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दिल्ली में पत्रकारों-संवाददाताओं के लिए सम्मानों की भरमार है

: पत्रकार और सम्मान : दिल्ली में पत्रकारों खास तौर पर संवाददाताओं के लिए सम्मानों की भरमार है। कई लोग अपने माता पिता के नाम पर संगठन बना कर हर साल 20-25 पत्रकारों को सम्मानित करते हैं तो कई लोग किसी अन्य बहाने से सम्मानित करते हैं। कहने का मतलब यह कि इन संगठनों द्वारा 50-60 पत्रकार हर साल सम्मानित कर दिए जाते हैं। कुछ पत्रकार तो ऐसे भी हैं जो कई कई बार सम्मानित हो चुके हैं। दिल्ली की रिपोर्टिंग के दौरान मेरे सामने भी ऐसे कई प्रस्ताव आए मगर मैंने सम्मान लेने से इंकार कर दिया। एक बार कुछ लोग आए और मुझे हिंदी की सेवा के लिए सम्मानित करने का प्रस्ताव किया मैंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कारण यह था कि यह सम्मान पाने वाले दो चार ही पत्रकार थे मगर ऐन मौके पर मैंने यह सम्मान लेने से इंकार कर दिया।

: पत्रकार और सम्मान : दिल्ली में पत्रकारों खास तौर पर संवाददाताओं के लिए सम्मानों की भरमार है। कई लोग अपने माता पिता के नाम पर संगठन बना कर हर साल 20-25 पत्रकारों को सम्मानित करते हैं तो कई लोग किसी अन्य बहाने से सम्मानित करते हैं। कहने का मतलब यह कि इन संगठनों द्वारा 50-60 पत्रकार हर साल सम्मानित कर दिए जाते हैं। कुछ पत्रकार तो ऐसे भी हैं जो कई कई बार सम्मानित हो चुके हैं। दिल्ली की रिपोर्टिंग के दौरान मेरे सामने भी ऐसे कई प्रस्ताव आए मगर मैंने सम्मान लेने से इंकार कर दिया। एक बार कुछ लोग आए और मुझे हिंदी की सेवा के लिए सम्मानित करने का प्रस्ताव किया मैंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। कारण यह था कि यह सम्मान पाने वाले दो चार ही पत्रकार थे मगर ऐन मौके पर मैंने यह सम्मान लेने से इंकार कर दिया।

इस सम्मान समारोह का निमंत्रण पत्र मेरे सामने आया तो उसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री साहब सिंह वर्मा यह सम्मान प्रदान कर रहे थे। आयोजक मेरे पास निमंत्रण पत्र ले कर आए तो मैंने साहब सिंह वर्मा का नाम देख कर उनके हाथों सम्मानित होने से इंकार कर दिया। मैं भाजपा के मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित नहीं होना चाहता था। आयोजकों ने मेरी जिद देख कर रास्ता यह निकाला कि मैं समारोह में पहुंचूं तो मुझे किसी अन्य के हाथों सम्मान पत्र दिला दिया जाएगा। मैंने यह प्रस्ताव भी यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि समारोह में मेरा यह व्यवहार मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा के खिलाफ होगा।

कुल मिला कर एक सम्मान मैंने लिया। एक दलित पत्रिका के संपादक मेरे पास आए और मुझे पत्रकारिता के लिए सम्मानित करने की इच्छा प्रकट की। आज मुझे न उन सज्जन का नाम याद आ रहा है ओर न ही उनकी पत्रिका का। यह सम्मान मुझे अर्जुन सिंह के हाथों दिलाया गया था जिस पर मुझे कोई आपत्ति नहीं थी। शाह टाइम्स में नौकरी के दौरान सहारनपुर के एक पत्रकार संगठन ने मुझे वहां का एक प्रतिष्ठित सम्मान कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर अवार्ड देने का प्रस्ताव किया। इस संगठन में लगभग सभी युवा पत्रकार थे। मैंने उनसे कहा कि बंधुवर मैं तो घिसा पिटा पत्रकार हूं, किसी सम्मान का मुझ पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा। आप यह सम्मान किसी युवा पत्रकार को दें तो उसे बहुत खुशी होगी। मेरे इंकार और इस प्रस्ताव को उन्होंने मान लिया और यह सम्मान शाह टाइम्स के मालिक संपादक शाहनवाज राणा को दे दिया।

इन सम्मान समारोहों के आयोजन का एक मकसद चंदा बटोरना भी होता है। ऐसा अनुभव मुझे अपने ही नगर दादरी में हुआ। एक लड़के को मेरी सिफारिश पर एक अखबार में संवाददाता बनाया गया था। एक मित्र ने बताया कि वह लड़का मेरे सम्मान में समारोह करने के लिए चंदा एकत्र कर रहा है। मुझे इसका पता भी नहीं था। जानकारी होने पर मैंने उसे बुलाया और पूछा तो वह बोला- आप हमारे गुरु हैं, इसलिए आपसे बिना पूछे ही हमने तय कर लिया। मैंने उसे सख्ती से मना किया और जिन लोगों से चंदा लिया है उसे लौटाने को कहा। सम्मान समारोह तो नहीं होना ही था, पता नहीं उसने चंदा लौटाया या नहीं।

लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है:  सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207


अन्य संस्मरणों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: भड़ास पर डा. महर उद्दीन खां

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