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दुष्कर्म मामला और जजों की दुविधा

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली के बचाव में कैसे-कैसे लोग क्या-क्या बोल रहे हैं? खुद गांगुली कह रहे हैं कि उनकी तुलना तेजपाल से न की जाए। क्यों न की जाए? क्या इसलिए कि तेजपाल पत्रकार है और आप न्यायाधीश हैं? क्या पत्रकार की कोई इज्जत नहीं होती? क्या मान-हानि सिर्फ जजों की ही होती है? अत्याचार या अपराध कोई भी करे, खबर सभी की ली जानी चाहिए। और जो अपने आपको औरों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझें, उसकी खबर तो और भी ज्यादा ली जानी चाहिए। भारतीय न्यायशास्त्रों में इसका जोरदार समर्थन हुआ है। यदि महामात्य और उसका भृत्य एक ही तरह का अपराध करें तो महामात्य की सजा उससे कई गुना कठोर होती है।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली के बचाव में कैसे-कैसे लोग क्या-क्या बोल रहे हैं? खुद गांगुली कह रहे हैं कि उनकी तुलना तेजपाल से न की जाए। क्यों न की जाए? क्या इसलिए कि तेजपाल पत्रकार है और आप न्यायाधीश हैं? क्या पत्रकार की कोई इज्जत नहीं होती? क्या मान-हानि सिर्फ जजों की ही होती है? अत्याचार या अपराध कोई भी करे, खबर सभी की ली जानी चाहिए। और जो अपने आपको औरों से ज्यादा महत्वपूर्ण समझें, उसकी खबर तो और भी ज्यादा ली जानी चाहिए। भारतीय न्यायशास्त्रों में इसका जोरदार समर्थन हुआ है। यदि महामात्य और उसका भृत्य एक ही तरह का अपराध करें तो महामात्य की सजा उससे कई गुना कठोर होती है।
 
 
गांगुली के मामले में आरोप लगानेवाली विधि-प्रशिक्षु, कन्या को जांच करने वाले तीनों जजों के रवैए ने परेशान और शर्मिंदा किया ही था, अब पूर्व प्रधान न्यायाधीश और महान्यायवादी ने भी ऐसे बयान दे डाले हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से गांगुली का पक्ष लेते हैं। दोनों की राय है कि ऐसे आरोप तो लगते ही रहते हैं। आरोपों का क्या? कोई भी कुछ भी आरोप लगा सकता है।
 
गांगुली आजकल जिस पद पर हैं (बंगाल के मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष), उससे वे इस्तीफा क्यों दें? यानि वे उसकी जांच-रिपोर्ट आने तक अपने पद पर टिके रहें। इन सज्जनों ने यह भी पूछा है कि रिपोर्ट में अगर गांगुली सही-सलामत निकल आते हैं तो फिर उनका क्या होगा? इसमें शक नहीं कि सर्वोच्च न्यायालय के जज और मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष के नाते गांगुली ने अनेक ऐतिहासिक फैसले किए हैं और उनकी दक्षता की छाप उनके सहयोगियों पर अब भी बनी हुई है लेकिन उन पर लगे दुष्कर्म के आरोपों का खंडन उन्होंने जिस दबी जुबान से किया है, उसी ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। 
 
यदि गांगुली या किसी पर भी कोई चरित्र-हनन का इतना गंभीर आरोप निराधार ही लगा दे तो उसकी प्रतिक्रिया कितनी भयंकर हो सकती है, इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। चरित्र-हनन तो शरीर-हनन यानि हत्या से भी अधिक जघन्य-कर्म है। यदि यह आरोप निराधार था तो जस्टिस गांगुली ने उस लड़की को कठोर सजा देने की बात इशारे से भी क्यों नहीं कही? वास्तव में कोई उच्च पदस्थ जज ऐसे मामले में उलझ जाए, यह तथ्य सारे जजों को व्यथित करने वाला है। इसीलिए जांच करने वाले जजों ने अपनी जांच में भी जरा सख्ती दिखाई होगी। इसी सख्ती से वह लड़की परेशान हो गई होगी। अब उनके सामने यह दुविधा भी होगी कि उस जांच के नतीजों को सार्वजनिक कैसे करें? यदि गांगुली का दोष पाया गया तो सभी के लिए पसोपेश होगा और यदि गांगुली निर्दोष होंगे तो उस प्रशिक्षु कन्या को सजा दी जाए या नहीं? यदि दी जाए तो क्या दी जाए?
 
लेखक वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
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