: कथाकार बलराम की रचनाधर्मिता पर संगोष्ठी : “वर्तमान समय हमारी रचनात्मकता के लिए सबसे संघर्षपूर्ण समय है, जिसका सामना करना लेखक के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अपने समय के सरोकारों को अपनी रचनात्मकता में अभिव्यक्त करना ही लेखक का उद्देश्य है”- प्रस्तुत उद्गार महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार श्री दामोदर खड़से ने व्यक्त किये। श्री खड़से हिंदी विभाग, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुंबई एवं दुनिया इन दिनों पत्रिका (भोपाल) द्वारा जाने-माने रचनाकार श्री बलराम की रचनाधर्मिता पर आयोजित एक कार्यक्रम में अध्यक्ष के रूप में बोल रहे थे।
उन्होंने आगे कहा कि समय की दुरभिसंधियों को समझना और उन पर सार्थक विमर्श रचना किसी भी रचनाकार को महत्वपूर्ण बनाता है और बलराम ने यही किया है। मुश्किलों से जूझते हुए, जीवन की कठिनाइयों से लड़ते हुए बलराम ने अपनी रचनात्मकता को बचाए रखा है और निरंतर लिखा है। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए कथाकार श्री राकेश कुमार पालीवाल ने कहा कि “बलराम जी की रचनाओं में ज़मीन से जुड़ी हुई सच्चाइयाँ हैं। उन्होंने अपनी कहानियों और संस्मरणों में बड़े साहस के साथ जीवन की वास्तविकताओं को रचा है। लघुकथा आंदोलन के सबसे सशक्त हस्ताक्षर बलराम ने जीवन को संघर्षों में अदम्य जिजीविषा के साथ जिया है।
कवि साहित्यकार आलोक भट्टाचार्य ने बलराम के लेखन को एक दस्तावेज़ कहा। उन्होंने कहा कि यह समय बड़ा ख़राब समय है जिसमें बलराम ने लिखा है। बलराम ने अपने समय से साक्षात्कार करते हुए लिखा और अपने समकालीनों में उन्होंने एक अलग मार्ग बनाया। लघुकथा को एक नया जीवन दिया, उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। कथाकार रवीन्द्र कात्यायन ने कहा कि बलराम की रचनात्मकता ने साहित्य की प्रत्येक विधा को तोड़ा है और उसमें विधाओं का घाल-मेल कुछ इस तरह किया है कि रचना कभी आलोचना लगती है कभी साहित्यिक विधा- ख़ास तौर से उनकी कृति “माफ़ करना यार”। रवीन्द्र कात्यायन ने आलोचक विजय बहादुर सिंह द्वारा लिखित आलेख पढ़ा जो “माफ़ करना यार” पर केन्द्रित था।
विजय बहादुर सिंह ने लिखा है- ‘लेखक बलराम ने हम पाठकों के लिए शब्दों के पीछे का वह संसार प्रत्यक्ष करा दिया है, जो प्रायः हमारे लिए अदृश्य ही बना रहता है। इस दृष्टि से यह एक रोचक और रोमांचक कोशिश भी है क्योंकि इसमें हम अपने जाने-पहचाने लेखकों का वह चेहरा देख पा रहे हैं, जो लगभग असंभव था। बलराम ने इसे अगर संभव बना दिया है तो वे बधाई के पात्र हैं।‘ विजय बहादुर सिंह आगे लिखते हैं कि- बलराम ने ऐसे चरित्रों और प्रसंगों को भी लिया है जो बेहद चर्चित रहे- मसलन राजेन्द्र यादव, विद्यानिवास मिश्र, विष्णु खरे आदि। विष्णु खरे और राजेन्द्र यादव की तो उन्हीं छवियों की पुष्टि होती है जो पहले से हमारे पास हैं। हाँ, विष्णु खरे की अमानवीयताओं का प्रमाण ज़रूर हमारे हाथ आता है। पर जहाँ संपादक व्यक्तित्व की तुलना सामने आती है, वहाँ बलराम बेखटके यह लिख सके हैं कि पंडितजी (यानी नवभारत टाइम्स के संपादक विद्यानिवास मिश्र) न सुनते थे, न सुनाते थे, सिर्फ़ करते या करवाते थे और वही करते या करवाते थे जो उनका मन कह देता था। पंडितजी का मन कई बार फ़ेक रचनाओं पर भी फिसल जाया करता था लेकिन विष्णु खरे ने घटिया रचनाओं को कभी तरजीह नहीं दी।‘ ………’बलराम के गद्य में एक स्वाभाविक रोमान और मार्मिक विदग्धता है। आत्म से अनात्म या फिर व्यक्ति से लोक तक की ऐसी यात्रा जहाँ जीवन अपने असंख्य अनुभवों में मुस्कुरा रहा है। विचारों का क्षितिज उदात्तता की कामनाओं से भरा हुआ है और काल की कसौटियों पर कंचन से निखरे मूल्य अपनी तेजस्विता का ताप बिखेर रहे हैं।‘
