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दुर्गा शक्ति बनाम राज धर्म : अब घटिया खाना खिलाने के आरोप में एक महिला आईएएस का ट्रांसफर

युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के बहुचर्चित निलंबन के मामले को लेकर सियासी हल्कों में एक बड़ी बहस शुरू हो गई है। अहम सवाल यह है कि क्या सरकारें अपने प्रशासनिक कामकाज में अपना राज धर्म निभा पा रही हैं? राज्य सरकारों की कार्यशैली किस तरह से पटरी से उतरने लगी है? इसका ज्वलंत उदाहरण बन गया है दुर्गा शक्ति के निलंबन का मामला।

युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के बहुचर्चित निलंबन के मामले को लेकर सियासी हल्कों में एक बड़ी बहस शुरू हो गई है। अहम सवाल यह है कि क्या सरकारें अपने प्रशासनिक कामकाज में अपना राज धर्म निभा पा रही हैं? राज्य सरकारों की कार्यशैली किस तरह से पटरी से उतरने लगी है? इसका ज्वलंत उदाहरण बन गया है दुर्गा शक्ति के निलंबन का मामला।

पिछले कई दिनों से मीडिया में इस मामले की लगातार चर्चा हो रही है। इस मामले से जुड़े तमाम तथ्य रोज उजागर हो रहे हैं। इनसे पता चलता है कि कैसे प्रशासनिक अमले में किसी खांटी ईमानदार अफसर को टिकना मुश्किल हो जाता है? पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था इतनी बीमार हो गई है कि वह दुर्गा जैसे अफसरों को तुरंत सबक सिखाने पर उतारू हो जाती है। यह बहस फिलहाल भले दुर्गा शक्ति को लेकर चल पड़ी हो, लेकिन सच्चाई यही है कि यह मामला अपने किस्म का न अकेला है और न अनोखा है? कांग्रेस जैसे दल जो दुर्गा के मामले में बेचैन दिखाई पड़ते हैं, इनकी सरकारों का भी चाल-चलन कुछ अलग नहीं माना जा सकता।

आइए, पहले दुर्गा मामले पर ही कुछ चर्चा कर लें। दुर्गा शक्ति नागपाल, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की ट्रेनी अफसर हैं। वे आईएएस के 2010 बैच की हैं। गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) में सदर क्षेत्र की एसडीएम थीं। 27 जुलाई को देर रात उन्हें कथित तौर पर प्रशासनिक चूक के चलते निलंबित कर दिया गया। सरकार ने उन्हें राजस्व परिषद से अटैच कर दिया है।

यूं तो आम तौर पर कनिष्ठ अधिकारियों के तबादले या निलंबन जैसे मामले मीडिया की सुर्खियों में नहीं आते। लेकिन, दुर्गा का मामला जोरदार चर्चा का मसाला बन गया है। यह मामला इतना गंभीर हो चला है कि इसको लेकर उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव की सरकार भी खासी हल्कान हो गई है। यह अलग बात है कि सियासी कारणों से राज्य सरकार ने इस मामले में एकदम अड़ियल रुख अपना लिया है। क्योंकि, कई राजनीतिक दल इस मामले में अपने राजनीतिक दांव की चकरी चलाने के फेर में थे।

कांग्रेस की प्रमुख सोनिया गांधी ने बाकायदा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को एक पत्र लिख डाला। इसमें उन्होंने दुर्गा शक्ति के निलंबन मामले में चिंता जाहिर करते हुए लिख दिया कि युवा ईमानदार अधिकारियों के साथ गैर-इंसाफी नहीं होनी चाहिए। जाहिर है कि इस तरह की पहल करके कांग्रेस की नेता यही संदेश देने की फेर में रही हैं कि उन्हें दुर्गा के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार का कारनामा पसंद नहीं है। कांग्रेस इस तरह की राजनीतिक शैली के धुर खिलाफ है।

बहुत संभव है कि यदि सोनिया गांधी, दुर्गा के मामले में खुलकर सामने नहीं आतीं, तो अखिलेश सरकार अब तक दुर्गा को बहाल कर देती। लेकिन, सोनिया गांधी की चिट्ठी के बाद, सपा नेतृत्व ने भी इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया। इस प्रकरण के बाद सपा नेतृत्व ने दुर्गा मामले में सख्त रुख अपना शुरू किया। यही कहा गया कि दुर्गा ने ग्रेटर नोएडा के कादलपुर गांव में एक मस्जिद की दीवार गिरवाकर सांप्रदायिक उन्माद के खतरे को बढ़ा दिया था। इसी प्रशासनिक चूक की सजा के तौर पर उन्हें निलंबित किया गया है। ऐसे में, इस मामले की व्यापक जांच के बाद ही नियमानुसार कोई फैसला किया जाएगा।

युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में यहां तक कह दिया कि यदि कोई अफसर गलती करेगा, तो सरकार उसे सजा जरूर देगी। रोजमर्रा के प्रशासनिक काम में इतना हल्ला क्यों किया जा रहा है? यह बात उन्हें समझ में नहीं आ रही। सपा के चर्चित महासचिव नरेश अग्रवाल कह चुके हैं कि ऐसे छोटे-मोटे ट्रांसफर और निलंबन रोज होते रहते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि मीडिया, दुर्गा के मामले में इतना अफलातूनी क्यों हो रहा है? नरेश अग्रवाल को हैरानी हो रही है कि सोनिया गांधी ने इस मामले में चिट्ठी क्यों लिख दी? यदि उन्हें आईएएस अधिकारियों के लिए इतनी ही करुणा है, तो अशोक खेमका के बारे में उन्होंने प्रधानमंत्री को चिट्ठी क्यों नहीं लिखी?

आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का जिक्र आ ही गया है, तो इस कहानी के कुछ अंश एक बार फिर   तरोताजा कर लीजिए। खेमका, हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। पिछले 22 सालों से सरकारी सेवा में हैं। इस कार्यकाल में उनके 44 ट्रांसफर हो चुके हैं। सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि एक पद पर उनके कार्यकाल का औसत क्या रहा होगा? दरअसल, खांटी अधिकारी खेमका की चर्चा पिछले महीनों में जमकर हो चुकी है। यूपीए की प्रमुख सोनिया गांधी के दामाद हैं, राबर्ट वाड्रा। दामाद जी हरियाणा और राजस्थान में जमीनों का बड़े पैमाने पर धंधा करते हैं।

आरोप लगे हैं कि राजस्थान और हरियाणा के कांग्रेसी सरकारों के दबदबे का लाभ वे उठा लेते हैं। इसी के चलते कुछ सालों में ही उन्होंने जमीनों के धंधे से मोटा मुनाफा कमा लिया है। हरियाणा की ऐसी ही कुछ जमीनों को लेकर अशोक खेमका ने नोटिस देने की जुर्रत की थी। इससे जमीनों के बैनामे लटक जाने का खतरा पैदा हो गया था। हरियाणा सरकार के आदेश पर खेमका को जब गैर-महत्वपूर्ण पद पर भेज दिया गया, तो इसकी चर्चा मीडिया में हुई थी। यह बहस शुरू हुई थी कि क्या राबर्ट वाड्रा के जमीनी सौदों पर सवाल उठाने की सजा ईमानदार अधिकारी खेमका को दी गई है?

इस पर हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मीडिया पर गुस्सा आने लगा था। वे यही कहते थे कि मीडिया, खेमका के मामले को इनता तूल क्यों दे रहा है? जबकि, राज्य सरकार को अधिकार है कि वह जनहित में किसी अधिकारी को कहीं काम पर लगा सकती है। मामले की साफ-सफाई के लिए हुड्डा सरकार ने विवादित सौदों के मामलों में जांच भी बैठा दी थी। अपेक्षानुसार, जांचकर्ताओं ने फटाफट सौदों को क्लीनचिट भी दे दी थी।

उस दौर में अशोक खेमका ने मीडिया से कहा था कि पिछले सालों में हरियाणा की लगभग हर सरकार ने बार-बार तबादले का उन्हें दंश दिया है। अब तो वे इसके अभ्यस्त हो गए हैं। क्योंकि, राजनेता यही उम्मीद कर रहे हैं कि बड़े अधिकारी सरकार के इशारों पर वही करें जिसके संकेत दिए जाएं। यदि बगैर संकेत दिए वे ‘सरकार बहादुरों’ की मुराद पूरी कर दें, तो और अच्छा है। इस मामले में कांग्रेसी नेता लगातार यही कहते रहे कि अशोक खेमका को हरियाणा सरकार ने कभी प्रताड़ित नहीं किया। उन्हें खेमका के खांटी तेवर रास नहीं आ रहे थे।

दुर्गा शक्ति के मामले को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच जब सियासत के दांव चलने लगे, तो सपा के नरेश अग्रवाल ने कांग्रेस को खेमका मामले की याद दिलाई है। इस पर कांग्रेस के प्रवक्ता मीम अफजल ने कह दिया है कि दुर्गा के मामले की तुलना अशोक खेमका के मामले से नहीं की जानी चाहिए। क्योंकि, खेमका का तो महज ट्रांसफर हुआ था। जबकि, दुर्गा का तो निलंबन हुआ है। अपने आप में यह कुछ अजीबो-गरीब तर्क है। आपके इशारे पर कोई अधिकारी नाच न नाचे, तो आप उसका मनमाना ट्रांसफर कर देंगे? इसको कानून सम्मत करार करने के लिए आप तर्क देते हैं कि यह तो नियमित तबादला है। लेकिन, उत्तर प्रदेश सरकार जब इसी तरह का जवाब देती है, तो आपको ठीक नहीं लगता। इसे सियासत न कहें, तो और क्या कहेंगे?

