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दिल्ली

दिल्ली से शुरू हो गया आम आदमी पार्टी का नया राजनीतिक प्रयोग

स्वतंत्र भारत के इतिहास में राष्ट्रीय राजधानी से राजनीति का एक अभिनव प्रयोग शुरू हो रहा है। बहुत पहले महात्मा गांधी ने यह सपना देखा था कि भारतीय लोकतंत्र में जनता की ताकत सर्वोपरि होगी और वही मालिक की हैसियत में होगी। जबकि, मंत्री से लेकर संतरी तक देश की सेवा में ही जुटेंगे। उन्होंने एक ऐसे सत्ता तंत्र की कल्पना की थी, जिसमें वीआईपी कल्चर नहीं होगा। लेकिन, पिछले छह दशकों में चुनी हुई सरकारों ने ही बापू का यह सपना जमकर रौंदा है। इतना रौंदा कि आम जनता का कचूमर निकल गया है। अब जाकर कहीं यहां एक ऐसी पार्टी का उदय हुआ है, जो नेता नहीं, सेवक की भूमिका में राज करने जा रही है। यह शुरुआत ‘आप’ का नेतृत्व करने जा रहा है। इस नवोदित पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल सरकार बनाने का फैसला कर चुके हैं। वे जल्दी ही रामलीला मैदान में आम जनता के बीच मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नजर आएंगे।

स्वतंत्र भारत के इतिहास में राष्ट्रीय राजधानी से राजनीति का एक अभिनव प्रयोग शुरू हो रहा है। बहुत पहले महात्मा गांधी ने यह सपना देखा था कि भारतीय लोकतंत्र में जनता की ताकत सर्वोपरि होगी और वही मालिक की हैसियत में होगी। जबकि, मंत्री से लेकर संतरी तक देश की सेवा में ही जुटेंगे। उन्होंने एक ऐसे सत्ता तंत्र की कल्पना की थी, जिसमें वीआईपी कल्चर नहीं होगा। लेकिन, पिछले छह दशकों में चुनी हुई सरकारों ने ही बापू का यह सपना जमकर रौंदा है। इतना रौंदा कि आम जनता का कचूमर निकल गया है। अब जाकर कहीं यहां एक ऐसी पार्टी का उदय हुआ है, जो नेता नहीं, सेवक की भूमिका में राज करने जा रही है। यह शुरुआत ‘आप’ का नेतृत्व करने जा रहा है। इस नवोदित पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल सरकार बनाने का फैसला कर चुके हैं। वे जल्दी ही रामलीला मैदान में आम जनता के बीच मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नजर आएंगे।

दिल्ली विधानसभा के चुनाव में 70 में से इस पार्टी को 28 सीटें मिली हैं। जबकि, सरकार बनाने के लिए कम से कम 36 विधायकों की जरूरत है। लेकिन, इस बार यहां जनादेश ऐसा आया कि किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। सत्ता की तीन पारी खेल चुकी कांग्रेस को तो महज 8 सीटें ही हासिल हो पाईं। भाजपा को 32 सीटें जरूर मिलीं। लेकिन, 4 सीटों की कमी के चलते वे सत्ता पाने से दूर हो गए। हालात तो यह हो गए थे कि दिल्ली में दोबारा चुनाव होने के आसार बन गए थे। क्योंकि, भाजपा ने उपराज्यपाल से मिलकर कह दिया था कि वे सरकार गठित करने की स्थिति में नहीं हैं। जबकि, ‘आप’ के नेतृत्व ने पहले ही ऐलान किया था कि न वे किसी को समर्थन देंगे और न ही किसी का समर्थन लेंगे।

इसी को लेकर दिल्ली में सत्ता का पेंच कई दिनों तक फंसा रहा है। संवेदनशील सियासी हालात देखकर कांग्रेस ने बिना शर्त के ‘आप’ नेतृत्व को समर्थन देने का ऐलान किया था। जबकि, ‘आप’ के नेताओं ने किसी से समर्थन मांगा भी नहीं था। इसी को लेकर पिछले एक पखवाड़े से जद्दोजहद चलती आई है।

‘आप’ ने चुनावी राजनीति में एक नए किस्म का प्रयोग किया है। दरअसल, इस पार्टी का उदय ही भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ है। गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल कानून के लिए एक बड़ा आंदोलन तीन साल पहले शुरू किया था। इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल अन्ना के खास सिपहसालार के रूप में उभरे थे। उनके जुनून के चलते ही अन्ना का आंदोलन एक देशव्यापी आंदोलन के रूप में छा गया था।