साहित्यकार-पत्रकार रामजी यादव ने बलराम की रचनाओं के बारे में कहा कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण और शहरी दोनों स्थानों का इंसान मनुष्य जगमगा रहा है अपनी समूची उपस्थिति के साथ। बलराम ने न केवल आम आदमी को स्वर दिए हैं बल्कि उसके सरोकारों को रचनात्मक जामा पहनाकर उन्हें एक वैचारिक आधार भी प्रदान किया है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, साहित्यकार एवं “दुनिया इन दिनों” के संपादक सुधीर सक्सेना ने कहा कि- ‘बलराम हमारे समय के ख्यात नाम और लब्ध प्रतिष्ठ कथाकार हैं। सितारा लेखक होते हुए भी उनमें अहमन्यता नहीं है और उनकी भंगिमा भय के बजाय भरोसा उपजाती है। कलम हुए हाथ, शिक्षाकाल, पालनहारे, सामना, कामरेड का सपना, गोवा में तुम जैसी कहानियों के लेखन, पत्र-पत्रिकाओं, प्रेमचंद रचनावली और अनेक कोशों के संपादन तथा आयोजनधर्मिता के बावजूद बलराम की रचना धर्मिता का उत्स सूखा नहीं है। उनमें संवेदनाओं का हिमनद अभी शेष है और लिखने की ललक बची हुई है। उनके इसी रचनाकर्म का ताज़ा कड़ी है माफ़ करना यार। माफ़ करना यार में बलराम की मुद्रा विनयी सी है। वजह यह है कि वे वैष्णव जन हैं। पराई पीड़ा को बूझने वाले संवेदनशील वैष्णव-लेखक। देल्ली में यारबाशों की कमी नहीं है। दिल्ली में अदब की दुनिया में यार भी हैं, एय्यार भी। जौक का सच अब बलराम का सच है, कौन जाए जौक ये दिल्ली की गलियाँ छोड़कर। माफ़ करना यार को गर बलराम की दूसरी पारी का आगाज माना जाए तो उम्मीद करना बेमानी न होगा कि इस पारी में भी बलराम यारों व अय्यारों के बारे में लिखेंगे और अपनी कहानियों से आगे की कहानियाँ भी।‘
अपने रचनाकर्म पर बोलते हुए उत्सवमूर्ति बलराम ने कहा कि- ‘मेरे लेखन में मित्रों का बहुत योगदान है। ख़ास तौर पर राजकुमार गौतम और धीरेन्द्र अस्थाना। इन दोनों ने ही मुझे प्रेरित किया कि मैं प्रेम कथा भी लिखूँ।‘ उन्होंने हिंदी के बहुत से रचनाकारों के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि उनके कारण ही मैं यहाँ तक पहुँच सका। किसी ने पहचाना, किसी ने रास्ता दिखाया तो किसी ने मशाल पकड़ाई। मैंने कोई एक मठ नहीं बनाया लेकिन जो कुछ लिखा वो हर चीज़ एक मठ से कम नहीं है। चाहे वो लघुकथा हो या प्रेमचंद रचानावली का संपादन। अपने समकालीनों और बुजुर्ग लेखकों पर लिखना कठिन है लेकिन ईमानदारी से लिखने में डर कैसा?
कार्यक्रम के अंत में मणिबेन नानावटी की प्रिंसिपल डॉ. हर्षदा राठौड़ ने बलराम को बहुत शुभकामनाएँ दीं कि उनका लेखन इसी तरह दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करता रहे। दुनिया इन दिनों के संपादक सुधीर सक्सेना को भी उन्होंने बधाई दी कि इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन से महाविद्यालय की गरिमा बढ़ती है और छात्राओं की साहित्यिक अभिरुचि जागती है। उन्होंने कार्यक्रम के कुशल संचालन के लिए मुंबई के प्रसिद्ध शायर श्री देवमणि पाण्डेय को भी धन्यवाद दिया और कहा कि मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय के द्वारा हमेशा इस तरह के सार्थक आयोजनों के लिए खुले हैं।
रवीन्द्र कात्यायन की रिपोर्ट.