की जगह नरम हिंदुत्व का रवैया अख्तियार किया था.

उनके नरम हिंदुत्व को वे कहाँ सिरा आये ये तो उन्ही से पूछना पडेगा-मगर उनकी इस एन्चकतानी समझदारी और पूंजी परस्त नीतियों ने खालिस भाजपाई हिंदुत्व को म प्र पर जरूर लाड दिया. साम्प्रदायिकता पर बोलने में भले वे आज कितने भी आगे क्यों न दिख रहे हों -अपने शासन के दौरान वे कभी कुछ करते नहीं दिखे थे. इस बारे में तीन चार उदाहरण ही काफी हैं- १९९२ में भोपाल (और बाकी प्रदेश ) में हुए कत्लेआम के एक भी आरोपी को वे अपने दस साला दिग्विजयी शासनकाल में सजा नहीं दिलवा सके/अपनी नीतियों के चलते ऐसे हालात पैदा किये कि उन्हें पराजित करने वाली खुद उमा भारती ने कहा था कि यह "हमारी जीत से ज्यादा दिग्विजय सिंह -बंटाढार- की हार है"/

मध्यप्रदेश एक मात्र ऐसा प्रदेश है जहां सरकारी कर्मचारी-अधिकारियों को आर एस एस में जाने की अनुमति (पढ़ें: हिदायत) दी गई है..जब माकपा का एक प्रतिनिधि मंडल प्रदेश में दिग्गी नामित राज्यपाल से मिला और उनसे आग्रह किया कि वे इस अनुचित आदेश को वापस लेने के लिए सरकार को अडवाइजरी भेजें, तो महामहिम राज्यपाल "अरे भाई…." कह के गोता लगा गए. दिग्गी राजा को इसके बारे में बताया गया – उनका जवाब आना अभी बाकी है….सो उनका सेकुलरिज्म भी खांटी कांग्रसी सेकुलरिज्म है. अहमदाबाद की कांग्रेस शासित (तब की ) नगर निगम की तरह जिसने दंगे से उजड़े गुजरातियों के शिविरों में पानी के टैंकर्स पहुंचाने से मना कर दिया था. बहरहाल इस सबके बावजूद- "उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा-और मध्यप्रदेश की भाजपा में अप्राकृतिक आपदा" वाला उनका जुमला उन्हें एक चाय का हक़दार तो बनाता है-पता नहीं भाजपाई इस सेक्युलर कमेंट पर क्यों चुप लगाए बैठे हैं.

बादल सरोज के फेसबुक वॉल से.
 

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