अन्ना ने जनलोकपाल के मुद्दे पर दिल्ली से लेकर मुंबई तक आमरण अनशन किए, तो देशभर में लाखों नौजवान सरकार के खिलाफ मुट्ठी तानकर खड़े हो गए थे। जनदबाव इतना बढ़ा कि मनमोहन सरकार भी हिलने लगी थी। इस दबाव के चलते ही पूरी संसद ने लोकपाल कानून बनाने का संकल्प जताया था। इस संकल्प के बाद भी सालों तक लोकपाल विधेयक संसद में लटका रहा है। काफी मुश्किल से पिछले दिनों ही इस विधेयक पर संसद की मुहर लग पाई है।

अन्ना ने देशभर में घूम-घूमकर यही कहा कि जब तक राजनेताओं की राजनीति भ्रष्टाचार से ग्रसित रहेगी, तब तक आम आदमी को राहत नहीं मिल सकती। इसके साथ ही इनकी राजनीति से महात्मा गांधी का सपना भी कभी पूरा नहीं हो सकता। क्योंकि, ये सरकारें छल, छद्म व भ्रष्टाचार से ही संचालित हैं। ऐसे में, अन्ना के सिपहसालारों के बीच यह बहस तेज हुई थी कि साफ-सुथरी राजनीति के लिए क्या लोगों के सामने नया राजनीतिक विकल्प देने की जरूरत है?

इस पर अन्ना की लाइन यही रही कि वे राजनीति में नहीं आना चाहते और समाज सुधारक के रूप में ही अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। जबकि, केजरीवाल जैसे युवाओं ने जोर दिया कि यदि सियासत को पाक साफ करना है, तो जनता को एक नया राजनीतिक विकल्प देना ही होगा। इसी एजेंडे पर करीब सवा साल पहले केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (आप) का गठन कर डाला। हालांकि, अन्ना इस पहल के खिलाफ थे। सो, वे अलग हो गए। इस तरह से अन्ना आंदोलन के गर्भ से ही इस पार्टी का जन्म हुआ है। केजरीवाल इसके संयोजक बने और इन्होंने अपनी चुनावी राजनीति का प्रयोग दिल्ली से शुरू किया।

विधानसभा चुनावों में जब इन लोगों ने अपनी हुंकार भरी थी, तो यही कहा जा रहा था कि केजरीवाल की पार्टी ज्यादा से ज्यादा ‘वोट कटुआ’ की भूमिका में आ सकती है। क्योंकि, न इनके पास अनुभवी टीम है और न ही इनके पास कोई धन-बल है। इस तरह की नकारात्मक चर्चाओं के बावजूद टीम केजरीवाल का हौसला बना रहा। ये लोग यही कहते रहे कि वे राजनीति के मायने बदलने आए हैं। ऐसे में, चुनाव जीतने के लिए उन हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेंगे, जो भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां करती आई हैं।

इन लोगों ने जो कहा था वही करके दिखाया भी। इनके पास नौजवानों की ऐसी टीम थी, जिसे परंपरागत सियासत का कोई अनुभव नहीं था। इन लोगों ने अपने हौसले से इसी अनाड़ीपन को खुद की ताकत बना ली। मीडिया भी इनकी सफलता को लेकर आखिरी समय तक आशंकित रहा। आम तौर पर अनुमान यही लगाया गया था कि ये पार्टी दो-चार सीट जीत ले, यही इसकी उपलब्धि होगी। लेकिन, 8 दिसंबर को जो नतीजे आए, उसने सब को चौंका दिया।

इस पार्टी ने कांग्रेस को बुरी तरह से शिकस्त दी है। भाजपा को इस पार्टी के मुकाबले कुछ सीटें ज्यादा मिली हैं। लेकिन, जीत का असली सिकंदर केजरीवाल को ही माना गया है। शुरुआत में कांग्रेस ने इस पार्टी पर दबाव बनाने की कोशिश की थी। दरअसल, इन्हें उम्मीद थी कि सत्ता पाने की लालच में टीम केजरीवाल का रुख कांग्रेस के लिए नरम हो जाएगा। क्योंकि, कांग्रेस के विधायकों के समर्थन से ही इनकी सरकार बन सकती है। लेकिन, ‘आप’ के नेतृत्व में सत्ता का लालच नहीं पैदा हुआ। इन लोगों ने यही कहा कि वे कांग्रेस के विरोध में जीतकर आए हैं, ऐसे में इनके समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे। कांग्रेस नेतृत्व ने इन्हें बगैर मांगे हुए समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

