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दुनिया का कालापन उजागर करने वाले मीडिया हाउसेस के हाथ खुद काले हो गए हैं

Vaibhav Agrawal : पत्रकारिता की जब बात करते हैं, तो भारतीय फिल्मों का वो सीन याद आता है, जिसमें खादी का कुरता पहने और एक बैग लटकाए हर जगह सच की तलाश में घूमता कलम का सिपाही… अपने घर की प्रेस से अखबार छाप कर, दुनिया को सच बताता है और काले धंधे करने वाले उसके पीछे पड़ जाते हैं… लेकिन टीवी समाचार चैनल आने के बाद पत्रकारिता की दुनिया भी अब ग्लैमर और चकाचौंध से भरपूर हो गयी है..

Vaibhav Agrawal : पत्रकारिता की जब बात करते हैं, तो भारतीय फिल्मों का वो सीन याद आता है, जिसमें खादी का कुरता पहने और एक बैग लटकाए हर जगह सच की तलाश में घूमता कलम का सिपाही… अपने घर की प्रेस से अखबार छाप कर, दुनिया को सच बताता है और काले धंधे करने वाले उसके पीछे पड़ जाते हैं… लेकिन टीवी समाचार चैनल आने के बाद पत्रकारिता की दुनिया भी अब ग्लैमर और चकाचौंध से भरपूर हो गयी है..

इसमें केवल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही नहीं, बल्कि अभी देखें किस तरह तरुण तेजपाल की पत्रिका ने गोवा में पंचतारा होटल में थिंक फेस्ट का आयोजन किया, जिसमें एक महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी हुई.. करोड़ों रुपए खर्च कर ऐसे आयोजन करना मीडिया कम्पनियों के नए शौक बन गए हैं…  ऐसे में मात्र एक शो के लिए, एक मीडिया ग्रुप द्वारा एक राजनीतिक हस्ती को अपने खर्चे पर चार्टर्ड प्लेन से बुलाना, इस बात का सबूत है कि पैसा अब मीडिया हाउस के हाथ का मैल बन चुका है… लेकिन बड़ा सवाल यह है कि कहाँ से आ रहा है यह पैसा? क्या वाकई दुनिया का कालापन उजागर करने वाले मीडिया हाउसेस के हाथ खुद काले नहीं हैं?

वैभव अग्रवाल के फेसबुक वॉल से.

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