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लखनऊ

दुर्गाशक्ति निलंबन, परिक्रमा पाबंदी और मुस्लिम आरक्षण… समझिए सपा सरकार की वोट की राजनीति

आईएएस दुर्गाशक्ति के ‘निलंबन’ के बाद अयोध्या की 84 कोस परिक्रमा पर ‘‘प्रतिबंध’’ दोनों ही मुद्दों को साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने की छद्म ढाल के तले उचित ठहराने का राग अलापते हुए राज्य सरकार ने अल्पसंख्यकों को 20 प्रतिशत आरक्षण का ऐलान किया। इन तीनों बिन्दुओं के दूरगामी इफेक्ट को समझना आसान नहीं है। सवाल उठता है कि क्या अल्पसंख्यक वोटबैंक उन्हें आसन्न लोकसभा चुनाव की वैतरणी-पार लगा सकेगा?

आईएएस दुर्गाशक्ति के ‘निलंबन’ के बाद अयोध्या की 84 कोस परिक्रमा पर ‘‘प्रतिबंध’’ दोनों ही मुद्दों को साम्प्रदायिक सौहार्द्र कायम रखने की छद्म ढाल के तले उचित ठहराने का राग अलापते हुए राज्य सरकार ने अल्पसंख्यकों को 20 प्रतिशत आरक्षण का ऐलान किया। इन तीनों बिन्दुओं के दूरगामी इफेक्ट को समझना आसान नहीं है। सवाल उठता है कि क्या अल्पसंख्यक वोटबैंक उन्हें आसन्न लोकसभा चुनाव की वैतरणी-पार लगा सकेगा?

अयोध्याधाम और ब्रजधाम की 84 कोसी परिक्रमायें, गोबर्धन की 7 कोसी व चित्रकूट के कामदगिरि की 5 कोसी परिक्रमा सहित लगभग सभी धर्मस्थलों की परिक्रमायें सदियों से श्रद्धा और आस्था का प्रतीक हैं,  इनसे कभी कोई साम्प्रदायिक सौहार्द्र नहीं बिगड़ा, बल्कि सामाजिक समरसता के साथ भक्तिभाव के माध्यम से परमशांति की अनुभूति जन-जन की श्रद्धा का मूल आधार है। ऐसे में अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध लगाना, वैदिक भाव प्रवाह को ध्वस्त करने के अलावा कुछ नहीं है। सवाल उठता है-क्यों?

क्योंकि अयोध्या की 84 कोसी परिक्रमा की अगुआई विहिप ने अपने हाथ में ले रखी है। विश्व हिन्दू परिषद को दक्षिणपंथी भाजपा का अंग माना जाता है। अब सवाल ये है कि क्या सत्ताधारी सपा के लोग आस्थावान नहीं हैं? वे पूजापाठ के साथ धर्मस्थलों की परिक्रमा नहीं लगाते? मैंने अनुभव किया है कि ब्रजधाम के मथुरा, गोबर्धन, गोकुल, बरसाना, दाऊजी आदि की परिक्रमायें हों या 84 कोसी ब्रजभूमि परिक्रमा, अथवा अयोध्याधाम की 84 कोसी, चित्रकूट, काशी, तीर्थराज प्रयाग यात्रायें। जिनमें साधुसंतों की अगुवाई में उमड़ने वाले श्ऱालुओं में सर्वाधिक सीएम के सजातीय होते हैं। कभी कोई साम्प्रदायिक मतभेद नहीं दिखा। गौरतलब है कि इन तीर्थयात्राओं में व्यावसायिक दृष्टि से सर्वाधिक आय अल्पसंख्यकों के प्रमुख घटक मुसलमानों की होती है।

सत्तापक्ष ने अयोध्याधाम की परिक्रमा पर प्रतिबंध लगाकर अपने ही करोड़ों समर्थकों की सद््भावना को ठेस पहुंचाई है, कितने अल्पसंख्यकों की रोजी रोटी पर लात मारी है। धर्मनिरपेक्षता का साक्षात् दर्शन तीर्थयात्राओं में देखने को मिलता है, न कि साम्प्रदायिक हिंसा का।  अयोध्याधाम की 84 कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध एक ऐसी नजीर बनेगी, जिसके आधार पर आने वाले समय में बदले की भावना से कहीं भी कोई सरकार ‘‘परिक्रमा’’ प्रक्रिया ही प्रतिबंधित कर  सकती है। साम्प्रदायिक हिंसा का सूत्रधार कोई और नहीं बल्कि सियासी सोच है।

इसी सियासी सोच ने साम्प्रदायिक हिंसा के नाम पर प्रशासनिक सत्यनिष्ठा को ध्वस्त करने के लिए आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल को निलंबित किया। इसी सोच ने सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों को 20 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा के लिए विवश किया। इस आरक्षण का लाभ उन अल्पसंख्यकों को पहले मिले जो ब्रज में राधे-राधे, अवध व चित्रकूट में सियाराम में रंगकर दो-जून की रोटी कमाते है, प्रसाद, पूजन-सामग्री, चाय-नाश्ता, स्थानीय यातायात आदि का कारोबार चलाते हैं।  अयोध्याधाम की 84 कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध से सर्वाधिक व्यथित कोई है, तो वही मुस्लिम परिवार हैं, जो छिनते कारोबार की बजह से किस हालात से गुजर रहे है? इसकी कल्पना तो करो।

देवेश शास्त्री का विश्लेषण.

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