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दिल्ली

दिल्ली की राजनीति में हुए इस ऐतिहासिक बदलाव के हम सब साक्षी हैं

अरविन्द केजरीवाल की रामलीला मैदान में जनता के सामने लोकपाल बिल को पास करने की मुराद तो पूरी नहीं हो सकी पर इस व्यक्ति ने दिल्ली की राजनीति में एक बड़ा बदलाव जरुर किया है, कांग्रेस की चूलें हिला कर रख दी है। 15 साल के सशक्त शासन को जड़ों से उखाड़ कर फेंक दिया है। बेशक केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सरकार नहीं बना सकी पर उसने चुनाव में अपनी भूमिका के दर्शन उन सभी दलों को करा दिए जो अब से पहले केजरीवाल को बच्चा बता रहे थे। इससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भी केजरीवाल राजनैतिक दलों को चुनौती देने वाले हैं। 
अरविन्द केजरीवाल की रामलीला मैदान में जनता के सामने लोकपाल बिल को पास करने की मुराद तो पूरी नहीं हो सकी पर इस व्यक्ति ने दिल्ली की राजनीति में एक बड़ा बदलाव जरुर किया है, कांग्रेस की चूलें हिला कर रख दी है। 15 साल के सशक्त शासन को जड़ों से उखाड़ कर फेंक दिया है। बेशक केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सरकार नहीं बना सकी पर उसने चुनाव में अपनी भूमिका के दर्शन उन सभी दलों को करा दिए जो अब से पहले केजरीवाल को बच्चा बता रहे थे। इससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भी केजरीवाल राजनैतिक दलों को चुनौती देने वाले हैं। 
 
आज वापस एक बार फिर लगने लगा है कि हम वाकई लोकतंत्र के निवासी हैं, जहां जनता का जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन होता है। जो पहचान इससे पहले खो सी गए थी आज हमने वो वापिस हासिल की है। जनता ने कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को यह दिखा दिया है कि आँखे बंद तो रह सकती है पर ज्यादा दिन तक नहीं। आज जनता ने यह साफ़ कर दिया है कि उनके मत में कितना दम है। और एक आम आदमी क्या कर सकता है। 
राजधानी दिल्ली में जहां कांग्रेस ने 15 साल लोगों का खून चूसा और उसे विकास का नाम दिया गया, वहां पहली ही बार में एक आम पार्टी ने (जिसे अस्तित्व में आये केवल एक साल ही हुआ है) उसे यह एहसास कराया कि शासन इस तरह से नहीं होता जिस तरह से आप कर रहे हैं, और जनता वाकई सब जानती है, और सही समय आने पर अपना बदला भी ले लेती है। 
 
ये साफ़ तौर पर दिल्ली की जनता का कांग्रेस पर गुस्सा है जो उसने जगत जाहिर किया है। 15 सालों से दिल्ली की जनता के सीने में जल रहे ज्वालामुखी का फटना यह दर्शाता है कि हमें एक सुशासन चाहिए, कुशासन नहीं। भाजपा के जीतने के पीछे चाहे जो भी कारण रहे हों, मगर आम आदमी पार्टी को देखकर तो ये साफ़ हो जाता है कि ये उसी की जीत है, भाजपा की नहीं।
 
नेताओं से भरे इस देश में आज आम आदमी पार्टी ने यह भी साबित कर दिया कि एक आम आदमी फिर चाहे वह रिक्शे वाला हो या ऑटो वाला, चाय वाला हो या निजी क्षेत्र में नौकरी करने वाला तीसरे दर्जे का मज़दूर सभी चुनाव में भाग लेकर जीत सकते हैं और जनता के प्रतिनिधि बन सकते हैं। आज उस चलन का भी अंत हो गया जिसने राजनीति को चारों ओर से इस तरह से समेट रखा था कि चुनाव केवल वो ही लोग लड़ सकते हैं जो पैसे वाले हैं जिनका समाज में रुतबा है, जिनसे लोग खौफ खाते हैं, जो समाज को केवल गुमराह करते हैं उनका भला नहीं। और ये बड़ा बदलाव उस खौफ से चुप्पी तोड़ने का संभल है, जो लोगों ने दर्शाया है।   
 