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी इस मामले में अपनी चुप्पी तोड़ दी है। यही कहा है कि दुर्गा के मामले में नियमानुसार कार्रवाई होगी। केंद्र सरकार ने इस मामले में राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है। शुरुआती दौर में केंद्र सरकार ने सपा पर दबाव बढ़ाने के लिए इस मामले में सक्रियता बढ़ा दी थी। कार्मिक मंत्रालय के प्रभारी केंद्रीय राज्यमंत्री वी. नारायण सामी ने इस तरह के संकेत देने शुरू कर दिए थे कि केंद्र सरकार दुर्गा के निलंबन को रद्द करा देगी। इसके लिए उन्होंने केंद्र के कई विशेषाधिकारों का हवाला भी दे डाला था। लेकिन, जब सपा नेतृत्व ने पलटवार के तेवर अपनाए, तो नारायण सामी ने यू-टर्न ले लिया। वे बोले कि यदि दुर्गा शक्ति कार्मिक मंत्रालय में अपने निलंबन के खिलाफ गुहार लगाएंगी, तो केंद्र सरकार इस मामले में पड़ेगी। वरना, वह इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

माना जा रहा है कि राजनीतिक जरूरतों को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व इस ठौर पर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह को ज्यादा नाराज नहीं कर सकता। वैसे भी, इन दिनों मनमोहन सरकार खास तौर पर सपा के समर्थन पर टिकी है। संसद में खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी का विधेयक लंबित है। इसमें सपा के सहयोग की सरकार को खास जरूरत है। माना जा रहा है कि इस सियासी मजबूरी के चलते दुर्गा के मामले में केंद्र का रवैया नरम पड़ा है। दरअसल, लोकसभा चुनाव की तैयारियां सभी दलों ने जोर-शोर से शुरू कर दी हैं। सपा नेतृत्व इस कोशिश में है कि उसे कम से कम उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज का वोट एकजुट होकर मिल जाए। ऐसे में, वह इस समाज की मनुहार का कोई मौका नहीं चूक रहा है। दुर्गा के मामले में भी वोट बैंक की राजनीति का फेर पड़ गया है। सपा नेतृत्व ने यही प्रचारित किया है कि मस्जिद की दीवार की रक्षा के लिए उनकी सरकार ने एक आईएएस को दंडित करने में देर नहीं लगाई। जबकि, इस मामले में केंद्र सरकार भी दबाव बना रही है। इसके बावजूद राज्य सरकार दमखम से जुटी है। मकसद यही है कि इस मामले से दूसरे अफसर सबक ले लें।

यह अलग बात है कि प्रदेश के कुछ इस्लामी संगठनों ने दुर्गा शक्ति के मामले में राज्य सरकार के रवैए की तीखी आलोचना शुरू की है। जमात-ए-इस्लामी हिंद ने सरकार की यह कहते हुए आलोचना की   है कि दुर्गा के मामले को गलत ढंग से मस्जिद प्रकरण से जोड़ दिया गया है। जबकि, सच्चाई यह है कि बालू माफियाओं को बचाने के लिए एक खांटी अफसर को निलंबित कर दिया गया है। लेकिन, अब मस्जिद प्रकरण की आड़ ली जा रही है। राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष अमीन मदनी ने भी कहा है कि राज्य सरकार जानबूझकर सियासी कारणों से इसे मुस्लिम मुद्दा बना रही है। एक तरह से इस मामले में दुर्गा को ‘बलि का बकरा’ बनाया जा रहा है।

राजनीतिक हल्कों में यह बहस तेज है कि दुर्गा को मस्जिद की दीवार गिरवाने के चक्कर में हटाया गया या उन्हें बालू माफियाओं के खिलाफ सघन कार्रवाई के चलते हटाया गया? उल्लेखनीय है कि पिछले कई महीनों से दुर्गा के नेतृत्व में बालू माफियाओं के खिलाफ अभियान चल रहा था। इन माफियाओं को सत्तारूढ़ दल के कई दिग्गजों का संरक्षण था। इससे सपा के कई स्थानीय नेता नाराज चल रहे थे। सबसे ज्यादा खफा रहे हैं नरेंद्र भाटी। वे नोएडा संसदीय क्षेत्र से सपा के संभावित उम्मीदवार हैं। पूर्व विधायक भाटी को राज्य सरकार ने प्रदेश एग्रो का चेयरमैन बना रखा है। यह पद कैबिनेट स्तर का है। लेकिन, इतने रुतबे वाले नेता का आदेश भी दुर्गा नहीं मानती थीं। भाटी के कहने पर ही दुर्गा पर सरकार की गाज गिरी है।