इसके बाद इन पर सरकार बनाने का दबाव बढ़ने लगा था। इन स्थितियों में ही टीम केजरीवाल ने एक उस्तादी का राजनीतिक दांव चला। यही कहा कि वे दिल्ली की जनता के बीच राय-शुमारी कराएंगे, यही कि सरकार बनाएं या नहीं? इसी ऐलान के साथ इन लोगों ने एसएमएस, फोन, वेबसाइट व जनसभाओं के जरिए राय-शुमारी शुरू कराई। करीब 7 लाख लोगों ने इन्हें संदेशे भेजे। इनमें से करीब 80 प्रतिशत की राय यही रही कि ‘आप’ नेतृत्व को सरकार बनानी चाहिए। इन लोगों ने दिल्ली के हर वार्ड में जनसभाएं भी कीं। वहां भी यही सवाल रखा। 257 सभाओं में लोगों ने राय दी कि आप लोग सरकार बनाइए। जबकि, 23 सभाओं में लोगों ने सुझाव दिया कि कांग्रेस पर भरोसा करने की जरूरत नहीं है।

लेकिन, बहुमत ने सरकार बनाने के पक्ष में राय दी, तो टीम केजरीवाल ने बहुमत की इस राय को ही सिर-माथे लगाया। कल दोपहर में केजरीवाल राजभवन पहुंचे। वहां पर उन्होंने उपराज्यपाल नजीब जंग को बता दिया कि वह दिल्ली की जनता की चाहत को देखते हुए सरकार बनाने को तैयार हैं। ‘आप’ के नेताओं ने उपराज्यपाल से इच्छा जाहिर की कि मुख्यमंत्री का शपथ समारोह जंतर-मंतर, रामलीला मैदान या राजघाट में कराया जाए। क्योंकि, इन्हीं स्थलों से उन्हें राजनीतिक बदलाव की प्रेरणा मिली है। इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए उपराज्यपाल ने रामलीला मैदान में शपथ समारोह कराने की अनुमति दी है। अभी तिथि और समय के बारे में फैसला होना बाकी है।

बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को भी यही लग रहा था कि सत्ता आते ही ‘आप’ के लोगों के स्वर बदल जाएंगे और ये लोग अपनी चुनावी घोषणाओं को लेकर इधर-उधर की बातें करना शुरू कर देंगे। लेकिन, ऐसी सभी आशंकाओं को खारिज करते हुए ‘आप’ नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि उनके मंत्री और विधायक सेवक की भूमिका में रहेंगे। मुख्यमंत्री केजरीवाल भी दिल्ली की सड़कों पर ‘मुख्यसेवक’ की भूमिका में नजर आएंगे।

उपराज्यपाल से मुलाकात करके केजरीवाल लौट रहे थे, तो मीडिया वालों ने उन्हें घेर लिया। एक सवाल उछला कि आप को लालबत्ती गाड़ी कब मिलेगी? इसका जवाब केजरीवाल ने हल्की मुस्कान के साथ यही दिया कि वे तो ‘लालबत्ती’ कल्चर खत्म करने के लिए सत्ता में आ रहे हैं। ऐसे में, मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वे वीआईपी नजर नहीं आएंगे। न तो बड़ा सरकारी बंगला लेंगे और न लालबत्ती वाली गाड़ी।

जब यह तय हो गया कि केजरीवाल ही मुख्यमंत्री होंगे, तो दिल्ली पुलिस ने प्रोटोकॉल के तहत उनके पास सुरक्षा के लिए एक पुलिस टीम भेज दी। लेकिन, केजरीवाल ने कह दिया कि उन्हें कोई सरकारी सुरक्षा की दरकार नहीं है। इस पर दिल्ली पुलिस ने प्रोटोकॉल का हवाला दिया, तो केजरीवाल ने पुलिस कमिश्नर को चिट्ठी लिखकर भेज दी कि पुलिस, आम आदमी की सुरक्षा में लगे, केजरीवाल की सुरक्षा की ज्यादा चिंता न करे।

