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देहरादून में युवा पत्रकारों के संगठन ने महिला दिवस पर गोष्ठी का आयोजन किया

देहरादून : उत्तराखंड राज्य में पहली बार ऐसा हुआ जब पत्रकारों की पहल पर महिला दिवस को आधार बनाकर महिला मुद्दों पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। महिला दिवस के दिन होली और इससे पहले छह मार्च को मतगणना होने के कारण चार मार्च को आयोजित हुए इस कार्यक्रम में 27 युवा पत्रकारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। राजधानी के हिन्दी साहित्य समिति भवन में युवा पत्रकारों के नवजात संगठन इंडियन यूनियन आफ प्रोगेसिव जर्नलिस्ट ने इस गोष्ठी का आयोजन किया। महिला मुद्दे और मीडिया विषय पर आयोजित गोष्ठी में बतौर अतिथि और वक्ता महिला समाख्या की राज्य निदेशक गीता गैरोला और समाजसेवी डा. डीएस पुन्डीर ने अपनी बात रखी।

देहरादून : उत्तराखंड राज्य में पहली बार ऐसा हुआ जब पत्रकारों की पहल पर महिला दिवस को आधार बनाकर महिला मुद्दों पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। महिला दिवस के दिन होली और इससे पहले छह मार्च को मतगणना होने के कारण चार मार्च को आयोजित हुए इस कार्यक्रम में 27 युवा पत्रकारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। राजधानी के हिन्दी साहित्य समिति भवन में युवा पत्रकारों के नवजात संगठन इंडियन यूनियन आफ प्रोगेसिव जर्नलिस्ट ने इस गोष्ठी का आयोजन किया। महिला मुद्दे और मीडिया विषय पर आयोजित गोष्ठी में बतौर अतिथि और वक्ता महिला समाख्या की राज्य निदेशक गीता गैरोला और समाजसेवी डा. डीएस पुन्डीर ने अपनी बात रखी।

गोष्ठी में बतौर प्रथम वक्ता प्रवीन कुमार भट्ट ने कहा कि महिलाओं के मूलभूत मुद्दों का विधानसभा चुनावों में राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में जगह नहीं बना पाना गंभीर सवाल है। राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे में महिला मुद्दे हासिए में होने से साफ है महिलाओं के प्रति राजनीतिक पार्टियां कितनी संवेदनहीन हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया ने भी महिला मुद्दों को राजनीतिक दलों द्वारा उपेक्षित किए जाने को कभी सवाल नहीं बनाया। एक स्वतंत्र इकाई के रूप में महिला के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सवालों को मीडिया ने अलग से जगह देने की पहल करनी होगी। उन्होंने कहा कि एक ओर तो राजनीतिक दल इस बात की खुशी बना रहे हैं कि राज्य में 50 फीसदी पंचायतों में स्थान महिलाओं के लिए सुरक्षित किए गए हैं लेकिन दूसरी ओर इसी व्यवस्था ने राज्य में प्रधान पति जैसा एक मजबूत वर्ग भी पैदा कर दिया है। अगर सरकार वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करना चाहती हैं तो पंचायतों में चुनकर आ रही महिलाओं को रानजीतिक रूप से सशक्त बनाने का काम क्यों शुरू नहीं हो पाया। उन्होंने मीडिया संस्थानों के भीतर महिलाओं की स्थिति पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि महिलाओं को दोयम समझे जाने से मीडिया भी आज तक खुद को अलग नहीं कर पाया है।

डा. डीएस पुण्डीर ने अपने अनुभव के आधार पर कहा कि महिला मुद्दों पर हर स्तर पर काम किए जाने की जरूरत है। क्योंकि महिलाओं के साथ उनकी पैदाईश के पहले से ही भेदभाव किया जाना शुरू हो जाता है। महिला भ्रूण की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। इस क्षेत्र में ही जितना कुछ काम किया जाना चाहिए वह मीडिया में नहीं हो पा रहा है। इसी तरह जन्म के बाद महिला शिशु की परवरिश के सवाल पर तथा उसके बाद वयस्कों के शारीरिक, मानसिक बदलावों के बारे में फिर महिलाओं के विवाह के सवाल पर हर जगह नए विचारों के साथ बहुत काम किया जाना चाहिए। डा. पुन्डीर ने मीडियाकर्मियों से कहा कि वे लिखने से पहले अगर मुद्दे की ठीक से पड़ताल कर लेंगे तो लेखन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

गीता गैरोला ने कहा कि आज चाहे बच्चे के जन्म का उत्सव हो या फिर शादी हर छोटे-बड़े आयोजन को बाजार तय कर रहा है। बाजार का यह दखल और नियंत्रण अवाम के व्यवहार में शामिल हो चुका है। लड़कियों तथा महिला पत्रकारों को बाजार के इन प्रभावों को पहचानने की प्रक्रिया में निरंतर प्रयास करना होगा। जनकवि चंदन सिंह नेगी ने कहा कि पुरूषों को भी महिला मुद्दों पर संवेदनशील हो कर सोचना होगा। इस विचार गोष्ठी का संचालन सुनीता ने किया। अपनी बात रखते हुए कमल भट्ट ने कहा कि महिलाओं की मुकम्मल आजादी के लिए जरूरी है कि किचन के काम और बच्चों को पालने के काम को जिसे अनुत्पादक श्रम माना जाता है, इसका सार्वजनिकीकरण किया जाए। बच्चों की देखरेख के लिए सार्वजनिक क्रैच, सामुदायिक भोजनालय तथा बड़ी-बड़ी लांड्रियां स्थापित की जानी चाहिए।

दिल्ली से आए पत्रकार रोहित जोशी ने कहा कि महिलाओं को सामाजिक उत्पादन की मुख्यधारा में लाना होगा। इसका उदाहरण हमारे ही समाज में मौजूद भी है। महिला पत्रकारों की स्थितियों को लेकर रोहित ने कहा कि महिला पत्रकारों या पत्रकारों की स्थितियां पूरे देश में ही एक जैसी हैं। लेकिन साथ ही उन्होंने वैकल्पिक मीडिया को महिला मुद्दों के लिए उचित मंच बताया और सुझाया कि बुनियादी सवालों के लिए बाजार आधारित मीडिया के बजाय वैकल्पिक माध्यम बेहतर विकल्प बन सकते हैं। इस विचार गोष्ठी में अंषुल डांगी, नलिनी गुसाई, रजनी सुयाल, ऊषा रावत, सैलिना, जावेद अख्तर, सबा रहमान, प्रेम पंचोली, सुप्रिया रतूड़ी, हरदीप शर्मा, मनोज, ललित, मीना नेगी, विवेक, कनिका, अमित, ममता सिंह, शालिनी, अमरनाथ सिंह, इंद्र सिंह नेगी, रोहित और मनमीत सहित अनेक युवा पत्रकारों ने विचार साझा किए तथा भागीदारी की।  

महिला मुद्दे और मीडिया विषय पर आयोजित चर्चा के एकत्रित हुए सभी युवा पत्रकारों का मानना था कि समाज के बौद्धिक तबके से ताल्लुक रखने वाली पत्रकार बिरादरी के बीच मुद्दा आधारित बहसों का माहौल बनाए जाने की सख्त आवश्यकता है। राजधानी की पत्रकार बिरादरी और खास तौर से युवा पत्रकारों के विकास में यह बहुत सार्थक भूमिका निभाएगा।

प्रवीन कुमार भट्ट की रिपोर्ट.

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