एक वीडियो फुटेज के जरिए इस बात का खुलासा हो गया है कि भाटी के कहने पर ही महज 41 मिनट के अंदर दुर्गा का निलंबन हुआ था। यह बात भाटी ने खुद एक सभा में कही थी। इस खुलासे से सपा नेतृत्व की जमकर किरकिरी हुई है। इस मामले में गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी रविकांत की भी रिपोर्ट है कि दीवार के मसले में दुर्गा की कोई भूमिका नहीं रही। इस रिपोर्ट की भी अनदेखी की गई। कहा गया कि एलआईयू की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने निलंबन किया है। लेकिन, एलआईयू की रिपोर्ट को लेकर भी मीडिया में एक खुलासा हुआ है। दावा किया गया है कि इस रिपोर्ट में दुर्गा की भूमिका का जिक्र ही नहीं है। इन सब खुलासों से जनता के बीच सपा सरकार की जमकर किरकिरी हुई है। लेकिन, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह अड़ियल रुख अपनाए हुए हैं। वे कहते हैं कि राजनीति में हमेशा नफा-नुकसान का हिसाब नहीं लगाया जाता। कई बार सेक्यूलर राजनीति के लिए कुछ जोखिम लेने भी पड़ते हैं। इसमें वे कभी पीछे नहीं रहते।

दुर्गा शक्ति के मामले में भले कांग्रेस के नेता अब इंसाफ की दुहाई दे रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेसी सरकारों का चरित्र भी कुछ बहुत अलग नहीं रहा है। पिछले दिनों ही राजस्थान के कांग्रेसी सरकार ने जैसलमेर के पुलिस अधीक्षक पंकज चौधरी को हटा दिया है। कहा यही गया कि यह रुटीन ट्रांसफर है। जबकि, इस तबादले को लेकर जैसलमेर में हजारों लोग सड़कों पर निकल आए। हुआ यह था कि खांटी आईपीएस अफसर पंकज ने पोखरण के कांग्रेसी विधायक के पिता के खिलाफ हिस्ट्रीशीट का पन्ना दोबारा खुलवा दिया था। क्योंकि, विधायक के पिता गाजी फकीर एक जमाने में भारत-पाक सीमा पर तस्करी कराते थे। दो साल पहले इनकी हिस्ट्रीशीट बंद कर दी गई थी। इसे चौधरी ने दोबारा खुलवा दिया। इसी से विधायक जी नाराज हुए, तो तबादले की गाज गिर गई। इस मामले पर कांग्रेसी नेता अपने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के कदम को ठीक बता रहे हैं। लेकिन, हैरानी है कि उन्हें अखिलेश यादव का कदम नैतिक नहीं लगता।

एक ताजा मामला जम्मू-कश्मीर सरकार का है। 57 साल की आईएएस अफसर सोनाली कुमार 1979 बैच की हैं। दिल्ली में जम्मू-कश्मीर की रेजीडेंट कमिश्नर थीं। पिछले दिनों राज्य के करीब 20 आलाअफसर योजना आयोग में एक मीटिंग के लिए आए थे। नियमानुसार, सोनाली ने मुख्य सचिव सहित दो अफसरों को पंच सितारा होटल में रुकवाया था। जबकि, बाकी को जम्मू-कश्मीर हाउस के साधारण कमरों में ठहरा दिया। उन्हें एक बेहतरीन रेस्त्रां से खाना भी खिलवाया।

लेकिन, कई अधिकारियों ने शिकायत कर दी कि उन्हें घटिया खाना दिया गया। इस चक्कर में सोनाली का तबादला एक गैर-महत्वपूर्ण पद पर कर दिया गया। इस मामले को लेकर सोनाली अब संघर्ष पर उतारू हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव से भी मुलाकात की है। कहा है कि कश्मीर से आए अधिकारियों को उन्होंने बेहतरीन गोश्त नहीं खिलवाया, तो सब नाराज हो गए। सोनाली को गुस्सा है कि कुछ-कुछ दुर्गा शक्ति नागपाल की तरह उनके साथ भी गैर-इंसाफी हुई है। उनका अनुभव है कि राजनेता कई बार अधिकारियों से गुलामों जैसा बर्ताव करते हैं। यदि कोई अधिकारी नियमानुसार काम करने की बात करे, तो वह राज शक्ति के कोप का शिकार बन जाता है। जैसे कि वे और दुर्गा शक्ति इस दंश की पीड़ा झेल रही हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है।

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