दिल्ली की सत्तर सीटों में से 28 सीटें हासिल करना वो भी बिना किसी राजनीतिक विरासत के अपने आप में एक बुलंद उपलब्धि है। जो केजरीवाल ने हासिल की है। कांग्रेस जो पूर्वी दिल्ली से पिछले 15 सालों से पूर्ण बहुमत हासिल कर रही थी आज वहाँ कहीं तक भी नहीं दिखाई दी। आम आदमी पार्टी ने पूर्वी दिल्ली की सीटों पर कब्जा किया और बता दिया की पिछड़े इलाकों में कांग्रेस का क्या अस्तित्व है। इसे साफ़ जाहिर हो गया है कि अपने घोषणा पत्रों में जो वादे किए गए थे वो कांग्रेस ने पूरे नहीं किए और भी कई मुद्दे हैं जिनके कारण आज कांग्रेस ने अपनी स्वतंत्रता से चली आ रही प्रथा को नेस्तोनाबूद कर लिया। और शायद आने वाले 2014 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस को मुंह की खानी पड़े। बीजेपी की जीत का श्रेय साफ़ तौर पर मोदी को देने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। मोदी की लहर का असर बाकी राज्यों की भांति दिल्ली पर भी दिखा और बीजेपी ने तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाई। अब देखना यह है कि क्या बीजेपी अपनी इस जीत को बनाये रखती है या पहले की भांति ही दिल्ली में अपने गलत बयानों से मार खा जाती है।
 
अब केजरीवाल के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है कि अब क्या? सरकार तो बन नहीं पायी तो क्या बीजेपी का कहा सब कुछ मान लिया जाएगा या एक सशक्त विपक्ष की भांति 'आप' दिल्ली में कार्य करेगी, और भी कई सवाल खड़े हो जाते हैं कि क्या बीजेपी लोकपाल को पास करेगी, जो कांग्रेस की भांति ही उसका विरोध कर चुकी है जिसकी सांठ-गांठ के कारण ही लोकपाल को पास नहीं किया गया था,(जब अन्ना अनशन पर बैठे थे और तब ही आम आदमी पार्टी की नींव रखी गयी थी।) अब क्या होगा वो तो आगे आने वाले समय में ही पता चलेगा। पर आप की ये 28 सीटें केजरीवाल के लिए बड़ी और महत्त्वपूर्ण चुनौतियां भी साथ लाई हैं, जिस जनता ने केजरीवाल पर भरोसा जताया है वो काम चाहेगी तो क्या करेगी आप? भाजपा के दबाव में कार्य करेगी या अपनी बातों पर अटल रहेगी? जब भी किसी दल ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया है उसने विपक्ष को अनदेखा जरुर किया है, अभी हाल ही की हरियाणा विधान सभा से विपक्ष को बाहर कर देना सभी के सामने आया था जब प्रमुख विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल को सदन से निष्कासित कर दिया गया था और विभिन्न बिलों को पास किया गया था। अब क्या गारंटी है कि दिल्ली में भी यह दोहराया नहीं जाएगा और अगर ऐसा हुआ तो क्या करेगी आप?
 
वहीं अगर वर्तमान स्थिति पर नज़र दौड़ाएं तो लगता है कि दिल्ली में किसी भी पार्टी की सरकार नहीं बन पायेगी, क्योंकि यहां मामला त्रिशंकु हो गया है और ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाएगा, तो क्या आप भाजपा और आप पुनः चुनावों में अपनी स्थिति बरकरार रख पाएंगे या किसी एक पार्टी को बहुमत मिलेगा, या दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन के बाद सरकार बनेगी और हर्षवर्धन या केजरीवाल में से एक को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा परन्तु ऐसी स्थिति में तो भाजपा का पलड़ा भारी दिखाई देता है गठबंधन के बाद भी आप को क्या मिलने वाला है? सीटे तो भाजपा के पास ज्यादा हैं। इसके अलावा भाजपा अल्पमत की सरकार बना सकती है अगर बाकी पार्टियों से ये आश्वासन मिले कि सरकार उनके द्वारा नहीं गिराई जायेगी। जो भी लगता है दिल्ली में अभी और उठापटक होने वाली है, जिससे प्रभावित केवल आम आदमी होगा, अब चुनाव हो या न हो, सरकार भाजपा की बने या आप की या फिर राष्ट्रपति शासन लागू हो परन्तु दिल्ली की जनता ने एक बड़ा बदलाव अपनी आंखों से देखा है जिसके साक्षी हम सब हैं।
 
लेखक अश्वनी कुमार से [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है.
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