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इलाहाबाद

दिल की पेन ड्राइव में न जाने कितनी अनुभुतियां समाईं : ममता कालिया

प्रख्‍यात कथा लेखिका ममता कालिया सोमवार को अपनी रचना यात्रा के साथ अपने ही शहर में अपनों से मुखातिब हुईं। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय की ‘मेरी शब्‍दयात्रा’ कार्यक्रम के तहत उन्‍होंने पूरी विनम्रता और साफगोई के साथ अपनी रचना यात्रा के साथ रचना प्रक्रिया को भी साझा किया। मेरे दिल के पेन ड्राइव में राग-विराग एवं रचना संघर्ष सब कुछ ठसाठस भरा है। यह तो ऐसी शब्‍दयात्रा है जिमें रचनाकार कभी पास तो कभी फेल होता है। उन्‍होंने अपनी प्रिय कहानी ‘सुलेमान’ का पाठ भी किया।

प्रख्‍यात कथा लेखिका ममता कालिया सोमवार को अपनी रचना यात्रा के साथ अपने ही शहर में अपनों से मुखातिब हुईं। महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय की ‘मेरी शब्‍दयात्रा’ कार्यक्रम के तहत उन्‍होंने पूरी विनम्रता और साफगोई के साथ अपनी रचना यात्रा के साथ रचना प्रक्रिया को भी साझा किया। मेरे दिल के पेन ड्राइव में राग-विराग एवं रचना संघर्ष सब कुछ ठसाठस भरा है। यह तो ऐसी शब्‍दयात्रा है जिमें रचनाकार कभी पास तो कभी फेल होता है। उन्‍होंने अपनी प्रिय कहानी ‘सुलेमान’ का पाठ भी किया।

उन्‍होंने कहा कि, कहानी लिखना एकाकी साधना है। इसमें बहुरंगी दुनिया से अपने को काटकर निर्वासित कर लेना होता है। यथार्थ से एक ज़ायज दूरी भी जरूरी है। सिर्फ कल्‍पना और भावना को क़ागज पर उतारने ही नहीं समय के सवालों, सरोकारों से जूझने के लिए लिखना शुरू किया। कभी सुबह के अखबार के साथ कोई कहानी चली आई तो कभी किसी अन्‍य घटना के साथ। एक साथ दिमाग में पांच-पांच कहानियां, तीन-तीन उपन्‍यास साथ आकार लेते रहे। रचनाकर्म के बीच उपन्‍सास महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसके लिए स्‍व से निकलकर पर में प्रवेश जरूरी है।

कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्‍ठ कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा, ममता की रचनाओं में वैविध्‍य है। पात्रों को गढ़ना कोर्इ उनसे सीखे। जीवन की तरह ही उनकी रचनाओं में सहजता पारदर्शी रूप में दिखती है। एक उपन्यास को पूरा करके, दूसरे पर काम करना, उसके लिए अंतरवस्‍तु को गढ़ना, किसी पीड़ादायी प्रक्रिया से कम नहीं है। जिस तरह ममता समन्‍वय स्‍थापित करती हैं, वैसा अन्‍य लेखकों में दुर्लभ है। विशिष्‍ट अतिथि वरिष्‍ठ कथाकार एवं ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने कहा, ममता के बहाने एक बार फिर स्‍मृतियां ताजा हुईं और इलाहाबाद की गलियों में घूमना भी। कथा लेखिका अनीता गोपेश ने बतौर रचनाकार नहीं बल्कि अच्‍छे इंसान के रूप में उनकी शख्सियत की खूबियों को साझा किया। स्‍मृतियों को सहेजते हुए कहा, ममता जी जितनी निश्‍छल हैं, उतनी ही उदार हैं। उन्‍होंने पूरी साफगोई, ईमानदारी से जिया और रचा। शुरूआत में श्री दूधनाथ सिंह ने शाल, गुलदस्‍ता प्रदान कर सम्‍मानित किया। क्षेत्रीय केंद्र के सत्‍य प्रकाश मिश्र सभागार में कार्यक्रम का संयोजन, संचालन और धन्‍यवाद ज्ञापन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया।

अतिथियों का स्वागत असरार गांधी, नंदल हितैषी, नीलम शंकर एवं सहायक क्षेत्रीय निदेशक यशराज सिंह पाल, ने किया।  गोष्ठी में प्रमुख रूप से जियाउल हक, बुद्धिसेन शर्मा, श्रीप्रकाश मिश्र, हरीशचन्द्र पाण्डेय, बद्रीनारायण, असरफ अली बेग, हरिश्‍चन्द्र अग्रवाल, अजित पुष्‍कल, सुधांशु उपाध्याय, श्रीरंग, जयकृष्‍ण राय तुषार, फज़ले हसनैन, मेवाराम, मीनू रानी दुबे, विवेक सत्यांशु, नीलम शंकर, रमेश ग्रोवर, कीर्ति सिंह, रतीनाथ योगेश्‍वर, अनिल रंजन भौमिक, अशोक सिद्धार्थ, पूर्णिमा मालवीय, रमाकान्त राय, अंशुल त्रिपाठी, देवेश श्रीवास्तव, रविकांत, यास्मीन सुल्ताना, संध्या नवोदिता, सुरेन्द्र राही, एहतराम इस्लाम, कृष्‍णमोहन,, सम्पन्न श्रीवास्तव, सुधीर सिंह, धनंजय चोपड़ा, प्रवीण शेखर, शैलेन्द्र कपिल सहित तमाम साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

प्रस्‍तुति

क्षेत्रीय केंद्र, इलाहाबाद

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