आम आदमी पार्टी के नेता प्रो. आनंद कुमार का कहना है कि दिल्ली से जो यह राजनीतिक प्रयोग हो रहा है, वह देश की नई राजनीति के लिए एक आइना बन सकता है। ऐसे में, यह नहीं माना जाना चाहिए कि नई राजनीति का यह विकल्प केवल दिल्ली तक सीमित रहेगा। वैसे भी, लोकसभा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी ने ताल ठोंक दी है। माना जा रहा है कि यह पार्टी 100 से ज्यादा सीटों पर मजबूती से चुनाव लड़ेगी। भाजपा और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को भी ‘आप’ के उम्मीदवार चुनौती देंगे।

अहम सवाल यह है कि सरकार बनने के पहले ही कांग्रेस को आंख दिखाने वाले ‘आप’ नेतृत्व को कांग्रेस कब तक समर्थन देगी? क्योंकि, ‘आप’ के नेता लगातार कह रहे हैं कि वे सत्ता संभालने के साथ ही शीला दीक्षित सरकार के कार्यकाल में हुए तमाम घोटालों की जांच कराएंगे। इसी के साथ भाजपा नेतृत्व वाली एमसीडी के घोटालों पर भी जांच बैठा देंगे। इस पार्टी के नेता कुमार विश्वास कहते हैं कि छह महीने के अंदर ही कांग्रेस और भाजपा के कई नेता जेल में नजर आएंगे। क्योंकि, उनकी सरकार भ्रष्टाचारियों के मामले में कोई नरमी नहीं दिखाएगी। वे लोग सत्ता में बने रहने के लिए किसी तरह का दबाव नहीं मानेंगे। सरकार रहे या जाए। कुमार कहते हैं कि यदि कांग्रेस ने सरकार गिरा भी दी, तो जनता फिर बहुमत की सरकार बनवा देगी।

अब ‘आप’ के सामने अग्नि-परीक्षा प्रमुख चुनावी मुद्दों के अमल का है। ‘आप’ के नेताओं ने कह दिया है कि वे एक सप्ताह के अंदर ही दिल्ली की जनता को बिजली की दरों में राहत दे देंगे। एक ही झटके में दरें 50 प्रतिशत घटा दी जाएंगी। फिलहाल, इन दरों की कटौती के मामले में सरकार सब्सिडी देकर काम चलाएगी। जल्दी ही बिजली कंपनियों की आडिट कराई जाएगी। ताकि, यह पता चल सके कि भ्रष्टाचार के चलते कैसे बिजली महंगाई करनी पड़ी है? ‘आप’ के नेता संजय सिंह ने कहा है कि उनकी सरकार सभी प्रमुख चुनावी वायदों को चार महीने के अंदर पूरा करेगी। जब उनसे कहा गया कि वे इतने भरोसे के साथ यह दावा कैसे कर रहे हैं, तो उन्होंने यही कहा कि उनकी नीयत पाक साफ है। इसी से उन्हें विश्वास है, जो कहा था वह कर देंगे। केजरीवाल ने यह कह दिया है कि शीला दीक्षित सरकार के कई मंत्री जेल जरूर जाएंगे। क्योंकि, उन्हें पता है कि इन लोगों ने क्या-क्या कारनामे किए हैं?

इन तेवरों के चलते पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कह दिया है कि ‘आप’ को कांग्रेस का समर्थन मुद्दों के आधार पर है, बगैर शर्त के नहीं है। यह गलत प्रचार है। शीला ने यह भी कह डाला कि यदि कांग्रेस के खिलाफ ये लोग जहर उगलते रहे, तो कब तक कांग्रेस इन्हें समर्थन देगी, यह कहना वाकई में मुश्किल है? लेकिन, दिल्ली प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली का कहना है कि यदि केजरीवाल की सरकार ने ठीक काम किया, तो कांग्रेस पांच साल तक समर्थन जारी रख सकती है। लेकिन, इस मौके पर वे इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकते। सरकार कब तक चलेगी, इसको लेकर भारी संशय है? इसके बावजूद दिल्ली में केजरीवाल की सरकार राजनीति की एक नई डगर तो बनाने ही जा रही है। इस राजनीतिक प्रयोग ने कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों को अंदर से काफी हिला दिया है। इस मायने में ‘आप’ का यह प्रयोग ऐतिहासिक कहा जा सकता है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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