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दिल्‍ली सूचना विभाग में खुलेआम लूट

दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय में विज्ञापन एजेंसियों की सूचीबद्धता के नाम पर खुलेआम लूट का खेल जारी है। समाचार पत्रों में छपी खबरों के बाद भ्रष्ट अधिकारी मनी भूषण मल्होत्रा को आखिरकार डीआईपी से जाना पड़ा, जिसके बाद विभाग में अकेली पड़ी निदेशक साहिबा को विभाग के अधिकारियों की सुध आई, जो इस लूट में शामिल न किए जाने से खासे नाराज़ थे। मामला बिगड़ते देख आई.ए.एस. निदेशक रीता कुमार ने अभी तक किनारे किए हुए विभाग के अधिकारियों से भी सलाह-मशविरा करना शुरू कर दिया है। अब इन अधिकारियों की भी बांछे खिल गई है, अभी तक निदेशक को पानी पी-पी कर कोसने वाले यह अधिकारी बड़े गोलमाल की फिराक हैं।

दिल्ली सरकार के सूचना एवं प्रचार निदेशालय में विज्ञापन एजेंसियों की सूचीबद्धता के नाम पर खुलेआम लूट का खेल जारी है। समाचार पत्रों में छपी खबरों के बाद भ्रष्ट अधिकारी मनी भूषण मल्होत्रा को आखिरकार डीआईपी से जाना पड़ा, जिसके बाद विभाग में अकेली पड़ी निदेशक साहिबा को विभाग के अधिकारियों की सुध आई, जो इस लूट में शामिल न किए जाने से खासे नाराज़ थे। मामला बिगड़ते देख आई.ए.एस. निदेशक रीता कुमार ने अभी तक किनारे किए हुए विभाग के अधिकारियों से भी सलाह-मशविरा करना शुरू कर दिया है। अब इन अधिकारियों की भी बांछे खिल गई है, अभी तक निदेशक को पानी पी-पी कर कोसने वाले यह अधिकारी बड़े गोलमाल की फिराक हैं।

सूत्रों के मुताबिक निदेशक रीता कुमार कुछ ऐसी विज्ञापन एजेंसियों को सूचीबद्ध करने के लिए जिद्द पर अड़ी हुई है जो टेण्डर के मुताबिक मानदंडों पर खरी नहीं उतरती हैं। इसलिए यह पूरा प्रकरण विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है। बताया तो यहां तक जा रहा है कि अपनी चहेती एजेंसियों को सूचीबद्ध करने के लिए सुविधानुसार दस्तावेज तैयार कराए जा रहे हैं। गौरतलब है कि ग्रेड 1 एजेंसियां ही दिल्ली सरकार के विज्ञापन जारी करती हैं, जिससे इन एजेंसियों को भारी कमाई होती है। इसी कमाई को देखते हुए कुछ एजेंसियां ग्रेड 1 में शामिल होने के लिए तरह-तरह के जुगाड़ लगा रही हैं ओर मोटा चढ़ावा चढ़ाने को तत्पर हैं। इसी मोटे चढ़ावे को लपकने के लिए विभाग में आपस में छींटाकशी और आर.टी.आई. युद्ध चला हुआ है।

विभाग में नए आए उपनिदेशक विकास गोयल इस पूरे प्रकरण में मुकदर्शक बने हुए हैं और माल के लिए मची इस जंग से हैरान-परेशान हैं। बताया जा रहा है कि उन्होंने विभाग के भ्रष्टाचार को देखते हुए विज्ञापन शाखा का काम देखने से इन्कार कर दिया था और विज्ञापन एजेंसियों की सूचीबद्धता के गड़बड़-झाले से भी दूर रहने की इच्छा जाहिर की है। हास्यस्पद पहलू यह है कि निदेशक रीता कुमार भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र विज्ञापन एजेंसी डीएवीपी द्वारा सूचीबद्ध समाचार पत्रों को ही नकली बताने पर तुली हुई हैं जो कि इनकी लघु एवं मझोले समाचार पत्रों के बारे में अज्ञानता की पराकाष्ठा है।

गौरतलब है कि डीएवीपी से सूचीबद्ध समाचार पत्रों को पूरे भारतवर्ष की राज्य सरकारें विज्ञापन जारी करती हैं। डीएवीपी में समाचार पत्रों को सूचीबद्ध करते समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा बनाई गई विज्ञापन नीति का पालन किया जाता है तथा आवश्यक 30-35 अनिवार्य पात्रता की शर्तों पर उचित पाये जाने पर ही सूचीबद्ध किया जाता है। लघु एवं मझोले समाचार पत्र स्थानीय समस्याओं को उजागर करने में अग्रणी भूमिका निभाते हैं और एयरकंडीशन कल्चर के आई.ए.एस. रीता कुमार जैसे अधिकारियों को जगाने का काम करते हैं। निदेशक रीता कुमार के पास दिल्ली से प्रकाशित होने वाले डीएवीपी से सूचीबद्ध लगभग 600 लघु एवं मझोले समाचार पत्रों की समस्याएं सुनने का समय नहीं है। मगर विज्ञापन एजेंसियों को सूचीबद्ध करने के लिए वह जिस प्रकार तत्परता दिखा रही हैं और चहेते अधिकारियों द्वारा जो सौदेबाजी का खेल चल रहा है वह जांच का विषय है।

लेखक अरुण कुमार अग्रवाल सीनियर मीडिया कंसल्‍टेंट हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लाग खरी खरी बात से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

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